
भारत का स्वर्णिम अध्याय – उदय, स्थापना, पृष्ठभूमि, समाज, संस्कृति, प्रशासन व इतिहास
भारतीय इतिहास का सबसे उज्ज्वल, विकसित और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध काल यदि कोई माना जाता है, तो वह है गुप्त युग (Gupta Age)। इसे इतिहासकारों ने "भारत का स्वर्ण युग", "Golden Age of India", "Classical Age of India", और "Hindu Renaissance Period" तक कहा है।
गुप्त साम्राज्य ने भारत को राजनीति, अर्थव्यवस्था, कला, साहित्य, विज्ञान, गणित, दर्शन और सामाजिक संरचना में एक नई पहचान दी।
गुप्त साम्राज्य की स्थापना 4वीं शताब्दी के आसपास हुई और यह लगभग तीन सौ वर्षों तक भारतीय उपमहाद्वीप पर अपना प्रभाव बनाए रखता है।
गुप्त साम्राज्य का उदय उस समय हुआ जब भारत एक लंबे राजनीतिक संघर्ष और विदेशी आक्रमणों से गुजर चुका था। मौर्य वंश के पतन के बाद भारत अनेक छोटे-छोटे राज्यों में बंट चुका था।
भारत को एक नए शक्तिशाली, संगठित और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध साम्राज्य की आवश्यकता थी।
यही वह समय था जब गुप्त वंश का उदय हुआ।
गुप्त वंश का उदय लगभग 240–300 ई. के बीच माना जाता है। लेकिन यह वंश 319–320 ई. से अचानक बहुत तेज़ी से उभरकर उत्तर भारत की सबसे बड़ी शक्ति बन गया।
इतिहासकारों का मानना है कि गुप्त शासक प्रारंभ में छोटे सामंत या स्थानीय राजा थे।
कई अभिलेखों, जैसे—
गुप्त वंश के उद्गम को लेकर इतिहासकार अलग-अलग मत रखते हैं।
आज अधिकांश इतिहासकार मानते हैं कि गुप्त साम्राज्य का प्रारंभिक केंद्र पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार था।
गुप्त साम्राज्य का वास्तविक संस्थापक माना जाता है—
इनका शासनकाल लगभग 240–280 ई. माना जाता है।
इन्होंने बड़ा साम्राज्य नहीं बनाया, लेकिन गुप्त साम्राज्य की मजबूत नींव डाली।
श्री गुप्त के उत्तराधिकारी थे—
घटोत्कच के समय गुप्तों का राजवंश धीरे-धीरे उभर रहा था। लेकिन वास्तविक विस्तार इनके पुत्र के समय हुआ—
घटोत्कच का पुत्र चंद्रगुप्त प्रथम गुप्त साम्राज्य का असली निर्माता माना गया है।
यह वही काल है जिसे बाद में भारत का स्वर्ण युग कहा जाने वाला था।
चंद्रगुप्त प्रथम ने बहुत तेज़ी से गुप्त साम्राज्य को विकसित किया।
गुप्त वंश के बारे में हमें जानकारी मिलती है—
गुप्त काल के सिक्के अत्यंत सुन्दर और कला-प्रधान हैं।
इनसे—
✓ धार्मिक मान्यताएँ
✓ आर्थिक स्थिति
✓ सैन्य शक्ति
✓ शासकों की उपाधियाँ
✓ समाज में धातुओं का उपयोग
पता चलता है।
विशेषकर फाह्यान का विवरण गुप्त साम्राज्य के समाज और धर्म का महत्वपूर्ण स्रोत है।
