भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस : स्थापना एवं अधिवेशन
प्रस्तावना
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (Indian National Congress – INC) भारत के स्वतंत्रता संग्राम की सबसे प्रमुख राजनीतिक संस्था रही। 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में जब भारतीय समाज में राजनीतिक चेतना का विकास हो रहा था, तब एक संगठित मंच की आवश्यकता अनुभव की जा रही थी। इसी आवश्यकता की पूर्ति के लिए 28 दिसंबर 1885 को कांग्रेस की स्थापना हुई।
कांग्रेस ने धीरे-धीरे भारतीय जनता की आकांक्षाओं को स्वर देने का कार्य किया और स्वतंत्रता संग्राम की धुरी बन गई।
इस लेख में हम कांग्रेस की स्थापना, उसके विभिन्न अधिवेशनों, महत्वपूर्ण प्रस्तावों, नेताओं की भूमिका तथा स्वतंत्रता आंदोलन में उसके योगदान का क्रमबद्ध और विस्तृत अध्ययन करेंगे।
1. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना
1.1 ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
19वीं शताब्दी में अंग्रेज़ों के शासन ने भारतीय समाज को गहराई से प्रभावित किया। एक ओर ब्रिटिश शासन ने शिक्षा, प्रिंटिंग प्रेस, टेलीग्राफ, रेलवे और आधुनिक प्रशासनिक व्यवस्था दी, तो दूसरी ओर आर्थिक शोषण, राजनीतिक दमन और सामाजिक असमानता को भी बढ़ाया।
भारतीयों में धीरे-धीरे यह भावना प्रबल होने लगी कि उन्हें अपने अधिकारों की रक्षा के लिए संगठित होना पड़ेगा।
1.2 प्रारंभिक राजनीतिक संगठन
कांग्रेस से पहले भी भारत में कुछ क्षेत्रीय और सामाजिक संगठन बने, जिन्होंने राष्ट्रीय चेतना के बीज बोए:
- जमीनदार सभा (1837, कलकत्ता)
- ब्रिटिश इंडियन एसोसिएशन (1851)
- ईस्ट इंडिया एसोसिएशन (1866, दादाभाई नौरोजी द्वारा लंदन में स्थापित)
- इंडियन नेशनल एसोसिएशन (1876, सुरेन्द्रनाथ बनर्जी द्वारा)
ये संगठन मुख्यतः अंग्रेज़ों से अपील और याचिका के माध्यम से भारतीयों के अधिकारों की रक्षा का प्रयास कर रहे थे।
1.3 कांग्रेस की स्थापना
- कांग्रेस की स्थापना 28 दिसंबर 1885 को बंबई (मुंबई) के गोकुलदास तेजपाल संस्कृत कॉलेज में हुई।
- इसके प्रथम अधिवेशन की अध्यक्षता ए. ओ. ह्यूम (Allan Octavian Hume) – एक सेवानिवृत्त ICS अधिकारी ने की।
- प्रथम अध्यक्ष (1885) : वयोवृद्ध वकील डब्ल्यू. सी. बनर्जी (Womesh Chunder Bonnerjee) बने।
- इसमें 72 प्रतिनिधि उपस्थित हुए।
1.4 स्थापना का उद्देश्य
कांग्रेस की स्थापना के तीन प्रमुख उद्देश्य थे:
- राजनीतिक चेतना का विकास – भारतीय जनता को संगठित कर उनके राजनीतिक अधिकारों की जानकारी देना।
- ब्रिटिश शासन से संवाद – अंग्रेज़ों को याचिका और निवेदन द्वारा भारतीयों की समस्याओं से अवगत कराना।
- राष्ट्रीय एकता – भारत के विभिन्न प्रांतों, भाषाओं और धर्मों के लोगों को एक राजनीतिक मंच पर लाना।
2. कांग्रेस के प्रारंभिक अधिवेशन (1885–1905)
कांग्रेस के पहले 20 वर्ष (1885–1905) को "मध्यमपंथी युग" कहा जाता है। इस दौर में कांग्रेस की माँगें सीमित थीं और उसकी कार्यप्रणाली अत्यंत सौम्य थी।
