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भारतीय संविधान - भाग 21 (अनुच्छेद 369-392) अस्थायी, संक्रमणकालीन और विशेष प्रावधान

15 Aug 2025 | Ful Verma | 118 views

भारतीय संविधान - भाग 21 (अनुच्छेद 369-392) अस्थायी, संक्रमणकालीन और विशेष प्रावधान - विस्तृत हिन्दी मार्गदर्शिका

भारतीय संविधान - भाग 21 (अनुच्छेद 369-392)

अस्थायी, संक्रमणकालीन और विशेष प्रावधान

भारतीय संविधान - भाग 21 (अनुच्छेद 369–392)

यह विस्तृत लेख संविधान के भाग 21 (Articles 369–392) का हिन्दी में संकलन है। Part XXI अस्थायी, संक्रमणकालीन और विशेष प्रावधानों से सम्बन्ध रखता है - जिन्हें संविधान निर्माण और प्रारम्भिक कार्यान्वयन के दौरान आने वाली कठिनाइयाँ दूर करने के लिए बनाया गया था। इस लेख में प्रत्येक अनुच्छेद का अर्थ, उद्देश्य, ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, व्यवहारिक प्रभाव और प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए उपयोगी MCQ शामिल हैं।

1. भाग 21 - परिचय और उद्देश्य

  • भारतीय संविधान का भाग 21 — Temporary, Transitional and Special Provisions — उन धाराओं का समूह है जो संविधान के प्रारम्भिक वर्षों में और कुछ विशिष्ट परिस्थितियों में लागू होने के लिए अस्थायी/विशेष व्यवस्थाएँ देते हैं। संविधान के रचयिता जानते थे कि स्वतंत्रता के बाद भारत में कई रियासतें, विविध प्रशासनिक प्रणालियाँ और इलाके ऐसे थे जिनमें संविधान के सामान्य नियम तत्काल नहीं थोपे जा सकते। अतः Part XXI को इन 'ट्रांजिशनल' चुनौतियों से निपटने हेतु रखा गया।

2. अनुच्छेद 369–375 - केंद्र को अस्थायी विधायी शक्तियाँ

Part XXI की शुरुआत में (अनुच्छेद 369 आदि) संसद को कुछ सीमित समय के लिए राज्यों के विषयों पर कानून बनानें की शक्ति दी गयी है — अर्थात् कुछ अस्थायी परिस्थितियों में केंद्र-सरकार को विधायी अधिकार देने का प्रावधान। यह इसलिए था ताकि संविधान लागू होने के समय जो व्यवस्थाएँ तुरंत आवश्यक थीं (जैसे न्यायालयों की स्थापना, शैक्षणिक संस्थानों का संक्रमण, कर-व्यवस्था का समायोजन) उन्हें शीघ्रता से लागू किया जा सके।

मुख्य बिंदु (369–375)

  • Article 369: एक विशेष अवधि में संसद को राज्यों के विषयों पर कानून बनाने की शक्ति (जब नियम में कहा गया हो)।
  • Article 370 (आंशिक रूप से प्रासंगिक): (ध्यान दें: Article 370 मुख्यतया जम्मू-कश्मीर के विशेष दर्जे से संबन्धित है; हालांकि 2019 में इसका प्रयोग बदल चुका है — पर Part XXI के भीतर अन्य अस्थायी प्रावधानों के समान प्रकृति रखता था)।
  • Article 371 तक: कुछ विशेष प्रावधान (आबुध-प्रदेश, पूर्व रियासतों या सीमावर्ती क्षेत्रों के लिये) जो समय-समय पर राज्यों के लिए अलग व्यवस्था देते थे।

उद्देश्य: संघ-विधेयकत्व में लचीलापन लाना ताकि प्रारम्भिक वर्षों में नियमों का शीघ्र कार्यान्वयन सुनिश्चित किया जा सके।

3. अनुच्छेद 376–389 - अस्थायी/विशेष प्रावधान (राज्य, न्यायपालिका इत्यादि)

इस खण्ड में कई निर्धारित और अस्थायी व्यवस्थाएँ हैं जिनका संबंध विभिन्न संवैधानिक संस्थाओं और राज्यों से है। उदाहरण के लिए:

  • न्यायालयों और न्यायाधीशों की नियुक्ति/अवधि से सम्बन्धित अस्थायी व्यवस्थाएँ;
  • राज्यों के विलय/विभाजन के बाद अदालतों, परिसंपत्तियों और उत्तरदायित्वों के बंटवारे के नियम;
  • कुछ विशेष परिस्थितियों में चुनावों के संशोधन या विराम के नियम।

कई अनुच्छेद अब समय के साथ अप्रासंगिक हो चुके हैं क्योंकि जिन परिस्थितियों के लिए वे बनाये गये थे, वे निपट चुकीं; पर उनका अस्तित्व यह दर्शाता है कि संविधान ने सामाजिक-राजनीतिक संक्रमणों का पूर्वानुमान किया था।

