📖 छत्तीसगढ़ में मराठा काल : इतिहास, शासन और प्रभाव (1741 ई. – 1818 ई.)
🔰 परिचय
भारत का इतिहास अनेक राजवंशों और साम्राज्यों से जुड़ा हुआ है। छत्तीसगढ़, जो मध्य भारत का हृदयस्थल है, सदियों से राजनीतिक और सांस्कृतिक गतिविधियों का केंद्र रहा है। यहाँ के गढ़ और राज्य प्राचीन काल से लेकर मध्यकाल तक गोंड शासकों, कलचुरियों, हैहय वंश और अंततः मराठों के अधीन आए।
18वीं शताब्दी में मराठों का उदय भारत में तेजी से हुआ और उन्होंने दक्षिण, मध्य और उत्तरी भारत तक अपने साम्राज्य का विस्तार किया। छत्तीसगढ़ भी इससे अछूता नहीं रहा।
1741 ई. में मराठों ने छत्तीसगढ़ की सत्ता पर अधिकार कर लिया। यह काल 1818 ई. तक चला, जब अंग्रेजों ने तीसरे आंग्ल–मराठा युद्ध के बाद मराठों को हरा दिया। इस दौरान छत्तीसगढ़ की राजनीति, प्रशासन, समाज, अर्थव्यवस्था और संस्कृति पर गहरा प्रभाव पड़ा।
📌 मराठा शासन का आगमन – पृष्ठभूमि
1. रतनपुर और कलचुरी शासन का पतन
- छत्तीसगढ़ में कलचुरी वंश का शासन 11वीं शताब्दी से प्रारंभ हुआ था।
- कलचुरी राजाओं ने रतनपुर को अपनी राजधानी बनाया।
- उन्होंने छत्तीसगढ़ में कला, स्थापत्य, और धार्मिक संस्थानों का बड़ा विकास किया।
- परंतु 18वीं शताब्दी तक कलचुरियों की राजनीतिक शक्ति और प्रशासनिक पकड़ कमजोर हो गई।
- स्थानीय सामंत, जमींदार और गढ़ों के शासक स्वतंत्रता की ओर बढ़ने लगे।
- 1741 ई. में रतनपुर के राजा भोजराज सिंह की मृत्यु के बाद राजनीतिक अस्थिरता और सत्ता शून्यता उत्पन्न हो गई।
- यही समय मराठों के छत्तीसगढ़ में प्रवेश का कारण बना।
2. मराठों का उदय
- मराठों का मुख्य केंद्र पुणे और नागपुर था।
- 18वीं शताब्दी में पेशवाओं और भोसले वंश ने तीव्र गति से अपने राज्य का विस्तार किया।
- रघुजी भोंसले प्रथम, जो नागपुर भोसले वंश के संस्थापक थे, ने दक्षिण-पूर्व भारत (ओडिशा, छत्तीसगढ़, गोंडवाना) की ओर विस्तार किया।
- उन्होंने अपने सेनापति भास्कर पंत को छत्तीसगढ़ विजय के लिए भेजा।
3. छत्तीसगढ़ पर मराठों का अधिकार
- 1741 ई. में मराठों ने रतनपुर की ओर चढ़ाई की।
- राजा भोजराज सिंह को पराजित कर छत्तीसगढ़ पर मराठों ने पूर्ण अधिकार कर लिया।
- रतनपुर, जो कलचुरियों की राजधानी थी, अब मराठों के अधीन आ गया।
- परंतु मराठों ने प्रशासनिक दृष्टि से रायपुर को राजधानी चुना क्योंकि –
- यह भूगोल और व्यापार दोनों दृष्टि से अनुकूल था।
- यहाँ से पूरे छत्तीसगढ़ क्षेत्र पर नियंत्रण आसान था।
- नागपुर से सीधा संपर्क भी सरल था।
👑. नागपुर भोसले शासकों का शासन और छत्तीसगढ़ अब हम क्रमवार सभी शासकों के शासनकाल का विवरण देखेंगे –
🔹 (i) रघुजी भोंसले प्रथम (1739 – 1755 ई.)
- नागपुर भोसले साम्राज्य के संस्थापक।
- 1741 ई. में रतनपुर पर विजय प्राप्त कर छत्तीसगढ़ को अधीन किया।रतनपुर को प्रतीकात्मक राजधानी बनाए रखा, किंतु प्रशासन नागपुर से नियंत्रित होता रहा।
- छत्तीसगढ़ म महकूमानदारों की नियुक्ति की।
- भूमि कर बढ़ाया और किसानों से बेगार लिया।विद्रोहों को दबाने हेतु बल का प्रयोग।
- प्रभाव : छत्तीसगढ़ की स्वतंत्र सत्ता का अंत, कराधान की शुरुआत, मराठा प्रभाव का आरंभ।
🔹 (ii) जगत भीमराव भोंसले (1755 – 1788 ई.)