2.1 प्रथम अधिवेशन (1885, बंबई)
- अध्यक्ष : डब्ल्यू. सी. बनर्जी
- उपस्थित प्रतिनिधि : 72
- मुख्य माँगें :
- विधायिकाओं का विस्तार
- भारतीयों को उच्च प्रशासनिक सेवाओं में अवसर
- प्रेस की स्वतंत्रता
- भारत में तकनीकी और वैज्ञानिक शिक्षा का विकास
2.2 द्वितीय अधिवेशन (1886, कलकत्ता)
- अध्यक्ष : दादाभाई नौरोजी
- विशेषता : कांग्रेस और सुरेन्द्रनाथ बनर्जी के "इंडियन नेशनल एसोसिएशन" का विलय हुआ।
- यह अधिवेशन अधिक प्रतिनिधिक बन गया।
2.3 तृतीय अधिवेशन (1887, मद्रास)
- अध्यक्ष : बदरुद्दीन तैयबजी (कांग्रेस के प्रथम मुस्लिम अध्यक्ष)
- महत्त्व : हिंदू–मुस्लिम एकता की नींव रखी गई।
2.4 चतुर्थ अधिवेशन (1888, इलाहाबाद)
- अध्यक्ष : जॉर्ज यूल (कांग्रेस के प्रथम अंग्रेज अध्यक्ष)
- इस अधिवेशन में यह संदेश दिया गया कि कांग्रेस केवल भारतीयों की नहीं, बल्कि सभी न्यायप्रिय व्यक्तियों की संस्था है।
2.5 पाँचवाँ अधिवेशन (1889, बंबई)
- अध्यक्ष : सर विलियम वेडरबर्न
- यहाँ कांग्रेस ने पहली बार "भारतीयों को प्रशासनिक सेवा में समान अवसर" देने की माँग को जोर-शोर से उठाया।
3. कांग्रेस और प्रारंभिक माँगें
प्रारंभिक कांग्रेस नेताओं को बाद में मध्यमपंथी (Moderates) कहा गया।
प्रमुख मध्यमपंथी नेता थे:
- दादाभाई नौरोजी
- गोपाल कृष्ण गोखले
- फिरोजशाह मेहता
- सुरेन्द्रनाथ बनर्जी
इनकी प्रमुख माँगें थीं:
- ब्रिटिश संसद में भारतीय प्रतिनिधित्व
- बजट की आलोचना (दादाभाई नौरोजी का "ड्रेन थ्योरी")
- प्रशासनिक सेवाओं में भारतीयों की नियुक्ति
- प्रेस की स्वतंत्रता
- भारतीय अर्थव्यवस्था में सुधार
इनका विश्वास था कि संवैधानिक और शांतिपूर्ण तरीकों से ही सुधार संभव है।
4. कांग्रेस का विस्तार और प्रभाव
- 1885 से 1905 तक कांग्रेस ने भारतीय समाज में राजनीतिक चेतना का बीजारोपण किया।
- किसानों, विद्यार्थियों, वकीलों और शिक्षित वर्ग में राजनीतिक जागरूकता बढ़ी।
- राष्ट्रीय एकता की भावना प्रबल हुई।
- कांग्रेस की गतिविधियों से ब्रिटिश सरकार को भी धीरे-धीरे भारतीयों की शक्ति का अहसास हुआ।
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस : स्थापना एवं अधिवेशन (Part–2)
1. कांग्रेस में परिवर्तन की भूमिका (1905 के बाद)
1885 से 1905 तक कांग्रेस का नेतृत्व मध्यमपंथी नेताओं (Moderates) के हाथ में रहा। लेकिन धीरे-धीरे यह महसूस होने लगा कि अंग्रेज़ सरकार भारतीयों की याचिकाओं और निवेदनों को अनदेखा कर रही है।
- आर्थिक शोषण बढ़ रहा था।
- किसानों और मजदूरों की स्थिति बदतर थी।
- ब्रिटिश शासन की दमनकारी नीतियाँ तेज़ हो रही थीं।
- इस असंतोष ने कांग्रेस के भीतर नए नेतृत्व – उग्रपंथी नेताओं (Extremists) को जन्म दिया।
प्रमुख उग्रपंथी नेता
- बाल गंगाधर तिलक – "लोकमान्य" के नाम से प्रसिद्ध
- बिपिन चंद्र पाल – "भारतीय क्रांति के पिता"
- लाला लाजपत राय – "पंजाब केसरी"
इन तीनों को मिलाकर "लाल, बाल, पाल" कहा जाता है।
इन नेताओं का मानना था कि –