गुप्त काल का समाज अत्यंत विकसित, शिक्षित और व्यवस्थित माना जाता है।
गांव के प्रशासन में लोगों की सक्रिय भूमिका थी।
गुप्त साम्राज्य धार्मिक रूप से बहुत सहिष्णु था।
इनकी पूजा का विस्तार हुआ।
गुप्त शासकों ने बौद्धों को भी संरक्षण दिया।
नालंदा विश्वविद्यालय इसी काल में अत्यधिक प्रसिद्ध हुआ।
सभी को स्वतंत्रता थी।
गुप्त युग शिक्षा का स्वर्ण काल भी था।
छात्र—
पढ़ते थे।
गुप्त युग साहित्य का महानतम काल है।
गुप्त युग की कला विश्व प्रसिद्ध है।
गुप्त काल में सबसे पहले ईंट और पत्थर के नियमित संरचना वाले मंदिर बने।
गुप्त प्रशासन बहुत संगठित था।
गुप्त साम्राज्य का वास्तविक स्वर्णिम विस्तार चंद्रगुप्त प्रथम के पुत्र समुद्रगुप्त के समय हुआ।
पूरे भारतीय उपमहाद्वीप को अपने सैन्य कौशल, राजनीतिक सूझबूझ और धर्म-सहिष्णु नीति के कारण उन्होंने एक नई ऊँचाई प्रदान की।
इतिहासकार उन्हें “भारतीय नेपोलियन” (Indian Napoleon) कहते हैं।
उनकी विस्तृत सैन्य विजयों का प्रमाण हमें मिलता है—
✓ प्रयाग प्रशस्ति
✓ रामगढ़ से प्राप्त अभिलेख
✓ कई ताम्रपत्र
✓ दक्षिण भारतीय राजा✓ वन प्रदेशों के राजाओं की स्वीकृतिइस भाग में हम विस्तृत रूप से समुद्रगुप्त के जीवन, सैन्य नीति, दिग्विजय, दक्षिण विजय, प्रशासन और उनके स्वर्णकाल का अध्ययन करेंगे
समुद्रगुप्त गुप्त साम्राज्य के सबसे महान शासक माने जाते हैं।
समुद्रगुप्त के समय गुप्त साम्राज्य एक विशाल शक्ति बनकर उभरा।
उनके सिक्के, अभिलेख और साहित्यिक स्रोत इस बात की पुष्टि करते हैं कि वे महान योद्धा, संगीतकार और प्रशासनिक प्रतिभा थे।
समुद्रगुप्त के प्रमुख गुण—
इसीलिए उन्हें “चक्रवर्ती सम्राट” कहा गया।
समुद्रगुप्त चंद्रगुप्त प्रथम के उत्तराधिकारी बने।
कुछ इतिहासकार मानते हैं कि उत्तराधिकार के लिए उनके और उनके बड़े भाई (रामगुप्त) के बीच संघर्ष हुआ।
लेकिन अधिकांश मत कहता है कि चंद्रगुप्त प्रथम ने स्वयं समुद्रगुप्त को योग्य समझकर उत्तराधिकारी बनाया।
यह समुद्रगुप्त के शासनकाल का सबसे प्रमुख ऐतिहासिक स्रोत है।
हरिषेण – समुद्रगुप्त के सभाकवि व मंत्री थे।
इलाहाबाद के अशोक स्तंभ पर यह प्रशस्ति अंकित है।
प्रयाग प्रशस्ति भारत के इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण अभिलेखों में से एक है क्योंकि इसमें—
✓ समुद्रगुप्त की सभी विजयों का वर्णन
✓ शासित क्षेत्रों का पूरा विवरण
✓ प्रशासनिक नीति
✓ धार्मिक विचार
✓ युद्ध नीति
✓ विजित राजाओं की सूची
दिया गया है।
यह अभिलेख बताता है कि समुद्रगुप्त ने 🇮🇳 पूरे उत्तर भारत, मध्य भारत, दक्षिण भारत, वन प्रदेश और सीमा क्षेत्रों में अपना वर्चस्व स्थापित किया।