- रघुजी प्रथम के पुत्र।
- नागपुर की गद्दी संभालने के बाद छत्तीसगढ़ में कर वसूली और कठोर हो गई।
- परगनों में महकूमानदारों का अधिकार बढ़ा।
- रायपुर, बिलासपुर और रतनपुर प्रशासनिक केंद्र बने।
- इस काल में कईकिसानों और आदिवासियों ने विद्रोह किए, जिन्हें कठोरता से दबा दिया गया।
- प्रभाव : छत्तीसगढ़ की जनता में असंतोष, सामाजिक असमानता, मराठा प्रभुत्व की जड़ें गहरी
🔹 (iii) रघुजी भोंसले द्वितीय (1788 – 1816 ई.)
- सबसे प्रभावशाली शासक।
- छत्तीसगढ़ में मंदिरों और धर्मशालाओं का निर्माण कराया।
- रायपुर और नागपुर के बीच व्यापारिक मार्ग विकसित किए।
- 1803 ई. में अंग्रेजों से संघर्ष हुआ, किंतु धीरे-धीरे अंग्रेजों का प्रभाव बढ़ने लगा।
- इस काल में छत्तीसगढ़ की जनता पर करभार और भी अप्रभाव : प्रशासनिक संगठन मजबूत, परंतु जनता का दमन। अंग्रेजों की गतिविधियों की शुरुआत।
🔹 (iv) पारसोजी भोंसले (1816 – 1817 ई.)
- रघुजी द्वितीय के पुत्र।
- बहुत कमजोर शासक।
- प्रशासनिक अव्यवस्था बढ़ी।छत्तीसगढ़ में कर वसूली और कठोर हुई।
- इस समय अंग्रेजों ने अवसर देखकर मराठों पर दबाव बढ़ा
- प्रभाव : छत्तीसगढ़ में अस्थिरता, अंग्रेजों के हस्तक्षेप का मार्ग प्रशस्त।
🔹 (v) अप्पा साहेब भोंसले (1817 – 1818 ई.)
- नागपुर की गद्दी पर बैठे।
- अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह किया।
- 1817–18 का तीसरा आंग्ल–मराठा युद्ध हुआ।
- अंग्रेजों ने मराठों को पराजित किया।
- नागपुर राज्य अंग्रेजों के अधीन हुआ।
- परिणाम स्वरूप छत्तीसगढ़ भी अंग्रेजों के अधीन आ गया।
- प्रभाव : मराठा शासन का अंत, अंग्रेजी शासन की शुरुआत।
⚔️ मराठा प्रशासन और शासन व्यवस्था
1. राजधानी का चयन
- रायपुर को राजधानी बनाया गया।
- यहाँ मराठा शासकों ने अपनी सेना और कर संग्रह प्रणाली का केंद्र स्थापित किया।
- रायपुर में किले, चौकियाँ और सैनिक छावनियाँ बनाईं गईं।
2. शासन व्यवस्था
- छत्तीसगढ़ का प्रशासन नागपुर से नियंत्रित होता था।
- स्थानीय स्तर पर दीवान, अमात्य, और सरंजामदार जैसे अधिकारी नियुक्त किए जाते थे।
- दीवान न्याय और कर व्यवस्था देखते थे।
- अमात्य प्रशासनिक आदेशों का पालन कराते थे।
- सरंजामदार सेना और सुरक्षा के प्रभारी होते थे।
3. कर व्यवस्था
- मराठा शासन की सबसे कठोर विशेषता उसकी कर-व्यवस्था थी।
- लगान – खेती पर कर, जिसे किसानों से वसूला जाता था।
- चौथ – उपज का चौथाई हिस्सा।
- सर्देशमुखी – अतिरिक्त कर, जिसे मराठा शासकों की आमदनी बढ़ाने हेतु लगाया गया।
- वन उपज कर – महुआ, तेंदू पत्ता, लकड़ी, लाख, शहद आदि पर कर।
- इसके अलावा व्यापारियों और स्थानीय सामंतों से भी भारी कर लिया जाता था।
4. सेना और सुरक्षा
- मराठों ने छत्तीसगढ़ में कई सैनिक छावनियाँ बनाई।
- प्रमुख छावनियाँ: रायपुर, सोनाखान, खरियार, कवर्धा आदि।
- मराठा सैनिक स्थानीय गढ़ों और चौकियों पर तैनात रहते थे।
- विद्रोह दबाने के लिए कठोर दंड नीति अपनाई जाती थी।