"स्वराज्य हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है और हम इसे लेकर रहेंगे।" (बाल गंगाधर तिलक)
2. बंगाल विभाजन और स्वदेशी आंदोलन (1905–1908)
2.1 बंगाल विभाजन (1905)
- वायसराय लॉर्ड कर्ज़न ने 16 अक्टूबर 1905 को बंगाल का विभाजन कर दिया।
- कारण बताया गया – बंगाल बहुत बड़ा है, प्रशासन चलाना कठिन है।
- वास्तविक उद्देश्य – हिंदू–मुस्लिम एकता तोड़ना और "फूट डालो और राज करो" की नीति लागू करना।
- विभाजन के तहत –
- पूर्वी बंगाल और असम (मुस्लिम बहुल क्षेत्र)
- पश्चिमी बंगाल, बिहार और उड़ीसा (हिंदू बहुल क्षेत्र)
2.2 स्वदेशी आंदोलन
बंगाल विभाजन के विरोध में स्वदेशी आंदोलन का आरंभ हुआ।
- विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार
- स्वदेशी वस्तुओं का प्रयोग
- राष्ट्रीय शिक्षा संस्थानों की स्थापना
- सार्वजनिक आंदोलन, सभाएँ, जुलूस
- इस आंदोलन ने भारतीय जनता को बड़े पैमाने पर राजनीति से जोड़ दिया।
2.3 उग्रपंथी बनाम मध्यमपंथी
- मध्यमपंथी नेता चाहते थे कि आंदोलन केवल "प्रार्थना और निवेदन" तक सीमित रहे।
- उग्रपंथी नेता बहिष्कार, स्वदेशी, राष्ट्रीय शिक्षा और जनांदोलन की ओर बढ़ना चाहते थे।
- दोनों के बीच मतभेद तीव्र होते गए।
3. कांग्रेस का विभाजन : सूरत अधिवेशन (1907)
3.1 पृष्ठभूमि
- 1906 के कलकत्ता अधिवेशन में दादाभाई नौरोजी ने पहली बार "स्वराज्य" को कांग्रेस का लक्ष्य घोषित किया।
- इससे उग्रपंथियों का मनोबल बढ़ा।
3.2 सूरत अधिवेशन (1907)
- स्थान : सूरत (गुजरात)
- मध्यमपंथी अध्यक्ष : रशीदुल्ला
- उग्रपंथी चाहते थे कि अध्यक्ष लोकमान्य तिलक बने।
- दोनों पक्षों में तीव्र विवाद हुआ और कांग्रेस दो गुटों में बंट गई –
- मध्यमपंथी गुट (Moderates)
- उग्रपंथी गुट (Extremists)
3.3 परिणाम
- 1907 से 1915 तक कांग्रेस बिखरी रही।
- इस अवधि को "राजनीतिक ठहराव का युग" कहा जाता है।
- अंग्रेज़ सरकार ने उग्रपंथियों पर दमन किया।
- तिलक को कारावास (1908)
- लाला लाजपत राय को निर्वासित
4. मुस्लिम लीग की स्थापना (1906)
- 30 दिसंबर 1906 को ढाका में मुस्लिम नेताओं ने "ऑल इंडिया मुस्लिम लीग" की स्थापना की।
- उद्देश्य : मुसलमानों के राजनीतिक अधिकारों की रक्षा।
- ब्रिटिश सरकार ने इसे बढ़ावा दिया ताकि कांग्रेस की राष्ट्रीय एकता कमजोर हो।
- 1909 में मॉर्ले-मिंटो सुधार के तहत "अलग निर्वाचन क्षेत्र (Separate Electorates)" की व्यवस्था दी गई।
5. कांग्रेस का पुनर्मिलन : लखनऊ अधिवेशन (1916)
5.1 पृष्ठभूमि
- प्रथम विश्व युद्ध (1914–1918) के दौरान भारत में राजनीतिक गतिविधियाँ तेज़ हुईं।
- युद्ध में भारत से सैनिक और धन लिया गया, लेकिन बदले में कोई सुधार नहीं किया गया।
- मध्यमपंथी और उग्रपंथी समझ गए कि एकता के बिना आंदोलन आगे नहीं बढ़ सकता।
5.2 लखनऊ अधिवेशन (1916)
- अध्यक्ष : ए. सी. मजूमदार
- इसमें दो महत्वपूर्ण घटनाएँ हुईं –
- कांग्रेस में पुनर्मिलन – मध्यमपंथी और उग्रपंथी गुट फिर से एकजुट हो गए।
- कांग्रेस–लीग समझौता (Lucknow Pact) –