प्रयाग प्रशस्ति में विजयों को पाँच वर्गों में बांटा गया है—
इनसे युद्ध कर पूर्ण विजय प्राप्त की गई।
राज्य गुप्त साम्राज्य में मिला दिए गए।
इन पर समुद्रगुप्त ने विजय प्राप्त की, लेकिन
✓ पुनः शासन सौंप दिया
✓ कर व अधीनता स्वीकार कराई
वनांचलों के राजा समुद्रगुप्त के सामने नतमस्तक हुए।
इन राज्यों ने मित्रता व अधीनता स्वीकार की।
इन सबने समुद्रगुप्त को सर्वोच्च अधिपति माना।
अब हम इन सभी विजयों का विस्तार से अध्ययन करेंगे।
आर्यावर्त = उत्तर भारत (गंगा—यमुना क्षेत्र)
समुद्रगुप्त ने सबसे पहले उत्तर भारत पर ध्यान दिया और एक-एक कर सभी प्रमुख राजाओं को हराया।
इन सभी को पराजित करने के बाद समुद्रगुप्त ने गंगा—यमुना मैदान को गुप्त साम्राज्य में शामिल कर लिया।
प्रयाग प्रशस्ति में दक्षिण के 12 राजाओं का उल्लेख है।
समुद्रगुप्त ने दक्षिण भारत में एक विशाल दिग्विजय अभियान चलाया।
✓ समुद्रगुप्त ने पल्लव राजा विष्णुगोप को हराया।
✓ दक्षिण पर अधिकार नहीं जमाया—बल्कि
• दान—कर—सम्मान देकर
• उन्हें वापस शासन सौंप दिया।
यह नीति उन्हें एक सम्मानित और उदार शासक बनाती है।
ये राज्य समुद्रगुप्त की शक्ति को मानकर
✓ कर
✓ उपहार
✓ सैन्य सहायता
देते थे।
इनमें शामिल थे—
श्रीलंका के राजा मेघवर्मन ने समुद्रगुप्त से बौद्ध विहार बनाने की अनुमति मांगी थी।
समुद्रगुप्त ने इसे स्वीकार किया।
इससे पता चलता है कि वे धार्मिक सहिष्णु थे।
वन प्रदेश = मध्य प्रदेश, झारखंड, ओडिशा के वन क्षेत्र
यहां के प्रमुख राजा—
इन सबने युद्ध के बिना ही समुद्रगुप्त की अधीनता स्वीकार की।
भारत में कई गणराज्य थे, जैसे—
इन सभी ने समुद्रगुप्त को अपना अधिपति माना।
समुद्रगुप्त के साम्राज्य की सीमाएँ इतनी विशाल थीं कि इतिहास में इसे भारत के महान साम्राज्यों में गिना जाता है।
वे लगभग पूरे भारतीय उपमहाद्वीप के सर्वश्रेष्ठ शासक बन गए।
समुद्रगुप्त एक संगठित और आधुनिक सोच का शासक था।
उनकी उपाधि—
समुद्रगुप्त की सेना अत्यंत शक्तिशाली थी।
सेना में—
प्रांत = भूक्त
प्रभारी = उपरिक
जिला = विश्व
ग्राम = ग्रामिक
समुद्रगुप्त ने प्रशासनिक एकता को मजबूत किया।
हालाँकि समुद्रगुप्त वैष्णव थे, लेकिन उन्होंने—
✓ बौद्ध
✓ जैन
✓ शैव
✓ शाक्त
सभी धर्मों को संरक्षण दिया।
श्रीलंका के मेघवर्मन को बौद्ध विहार बनाने की अनुमति इसका प्रमाण है।
गुप्त काल के सिक्के बेहद कलात्मक हैं।
समुद्रगुप्त के सिक्कों पर—
के चित्र मिलते हैं।
यह उनके व्यक्तित्व का चित्रण करते हैं।
उनके वीणा बजाते हुए मुद्रा वाले सिक्के यह सिद्ध करते हैं कि वे—