4. अनुच्छेद 390–392 - राष्ट्रपति की संक्रमणकालीन शक्ति

Part XXI का महत्वपूर्ण अनुच्छेद 392 — 'Power to remove difficulties' — राष्ट्रपति को अस्थायी शक्ति देता था कि यदि संविधान को लागू करने के समय कोई कठिनाई या व्यावहारिक बाधा उत्पन्न होती है, तो वे आदेश (ordo) द्वारा आवश्यक बदलाव/छूट दे सकें। यह शक्ति केवल अस्थायी और परिस्थिति-विशेष के लिए थी; इसकी उपयोगिता और सीमा पर न्यायिक व राजनीतिक विवेचना हुई है।

नोट: अनुच्छेद 392 जैसी 'difficulty-removing' शक्तियाँ पारंपरिक रूप से संक्रमणकालीन संविधिक व्यवस्थाओं में मिलती हैं, पर इन्हें बहुत सावधानी से रखना चाहिए ताकि वे लोकतांत्रिक मूल्यों का उल्लंघन न कर दें।

5. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: क्यों बनाये गए ये अनुच्छेद?

स्वतंत्रता के समय भारत में लगभग 565 रियासतें थीं, विभिन्न कानूनी प्रणालियाँ, अलग-अलग न्यायिक व्यवस्थाएँ और प्रशासनिक नियम रहे। संविधान लागू होते ही इनको एकीकृत करना एक विशाल कार्य था। रियासतों का विलय, आदर्श-शासकीय लेनदेन, कर-व्यवस्था, न्यायपालिका का पुनर्गठन — इन सबके लिए लचीलापन आवश्यक था। इसलिए Part XXI ऐसे अस्थायी अधिकार देता है कि नए कानून और व्यवस्था बिना बड़े वैधानिक संघर्ष के लागू की जा सकें।

6. प्रमुख उपयोग और उदाहरण

कुछ प्रमुख क्षेत्रों में Part XXI का प्रयोग हुआ:

  • States Reorganisation (1956): भाषा-आधारित पुनर्गठन के समय कई अस्थायी व्यवस्थायें लागू की गयीं ताकि प्रशासनिक कामकाज बाधारहित चले।
  • राज्य विलय/विभाजन: जब किसी राज्य का विभाजन होता है तो संपत्ति/ऋण/नियुक्तियों का बंटवारा करना होता है — इन मामलों में संक्रमणकालीन प्रावधानों का इस्तेमाल होता है।
  • रियासतों का विलय: रियासतों से सम्बन्धित पुरानी सम्पत्तियों और अनुबंधों के निपटान हेतु अस्थायी नियम बनाए गए।

7. न्यायिक समीक्षा और विधिक सीमाएँ

Part XXI की धाराओं पर अनेक न्यायिक विचार हुए हैं। प्रमुख दिशानिर्देशों में ये शामिल रहे:

  • अस्थायी प्रावधानों का प्रयोग केवल मूल उद्देश्य के अनुरूप होना चाहिए — अर्थात् संक्रमणकालीन समस्याओं को हल करना।
  • यदि कोई अस्थायी आदेश मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है तो न्यायालय उसकी वैधता पर विचार कर सकता है।
  • राष्ट्रपति की 'difficulty-removing' शक्ति का दुरुपयोग संवैधानिक सिद्धांतों के विरुद्ध माना जा सकता है और न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है।

8. आलोचना और सुधार के सुझाव

Part XXI के सम्बन्ध में कुछ आलोचनाएँ समय-समय पर उठी हैं:

  • अस्पष्ट शब्दावली: 'difficulty' या 'temporary' जैसे शब्दों का दुरुपयोग संभव है यदि सीमा स्पष्ट न रखी जाए।
  • पारदर्शिता की कमी: अस्थायी आदेश अक्सर पारदर्शी प्रक्रिया के बिना जारी किये जा सकते हैं; सार्वजनिक परामर्श का अभाव पैदा करता है।
  • नियंत्रण का अभाव: राष्ट्रपति/केंद्र द्वारा दी गयी अस्थायी शक्तियों पर प्रभावी संसदीय या न्यायिक नियंत्रण आवश्यक है।

सुझाव (Policy):

  1. अस्थायी प्रावधानों पर समय-सीमा और स्पष्ट उद्देश्य अनिवार्य करें।
  2. अस्थायी आदेशों के खिलाफ त्वरित न्यायिक समीक्षा का अधिकार सुनिश्चित करें।
  3. प्रभावित जनता व राज्यों के साथ परामर्श की प्रक्रिया निर्धारित करें।

9. निष्कर्ष

Part XXI ने भारतीय संविधान को व्यवहारिकता और लचीलापन दिया — विशेषकर उन वर्षों में जब विरासत-वाले क्षेत्रों को संघ में समायोजित करना था और अनेक प्रशासनिक व्यवस्थाओं को नया आकार देना था। हालांकि कई प्रावधान अब अप्रासंगिक हो चुके हैं, पर उनका अस्तित्व यह दर्शाता है कि संविधान ने परिवर्तनशील यथार्थ को स्वीकार किया और उसे व्यवस्थित करने की विधि दी। भविष्य के लिए यह आवश्यक है कि अस्थायी शक्तियों की पारदर्शिता, समय-सीमा और न्यायिक-निगरानी सुनिश्चित की जाए ताकि लोकतांत्रिक संस्थाएँ और नागरिक अधिकार सुरक्षित रहें।