- कांग्रेस और मुस्लिम लीग ने मिलकर सुधारों की माँग की।
- अलग निर्वाचन क्षेत्र की व्यवस्था को अस्थायी रूप से मान्यता दी।
5.3 महत्व
- लखनऊ अधिवेशन ने भारतीय राजनीति में एक नया मोड़ दिया।
- हिंदू–मुस्लिम एकता की झलक दिखाई दी।
- ब्रिटिश सरकार पर दबाव बढ़ा।
6. होम रूल आंदोलन (1916–1918)
6.1 प्रेरणा
- युद्धकालीन परिस्थितियों में भारतीयों को स्वराज्य की माँग उठानी पड़ी।
इस आंदोलन की प्रेरणा आयरलैंड के "होम रूल आंदोलन" से मिली।
6.2 नेतृत्व
- बाल गंगाधर तिलक (पुणे से)
- एनी बेसेंट (आयरिश महिला, थियोसोफिकल सोसायटी से जुड़ी)
6.3 उद्देश्य
- "भारत में स्वराज्य की स्थापना"
स्वशासन की माँग
6.4 प्रभाव
- इस आंदोलन ने राजनीतिक चेतना को गाँव–गाँव तक पहुँचाया।
- कांग्रेस के भीतर नई ऊर्जा का संचार हुआ।
- ब्रिटिश सरकार ने एनी बेसेंट को गिरफ्तार किया, जिससे आंदोलन और भी प्रबल हुआ।
7. मोंटेग्यू घोषणा (1917)
- ब्रिटिश सरकार ने युद्धकाल में भारतीयों को शांत करने के लिए 20 अगस्त 1917 को घोषणा की –
"भारत में धीरे-धीरे स्वशासन की स्थापना की जाएगी।"
- इसे मोंटेग्यू घोषणा कहा जाता है।
- इससे भारतीयों में आशा तो जगी, लेकिन यह स्पष्ट नहीं किया गया कि "धीरे-धीरे" का अर्थ क्या होगा।
8. प्रथम विश्व युद्ध का प्रभाव
- भारत ने ब्रिटेन की ओर से युद्ध में भाग लिया।
- 13 लाख से अधिक भारतीय सैनिक विदेशों में लड़े।
- युद्ध खर्च के लिए कर और राजस्व बढ़ाए गए।
- महँगाई और अकाल जैसी समस्याएँ बढ़ीं।
- युद्ध के बाद भारतीयों ने अपेक्षा की कि उन्हें "स्वशासन" मिलेगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
9. गांधी युग की शुरुआत (1915–1920)
9.1 गांधी का भारत आगमन
- मोहनदास करमचंद गांधी 1915 में दक्षिण अफ्रीका से लौटे।
- उन्होंने भारतीय राजनीति में प्रवेश करने से पहले छोटे-छोटे आंदोलनों का नेतृत्व किया:
- चंपारण सत्याग्रह (1917)
- खेड़ा सत्याग्रह (1918)
- अहमदाबाद मिल मज़दूर हड़ताल (1918)
9.2 कांग्रेस में गांधी का प्रभाव
- गांधी ने "अहिंसा और सत्याग्रह" की नीति अपनाई।
- इससे कांग्रेस का स्वरूप बदल गया –
- मध्यमपंथ और उग्रपंथ की जगह गांधीवादी नेतृत्व स्थापित हुआ।
- अब कांग्रेस गाँव–गाँव तक पहुँचने लगी।
10. कांग्रेस के अधिवेशन (1905–1920) : संक्षेप में

निष्कर्ष
1905 से 1920 तक का दौर भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण रहा।
- कांग्रेस ने याचना की राजनीति से आगे बढ़कर जनांदोलन का रूप लिया।
- उग्रपंथियों ने "स्वराज्य" की माँग को स्पष्ट किया।
- बंगाल विभाजन और स्वदेशी आंदोलन ने जनता को पहली बार बड़े पैमाने पर राजनीति से जोड़ा।
- लखनऊ अधिवेशन ने कांग्रेस और मुस्लिम लीग को करीब लाया।
- होम रूल आंदोलन ने स्वतंत्रता की माँग को व्यापक बनाया।
- गांधीजी के आगमन ने कांग्रेस को एक नई दिशा दी, जो आगे चलकर स्वतंत्रता आंदोलन का मुख्य आधार बनी।
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस : स्थापना एवं अधिवेशन (1920–1947 : गांधी युग) (Part–3)