✓ संगीतकार
✓ कला के संरक्षक
✓ सांस्कृतिक रूप से उच्च
व्यक्ति थे।
यह नीति उन्हें विशिष्ट बनाती है।
वे युद्ध में पराजित राजा को—
✓ जीवनदान
✓ पुनः राज्य
✓ कर-स्वरूप अधीनता
देते थे।
इससे दक्षिण भारत के राजा उनका सम्मान करते थे।
समुद्रगुप्त ने अपनी सर्वोच्चता सिद्ध करने के लिए अश्वमेध यज्ञ किया।
इस यज्ञ के सिक्के मिलते हैं।
इससे पता चलता है कि वह चक्रवर्ती राजा थे।
समुद्रगुप्त के समय—
✓ व्यापार बढ़ा
✓ सिक्कों की संख्या बढ़ी
✓ सुवर्ण मुद्राएँ चलन में आईं
✓ भारतीय कला पुनर्जीवित हुई
✓ साहित्यिक परंपरा फली-फूली
✓ धार्मिक सहिष्णुता बढ़ी
✓ शिक्षा और संस्कृति का विकास हुआ
यह गुप्त काल की नींव थी।
समुद्रगुप्त के बाद उनके पुत्र चंद्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य गद्दी पर बैठे।
चंद्रगुप्त द्वितीय ने शकों का अंत कर पश्चिम भारत को गुप्त साम्राज्य में मिलाया।
समुद्रगुप्त की मृत्यु के समय गुप्त साम्राज्य भारत का सबसे शक्तिशाली साम्राज्य था।
(इस भाग में: चंद्रगुप्त–II विक्रमादित्य, समुद्रगुप्त की नीतियाँ, साहित्य–कला–विज्ञान, नौकरणिक शक्ति, विदेश संबंध, समाज–अर्थव्यवस्था आदि का बेहद विस्तृत वर्णन.)
गुप्त साम्राज्य का तीसरा चरण भारतीय इतिहास का वह गौरवशाली समय है जिसे इतिहास में “स्वर्ण युग” कहा जाता है। इस काल में राजनीति, प्रशासन, कला, शिक्षा, साहित्य, गणित, खगोल विज्ञान, स्मारक-निर्माण, व्यापार और समाज—हर क्षेत्र में अभूतपूर्व उन्नति हुई।
विशेषकर चंद्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य का शासन भारतीय इतिहास का सबसे महान काल माना जाता है।
आइए इस स्वर्णिम युग को गहराई से समझते हैं।
समुद्रगुप्त केवल विजेता ही नहीं, एक उत्कृष्ट प्रशासक भी था। उसके द्वारा स्थापित प्रशासनिक ढाँचे ने बाद के गुप्त शासकों को मजबूत आधार दिया।
समुद्रगुप्त ने अपनी साम्राज्य नीति तीन स्तरों पर बनाई:
यह नीति बेहद सफल रही क्योंकि:
गुप्त काल की कर प्रणाली अत्यंत सरल थी—
करों की अधिकता नहीं थी, इसलिए जनता समृद्ध होती गई।
समुद्रगुप्त की सेना चार हिस्सों में बँटी थी:
नौसेना भी सक्रिय थी, विशेषकर बंगाल के तट पर।
समुद्रगुप्त के बाद उसका पुत्र चंद्रगुप्त द्वितीय (375–415 ई.) सिंहासन पर बैठा।
इन्हें विक्रमादित्य की उपाधि मिली।
पश्चिम भारत (गुजरात–मालवा–काठियावाड़) पर तब शकों का शासन था।
चंद्रगुप्त–II ने:
इसके बाद भारत की संपन्नता कई गुना बढ़ गई।
फ़ाह्यान (399–414 ई.) भारत आया।
उसने गुप्त शासन को:
उसको भारत इतना सुरक्षित लगा कि वह बिना हथियार यात्रा करता था।