💰 आर्थिक स्थिति
1. कृषि
- छत्तीसगढ़ की अर्थव्यवस्था कृषि पर आधारित थी।
- धान यहाँ की मुख्य फसल थी।
- लेकिन किसानों पर कर का बोझ इतना बढ़ गया कि खेती घाटे का सौदा बन गई।
- लगातार अकाल और सूखे ने स्थिति और बिगाड़ी।
2. व्यापार
- रायपुर, बिलासपुर, कवर्धा, सोनाखान प्रमुख व्यापारिक केंद्र बने।
- लोहा, तांबा, चावल, लाख, महुआ, तेंदू आदि का व्यापार होता था।
- व्यापारी वर्ग को भी भारी कर देना पड़ता था।
3. शोषण
- कर की दरें इतनी अधिक थीं कि जनता त्रस्त हो उठी।
- कई क्षेत्रों में लोग गाँव छोड़कर पलायन करने लगे।
- विद्रोह और असंतोष का बीजारोपण इसी स्थिति ने किया।
🛕 समाज और संस्कृति
1. धार्मिक प्रभाव
- मराठा शासक वैष्णव और शैव परंपरा से जुड़े थे।
- मंदिरों का निर्माण और जीर्णोद्धार हुआ।
- धार्मिक दान और पूजा-पाठ पर विशेष ध्यान दिया गया।
2. भाषा और साहित्य
- प्रशासन और दरबार में मराठी भाषा का प्रभाव पड़ा।
- मराठी लिपि का उपयोग बढ़ा।
- परंतु छत्तीसगढ़ी लोकसाहित्य और भक्ति आंदोलन ने भी समानांतर रूप से विकास किया।
3. कला और स्थापत्य
- मराठा शैली में मंदिर, कुएँ और बावड़ियाँ बनवाई गईं।
- कई जगह पर मराठा स्थापत्य कला के प्रमाण मिलते हैं।
🔥 विद्रोह और संघर्ष
1. अमर सिंह का विद्रोह (सोनाखान)
- सोनाखान क्षेत्र के नायक अमर सिंह ने करों के विरोध में विद्रोह किया।
- उन्हें “छत्तीसगढ़ का रॉबिनहुड” कहा जाता है।
- अमर सिंह गरीबों और किसानों की मदद करते थे।
- उनका विद्रोह मराठा शासन के लिए बड़ी चुनौती बन गया।
2. खरियार विद्रोह
- आदिवासी बहुल क्षेत्र खरियार में मराठों के खिलाफ विद्रोह हुआ।
- स्थानीय आदिवासी और किसान करों व शोषण के खिलाफ एकजुट हुए।
3. गोंड और किसान आंदोलन
- गोंड समुदाय ने भी कई बार हथियार उठाए।
- किसानों ने सामूहिक विद्रोह किया।
- यह विद्रोह मराठा शासन के विरुद्ध व्यापक असंतोष को दर्शाते हैं।
🇮🇳 स्वतंत्रता संग्राम की नींव
- मराठा शासन ने जनता में असंतोष और विद्रोह की भावना भर दी।
- कठोर कर, शोषण और अन्याय ने लोगों को शासन के खिलाफ खड़ा कर दिया।
- यही असंतोष आगे चलकर 1857 के संग्राम और छत्तीसगढ़ के स्वतंत्रता आंदोलन की नींव बना।
🏴 1818 – मराठों का पतन
- 1817–1818 में अंग्रेजों और मराठों के बीच तीसरा आंग्ल–मराठा युद्ध हुआ।
- मराठे इस युद्ध में हार गए।
- नागपुर और छत्तीसगढ़ दोनों अंग्रेजों के अधीन आ गए।
- रायपुर को अंग्रेजों ने प्रशासनिक मुख्यालय बनाया।
📖 निष्कर्ष
- छत्तीसगढ़ में मराठा काल (1741–1818) राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक दृष्टि से परिवर्तनकारी रहा।
- इसने प्रशासनिक केंद्रीकरण और व्यापारिक विकास तो दिया।
- परंतु कर-भार, शोषण और विद्रोह ने जनता को त्रस्त कर दिया।
- यही काल अंग्रेजी शासन और स्वतंत्रता आंदोलन की भूमिका तैयार करने वाला अध्याय साबित हुआ।
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