1. नागपुर अधिवेशन (1920) और असहयोग आंदोलन
1.1 पृष्ठभूमि
- 1919 में आया रॉलेट एक्ट (काला कानून) → बिना मुकदमे के गिरफ्तारी की अनुमति।
- 13 अप्रैल 1919 को जलियाँवाला बाग नरसंहार (अमृतसर, जनरल डायर द्वारा)।
- 1919 में आया मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार (Government of India Act 1919) लेकिन यह अपेक्षा से बहुत कम था।
1.2 नागपुर अधिवेशन (1920)
- अध्यक्ष : सी. आर. दास
- कांग्रेस ने पहली बार बड़े पैमाने पर असहयोग आंदोलन का प्रस्ताव पारित किया।
- उद्देश्य :
- सरकारी स्कूलों और कॉलेजों का बहिष्कार
- विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार
- सरकारी पदों और उपाधियों का त्याग
- स्वदेशी शिक्षा और उद्योग को प्रोत्साहन
1.3 असहयोग आंदोलन (1920–1922)
- गांधीजी के नेतृत्व में भारत का पहला राष्ट्रव्यापी आंदोलन।
- विद्यार्थियों ने स्कूल छोड़े, वकीलों ने प्रैक्टिस छोड़ी, मजदूर–किसान आंदोलन में शामिल हुए।
- 1921 तक आंदोलन उग्र रूप लेने लगा।
1.4 असहयोग आंदोलन की समाप्ति
- फरवरी 1922 में चौरी-चौरा कांड (गोरखपुर, उत्तर प्रदेश) → पुलिस थाने में भीड़ ने आग लगा दी, 22 सिपाही मारे गए।
- गांधीजी ने तुरंत आंदोलन वापस ले लिया।
- कई नेता निराश हुए, लेकिन गांधीजी ने स्पष्ट किया कि "अहिंसा से समझौता नहीं।"
2. स्वराज पार्टी और नेहरू रिपोर्ट
2.1 स्वराज पार्टी की स्थापना (1923)
- असहयोग आंदोलन की वापसी से कांग्रेस में मतभेद।
- चितरंजन दास (सी. आर. दास) और मोतीलाल नेहरू ने "स्वराज पार्टी" बनाई।
- उद्देश्य : चुनाव लड़कर विधान परिषदों में प्रवेश करना और वहाँ ब्रिटिश सरकार की नीतियों का विरोध करना।
2.2 साइमन कमीशन (1927)
- 1927 में ब्रिटिश सरकार ने भारत में "संविधान सुधार" के लिए साइमन कमीशन भेजा।
- इसमें कोई भी भारतीय सदस्य नहीं था।
- पूरे भारत में नारा उठा : "साइमन गो बैक"
- इसी आंदोलन में लाला लाजपत राय पर पुलिस लाठीचार्ज हुआ, जिससे उनकी मृत्यु हो गई।
2.3 नेहरू रिपोर्ट (1928)
- ब्रिटिश सरकार ने भारतीयों से "संविधान बनाने" का सुझाव दिया।
- मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में "नेहरू समिति" बनी।
- प्रमुख बिंदु :
- भारत में डोमिनियन स्टेटस
- मौलिक अधिकारों की गारंटी
- अलग निर्वाचन क्षेत्र का विरोध (लेकिन मुस्लिम लीग असहमत रही)
3. लाहौर अधिवेशन (1929) और पूर्ण स्वराज
- अध्यक्ष : जवाहरलाल नेहरू
- स्थान : रावी नदी तट, लाहौर
- कांग्रेस ने पहली बार स्पष्ट घोषणा की –
"पूर्ण स्वराज ही हमारा लक्ष्य है।"
- 26 जनवरी 1930 को "पूर्ण स्वराज दिवस" मनाया गया।
- बाद में यही तिथि (26 जनवरी) भारत के संविधान लागू होने की (1950) तिथि बनी।
4. सविनय अवज्ञा आंदोलन (1930–1934)
4.1 डांडी यात्रा
- गांधीजी ने 12 मार्च 1930 को साबरमती आश्रम से 78 अनुयायियों के साथ डांडी यात्रा शुरू की।
- 390 किमी पैदल यात्रा कर 6 अप्रैल 1930 को समुद्र तट पर पहुँचकर नमक कानून तोड़ा।
- इससे पूरे देश में "नमक सत्याग्रह" छिड़ गया।