गुप्त काल को “Classical Sanskrit Literature” का शिखर माना जाता है।
गुप्त काल के सबसे महान कवि और नाटककार:
कालिदास की कृतियाँ विश्व साहित्य की धरोहर हैं।
विश्व प्रसिद्ध विश्वविद्यालय:
दुनिया भर के विद्वान भारत आते थे।
आर्यभट (476 ई.) ने:
इनकी कृति बृहत संहिता में:
इन्होंने शून्य (0) और ऋण संख्याएँ का पूर्ण सिद्धांत दिया।
गुप्त काल की कला को “आदर्श भारतीय कला” कहा जाता है।
सबसे प्रसिद्ध मूर्तियाँ:
इनकी विशेषता:
गुप्त काल में कई चित्र तैयार हुए:
चित्रों की लय और रंग आज भी विश्व में बेजोड़ मानी जाती है।
गुप्त काल में व्यापार शिखर पर था।
राजमार्गों का निर्माण हुआ:
निर्यात:
आयात:
कृषि तकनीक में सुधार:
गुप्त काल की स्वर्ण मुद्राएँ (Gold Coins) विश्व में सबसे प्रसिद्ध हैं।
चंद्रगुप्त–II और समुद्रगुप्त के सिक्कों पर:
हुए करती थीं।
इनसे गुप्त साम्राज्य की समृद्धि का बोध होता है।
भारत का सीधा प्रभाव पहुँचा:
भारतीय संस्कृति वहाँ की सभ्यता में आज भी दिखती है।
रोमन साम्राज्य से व्यापार बहुत ज्यादा था, विशेषकर गुजरात के मार्ग से।
भाग–3 में हमने देखा कि:
इसलिए गुप्तकाल को भारत का स्वर्ण युग कहा जाता है।
इस भाग में हम गुप्त साम्राज्य के सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों—प्रशासन, सेना, अर्थव्यवस्था, कर व्यवस्था, न्याय व्यवस्था, समाज, धर्म, शिक्षा, ग्राम प्रशासन, और सांस्कृतिक संरचना—का विस्तारपूर्वक अध्ययन करेंगे। इस भाग को इस तरह लिखा गया है कि आप इसे सीधे अपने ब्लॉग पर पेस्ट कर सकते हैं।
गुप्त साम्राज्य की प्रशासनिक प्रणाली भारत की सबसे उन्नत, लचीली, और कुशल व्यवस्थाओं में शामिल थी। यह शासन प्रणाली न केवल विशाल साम्राज्य को संभालने में सक्षम थी, बल्कि कला, व्यापार, सुरक्षा और जनकल्याण को भी संतुलित करती थी।
गुप्त प्रशासन कुछ मुख्य इकाइयों पर आधारित था:
अब इन्हें विस्तार से समझते हैं।
गुप्त साम्राज्य में राजा को परम सत्ता माना गया। राजा:
सम्राट चंद्रगुप्त प्रथम, समुद्रगुप्त, चंद्रगुप्त द्वितीय और कुमारगुप्त जैसे महान शासकों ने राजा की शक्ति को चरम पर पहुँचाया।
राजा की उपाधियाँ थीं:
राजा के प्रशासन में एक मजबूत मंत्रिपरिषद सहायता करती थी। प्रमुख पद इस प्रकार थे:
गुप्त शासक अत्यंत शिक्षित और संगठन कुशल थे, इसलिए मंत्रिपरिषद सुचारू रूप से काम करती थी।
गुप्त साम्राज्य को प्रशासन के लिए कई स्तरों में बांटा गया था:
सबसे बड़ा प्रांत, जिसका प्रमुख उपरिक कहलाता था।
प्रांत का काम:
भुक्ति के बाद विषय आता था, जिसका प्रमुख विषयपति कहलाता था।
विषय का कार्य:
नगर की व्यवस्था नगरपति संभालता था।
कार्य:
ग्राम प्रशासन में:
इनका काम—
ग्राम पंचायत गुप्त काल की सबसे मजबूत संस्था थी।
गुप्त साम्राज्य में न्याय व्यवस्था अत्यंत व्यवस्थित और सरल थी।
गुप्त शासक कठोर दंड देने में विश्वास नहीं रखते थे। फ़ाह्यान के अनुसार, अपराध बेहद कम थे और लोग क़ानून का पालन करते थे।
गुप्त काल की सेना अत्यंत बलशाली थी। यही सेना गुप्त साम्राज्य की विस्तार की मुख्य वजह बनी।
समुद्रगुप्त और चंद्रगुप्त–II की सैन्य क्षमता अद्वितीय थी।
गुप्त काल की अर्थव्यवस्था कृषि और व्यापार पर आधारित थी। कर प्रणाली सरल और जनता के अनुकूल थी।
इन करों से प्राप्त धन:
गुप्त काल की अर्थव्यवस्था बेहद उन्नत रही। इसे भारत का सबसे समृद्ध आर्थिक युग कहा जाता है।
कृषि मुख्य आर्थिक आधार थी:
आंतरिक और बाहरी दोनों व्यापार खूब बढ़ा।
ये शहर व्यापार के केंद्र बने।
भारत ने व्यापार किया:
निर्यात:
आयात:
गुप्त काल में समाज सुव्यवस्थित, शांत और धार्मिक था।
समाज चार वर्णों पर आधारित था:
स्त्रियों की स्थिति सम्मानजनक थी। वे:
चारों प्रमुख धर्म फल–फूल रहे थे:
विशेषकर वैष्णव धर्म का प्रसार हुआ। गुप्त शासक विष्णु के अनुयायी थे।
गुप्त काल में शिक्षा और संस्कृति अपने चरम पर थीं।
विश्व प्रसिद्ध विश्वविद्यालय:
शिक्षा में पढ़ाया जाता था:
कालिदास, वराहमिहिर, आर्यभट, भारवि, शूद्रक, महावीराचार्य आदि ने गुप्त संस्कृति को ऊँचाई दी।
भारत की ताकत उसके गाँव थे।
गुप्त काल में:
अत्यंत सशक्त थे।
ग्राम पंचायत स्थानीय मामलों को स्वयं हल करती थी।
इस अंतिम भाग में हम गुप्त साम्राज्य के अत्यंत महत्वपूर्ण अध्याय—पतन के कारण, हूण आक्रमण, अंतिम गुप्त शासक, राजनीतिक विभाजन, और गुप्त संस्कृति का प्रभाव—का बहुत विस्तार से अध्ययन करेंगे।
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गुप्त साम्राज्य की महानता भारतीय इतिहास के स्वर्ण युग की पहचान है। परंतु हर साम्राज्य की तरह, गुप्त साम्राज्य भी धीरे-धीरे कमजोर होने लगा।
चंद्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य और कुमारगुप्त के बाद साम्राज्य स्थिर रहा, परंतु स्कन्दगुप्त के शासनकाल में परिस्थितियाँ बदलने लगीं। यह काल भारत के उत्तर-पश्चिम से आने वाले हूणों, आर्थिक दबाव, प्रशासनिक कमजोरी और क्षेत्रीय शक्तियों के उदय का समय था।
गुप्त साम्राज्य का पतन किसी एक घटना से नहीं हुआ, बल्कि कई कारणों ने मिलकर साम्राज्य को कमजोर किया।
हूण मध्य एशिया की भयंकर और अत्यंत क्रूर जनजाति थी।
भारत पर इनके दो मुख्य आक्रमण हुए:
स्कन्दगुप्त ने बहादुरी से हूणों को पराजित किया और भारत की रक्षा की। परंतु युद्ध बहुत महंगा पड़ा:
यह साम्राज्य की आर्थिक रीढ़ पर बड़ा आघात था।
स्कन्दगुप्त के बाद गुप्त साम्राज्य कमजोर पड़ चुका था।
इस मौके का फायदा उठाकर हूणों ने फिर हमला किया—इस बार उनका नेता मिहिरकुल था।
पूर्व के गुप्त सम्राट नरसिंहगुप्त ने संघर्ष किया, लेकिन हूण कई प्रांतों पर कब्जा करने में सफल हुए।
मध्य भारत, पंजाब और कश्मीर हूणों के अधीन चले गए।
हूणों के आक्रमणों ने:
यह पतन का सबसे निर्णायक कारण था।
गुप्त साम्राज्य का विस्तार विशाल था।
इतने बड़े साम्राज्य को संभालने में:
इन सबने राजकोष को कमजोर कर दिया।
सोने के सिक्कों का मात्रा घटती गई, जो आर्थिक गिरावट का स्पष्ट प्रमाण है।
समुद्रगुप्त, चंद्रगुप्त-II और कुमारगुप्त जैसे प्रतिभाशाली शासकों के बाद उत्तराधिकारी उतने सक्षम नहीं रहे।
आगे के शासकों में:
गुप्त साम्राज्य ने स्थानीय स्वायत्तता दी, परंतु अंत में:
इससे केंद्रीय सत्ता कमजोर हो गई।
गुप्त काल के अंतिम चरण में कई नई शक्तियाँ उभरने लगीं:
ये शक्तियाँ अलग-अलग दिशाओं में गुप्त साम्राज्य को छोटा करती चली गईं।
गुप्त साम्राज्य के अंतिम शासकों को दो वर्गों में बाँटा जाता है:
इनका शासन पाटलिपुत्र और मगध के आसपास सीमित रह गया।
विष्णुगुप्त (540 ई. के आसपास) के बाद गुप्त साम्राज्य पूर्णतः समाप्त हो गया।
कई छोटे-छोटे गुप्त राजवंशों ने अलग स्तंभ विकसित किए।
उन्हें "उत्तर गुप्त" कहा जाता है।
हूणों ने भारत में अत्याचार किए, परंतु वे लंबे समय तक टिक नहीं पाए।
आखिरकार हूणों का शासन कुछ दशक में समाप्त हो गया।
गुप्त काल का पतन एक बहुत बड़ा बदलाव लेकर आया।
भारत फिर छोटे-छोटे राज्यों में बँट गया:
कई युद्ध, विद्रोह और शक्ति संघर्ष हुए।
हूणों ने कई बौद्ध विहार और शिक्षा केंद्र नष्ट किए:
गुप्त पतन के बाद:
पतन के बाद उभरी नई ताकतें:
इन राजवंशों ने भारत को पुनः मजबूत किया।
गुप्त काल समाप्त हुआ, परंतु इसका प्रभाव आज भी कायम है।
गुप्त मूर्तिकला आज भी विश्व में आदर्श मानी जाती है:
नालंदा और तक्षशिला विश्व शिक्षा का केंद्र बने रहे।
कालिदास, भास, शूद्रक, भारवि—इनकी कृतियाँ भारत की सांस्कृतिक धरोहर हैं।
इनकी गणितीय अवधारणाएँ आज भी आधुनिक विज्ञान का आधार हैं।
गुप्त काल की प्रशासनिक प्रणाली बाद में:
द्वारा अपनाई गई।
गुप्त साम्राज्य भारतीय इतिहास का एक आदर्श युग था।
इसके शासन में:
एक साथ ऊँचाई पर पहुँचे।
गुप्त काल को भारतीय सभ्यता का “Golden Age” कहना बिल्कुल सही है।
हालाँकि पतन अवश्य हुआ, पर गुप्तों की सांस्कृतिक धरोहर आज भी भारतीय इतिहास का सबसे उज्ज्वल अध्याय है।