4.2 विशेषताएँ
- विदेशी कपड़ों का बहिष्कार
- करों का भुगतान न करना
- जन आंदोलनों में व्यापक भागीदारी – किसान, महिलाएँ, मजदूर, विद्यार्थी
4.3 गांधी–इर्विन समझौता (1931)
- अंग्रेज सरकार और गांधीजी के बीच समझौता हुआ।
- गांधीजी ने सविनय अवज्ञा आंदोलन स्थगित किया और दूसरे गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने लंदन गए।
- लेकिन सम्मेलन असफल रहा।
4.4 आंदोलन की वापसी
- 1932 में आंदोलन फिर से शुरू हुआ, लेकिन अंग्रेज़ों के दमन और गिरफ्तारी से धीरे-धीरे कमजोर पड़ गया।
- 1934 में गांधीजी ने इसे वापस ले लिया।
5. 1935 का भारत सरकार अधिनियम
- ब्रिटेन ने Government of India Act 1935 लागू किया।
- प्रमुख प्रावधान :
- प्रांतीय स्वायत्तता
- संघीय संरचना (लेकिन लागू नहीं हुई)
- अलग निर्वाचन प्रणाली जारी
- 1937 में कांग्रेस ने चुनावों में भाग लिया और अधिकांश प्रांतों में सरकार बनाई।
6. द्वितीय विश्व युद्ध और भारत छोड़ो आंदोलन
6.1 द्वितीय विश्व युद्ध (1939–1945)
- ब्रिटेन ने बिना भारतीय नेताओं से परामर्श किए, भारत को युद्ध में झोंक दिया।
- इसके विरोध में 1939 में कांग्रेस मंत्रिमंडल ने इस्तीफा दे दिया।
6.2 अगस्त प्रस्ताव (1940)
- ब्रिटिश सरकार ने वादा किया कि युद्ध के बाद भारत को "डोमिनियन स्टेटस" मिलेगा।
भारतीय नेताओं ने इसे अस्वीकार कर दिया।
6.3 क्रिप्स मिशन (1942)
- सर स्टैफोर्ड क्रिप्स भारत आए।
- प्रस्ताव : युद्ध के बाद भारत को पूर्ण स्वतंत्रता, लेकिन तत्काल कुछ नहीं।
- कांग्रेस और मुस्लिम लीग दोनों ने इसे खारिज कर दिया।
6.4 भारत छोड़ो आंदोलन (1942)
- अखिल भारतीय कांग्रेस समिति ने 8 अगस्त 1942 को बंबई (ग्वालिया टैंक मैदान) में "भारत छोड़ो आंदोलन" का प्रस्ताव पारित किया।
- गांधीजी का नारा :
"अंग्रेज़ो भारत छोड़ो" और "करो या मरो"
- गांधीजी सहित सभी बड़े नेता गिरफ्तार कर लिए गए।
- आंदोलन हिंसक रूप लेने लगा – रेल की पटरियाँ उखाड़ी गईं, डाक-तार तोड़े गए।
- यह आंदोलन 1944 तक चलता रहा और ब्रिटिश सरकार हिल गई।
7. स्वतंत्रता की ओर
7.1 कैबिनेट मिशन (1946)
- ब्रिटिश सरकार ने भारत में सत्ता हस्तांतरण की रूपरेखा बनाने के लिए कैबिनेट मिशन भेजा।
- प्रस्ताव :
- भारत में संघीय संरचना
- प्रांतीय स्वायत्तता
- संविधान सभा का गठन
- कांग्रेस ने स्वीकार किया, लेकिन मुस्लिम लीग ने "पाकिस्तान" की माँग पर अड़ गई।
7.2 अंतरिम सरकार (1946)
- जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में अंतरिम सरकार बनी।
- इसमें मुस्लिम लीग के सदस्य भी शामिल हुए।
7.3 विभाजन और स्वतंत्रता (1947)
- 3 जून 1947 को लॉर्ड माउंटबेटन ने विभाजन की घोषणा की।
- 15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र हुआ।
- कांग्रेस का लंबा संघर्ष सफल हुआ, लेकिन देश का बंटवारा भी हुआ।
8. प्रमुख कांग्रेस अधिवेशन (1920–1947)

निष्कर्ष (Part–3)
1920 से 1947 तक कांग्रेस का स्वरूप पूरी तरह बदल गया।
- गांधीजी के नेतृत्व में कांग्रेस गाँव–गाँव तक पहुँची और एक जनांदोलन का रूप ले ली।
- असहयोग, सविनय अवज्ञा और भारत छोड़ो आंदोलन ने ब्रिटिश शासन की नींव हिला दी।
- कांग्रेस के अधिवेशनों में लिए गए निर्णय भारत की स्वतंत्रता की आधारशिला बने।
- अंततः 15 अगस्त 1947 को भारत आज़ाद हुआ।
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस : स्थापना एवं अधिवेशन (1947 के बाद का दौर) (Part–4)
1. स्वतंत्रता के बाद कांग्रेस की स्थिति
15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र हुआ। उस समय कांग्रेस केवल एक राजनीतिक दल ही नहीं, बल्कि राष्ट्र की सबसे बड़ी संगठनात्मक शक्ति थी।
- स्वतंत्रता संग्राम के दौरान कांग्रेस ने करोड़ों भारतीयों को संगठित किया।
- स्वतंत्रता के बाद कांग्रेस सत्ता में आई और उसने भारत के निर्माण की जिम्मेदारी संभाली।
- जवाहरलाल नेहरू देश के पहले प्रधानमंत्री बने और सरदार वल्लभभाई पटेल, राजेन्द्र प्रसाद, मौलाना अबुल कलाम आज़ाद जैसे नेता महत्वपूर्ण पदों पर आए।
2. संविधान सभा और कांग्रेस की भूमिका
- संविधान सभा का गठन 1946 में हुआ था।
- कांग्रेस के अधिकांश नेता इसमें शामिल थे और भारत का संविधान (26 जनवरी 1950) कांग्रेस नेतृत्व में तैयार हुआ।
- संविधान सभा के अध्यक्ष : डॉ. राजेन्द्र प्रसाद
- प्रारूप समिति के अध्यक्ष : डॉ. भीमराव अंबेडकर
- नेहरू, पटेल, आज़ाद, गोविंद बल्लभ पंत जैसे कांग्रेस नेताओं ने संविधान निर्माण में निर्णायक योगदान दिया।
3. कांग्रेस के प्रमुख अधिवेशन (1947–1964)
3.1 जयपुर अधिवेशन (1948)
- अध्यक्ष : पट्टाभि सीतारमैया
- उद्देश्य : स्वतंत्रता के बाद कांग्रेस को सत्ता दल और संगठनात्मक दल, दोनों रूपों में ढालना।
3.2 भोपाल अधिवेशन (1949)
- संगठनात्मक ढाँचे को नया रूप दिया गया।
प्रांतीय कांग्रेस समितियों को अधिक अधिकार मिले।
3.3 नागपुर अधिवेशन (1959)
- अध्यक्ष : इंदिरा गांधी (उस समय कांग्रेस अध्यक्ष)
- प्रस्ताव : सहकारी कृषि (Co-operative Farming) का समर्थन।
- यह अधिवेशन "समाजवादी दिशा" की ओर कांग्रेस की प्रतिबद्धता का प्रतीक था।
4. नेहरू युग (1947–1964)
4.1 नीति और विचारधारा
- कांग्रेस ने लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता को अपनाया।
- पंचवर्षीय योजनाओं के माध्यम से समाजवादी पैटर्न पर आर्थिक विकास की कोशिश की।
- विदेश नीति : गुटनिरपेक्ष आंदोलन की स्थापना (1955, नेहरू–नासिर–टीटो)।
4.2 चुनौतियाँ
- विभाजन की पीड़ा और शरणार्थी समस्या
- हैदराबाद, जूनागढ़ और कश्मीर का भारत में विलय (पटेल के नेतृत्व में)
- 1962 का चीन युद्ध (नेहरू युग का सबसे बड़ा झटका)
5. कांग्रेस का संगठनात्मक बदलाव
स्वतंत्रता के बाद कांग्रेस धीरे-धीरे राष्ट्रीय आंदोलन से एक राजनीतिक पार्टी में बदल गई।
- 1950–60 के दशक में कांग्रेस हर स्तर पर हावी रही।
- पंचायत से लेकर संसद तक कांग्रेस का वर्चस्व था।
- धीरे-धीरे संगठन में "सत्ता मोह" और "गुटबाज़ी" बढ़ने लगी।
6. इंदिरा युग (1966–1984)
6.1 इंदिरा गांधी का उदय
- 1966 में लाल बहादुर शास्त्री की मृत्यु के बाद इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री बनीं।
- उन्होंने कांग्रेस को एक नई दिशा दी।
6.2 कांग्रेस का विभाजन (1969)
- कांग्रेस दो भागों में बँट गई :
- कांग्रेस (O) – संगठनवादी गुट
- कांग्रेस (R) – इंदिरा गांधी का गुट
- इंदिरा गांधी का गुट मजबूत हुआ और वही बाद में असली कांग्रेस कहलाया।
6.3 प्रमुख अधिवेशन
- अलाहाबाद अधिवेशन (1972) : "गरीबी हटाओ" का नारा।
- चंडीगढ़ अधिवेशन (1975) : आपातकाल की पृष्ठभूमि।
6.4 आपातकाल (1975–1977)
- 25 जून 1975 को इंदिरा गांधी ने आपातकाल लागू किया।
- विपक्षी नेता जेल में डाले गए, प्रेस पर सेंसरशिप।
- इससे कांग्रेस की छवि को गहरी चोट पहुँची।
7. राजीव गांधी से नरसिंह राव तक
7.1 राजीव गांधी (1984–1989)
- इंदिरा गांधी की हत्या के बाद राजीव प्रधानमंत्री बने।
- आधुनिक तकनीक, कंप्यूटर और दूरसंचार के क्षेत्र में सुधार।
- लेकिन बोफोर्स घोटाले से उनकी छवि प्रभावित हुई।
7.2 नरसिंह राव (1991–1996)
- उनके कार्यकाल में आर्थिक उदारीकरण (Liberalisation, Privatisation, Globalisation – LPG) लागू हुआ।
- डॉ. मनमोहन सिंह को वित्त मंत्री बनाया गया।
- इससे भारतीय अर्थव्यवस्था में ऐतिहासिक बदलाव आया।
8. आधुनिक दौर में कांग्रेस
8.1 यूपीए सरकार (2004–2014)
- सोनिया गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने गठबंधन (UPA) सरकार बनाई।
- प्रधानमंत्री : डॉ. मनमोहन सिंह
- उपलब्धियाँ :
- मनरेगा (रोज़गार गारंटी योजना)
- सूचना का अधिकार अधिनियम (RTI)
- शिक्षा का अधिकार अधिनियम
- चुनौतियाँ :
- भ्रष्टाचार के आरोप (2G, कोयला घोटाला)
- अन्ना हजारे का आंदोलन (2011)
8.2 2014 के बाद कांग्रेस
- 2014 और 2019 लोकसभा चुनावों में कांग्रेस की बड़ी हार।
- भारतीय जनता पार्टी (BJP) का प्रभुत्व बढ़ा।
- कांग्रेस संगठनात्मक संकट से जूझ रही है।
- राहुल गांधी और प्रियंका गांधी सक्रिय नेतृत्व देने की कोशिश कर रहे हैं।
9. कांग्रेस के अधिवेशन (1947 के बाद – चुनिंदा)

10. आधुनिक राजनीति पर कांग्रेस का प्रभाव
- कांग्रेस ने लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता और समाजवाद की नींव डाली।
- संविधान निर्माण से लेकर पंचवर्षीय योजनाओं तक कांग्रेस का योगदान रहा।
- आधुनिक भारत की विदेश नीति (गुटनिरपेक्षता, शांति, परमाणु नीति) कांग्रेस की देन है।
- आज भले ही कांग्रेस कमजोर हो, लेकिन भारतीय राजनीति में उसकी विरासत अमिट है।
निष्कर्ष (Part–4)
1947 के बाद कांग्रेस ने भारत के राष्ट्रनिर्माण में केंद्रीय भूमिका निभाई।
- नेहरू युग में लोकतंत्र और समाजवाद की नींव पड़ी।
- इंदिरा युग में कांग्रेस ने राजनीति को जनकल्याण और "गरीबी हटाओ" से जोड़ा, लेकिन आपातकाल से उसकी छवि धूमिल हुई।
- नरसिंह राव और मनमोहन सिंह युग में कांग्रेस ने भारत को वैश्विक आर्थिक शक्ति बनाने की राह दिखाई।
- 2014 के बाद कांग्रेस कमजोर ज़रूर हुई है, परंतु आज भी यह दल भारतीय लोकतंत्र और राजनीति का अभिन्न अंग है।