
यह लेख भारतीय संविधान के भाग I (The Union and its Territory) — अर्थात् अनुच्छेद 1 से 4 — का विस्तृत परिचय, अर्थ, ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और व्यावहारिक निहितार्थ देता है। इसमें संविधान के लेखों का भावार्थ, संसद के पास राज्यों/केंद्र-शासित प्रदेशों के निर्माण व संगठन के संबंध में जो शक्ति दी गई है उसका विश्लेषण, और कुछ प्रमुख उदाहरण (जैसे सिक्किम का सम्मिलन तथा तेलंगाना का निर्माण) दिए गए हैं ताकि पाठक विधिक तथा प्रशासनिक दोनों दृष्टियों से विषय को समझ सकें।
भारत का संविधान 'संघ' — Union of States — के रूप में रचा गया है। संघीय प्रावधान यह स्पष्ट करते हैं कि भारत राज्यों का संघ है; परंतु भारत की संघीयता में केंद्रीयकृत तत्व भी हैं जिसका अर्थ यह हुआ कि राज्यों का स्वायत्ततापूर्ण अस्तित्व होते हुए भी संसद एवं केन्द्र को कुछ विशिष्ट — परन्तु शक्तिशाली — अधिकार प्राप्त हैं। भाग I (अनु. 1–4) इन बुनियादी सीमाओं और प्रक्रियाओं को निर्धारित करता है।
संविधान की आधिकारिक संरचना और अनुच्छेदों की सूची संसद / विधि-स्रोतों पर उपलब्ध है। (आधिकारिक स्रोत देखें)।
अनुच्छेद 1 कहता है: “India, that is Bharat, shall be a Union of States.” — अर्थात् भारत (इण्डिया) राज्यों का एक संघ होगा। साथ ही यह अनुच्छेद बताता है कि राज्यों तथा केन्द्र-शासित प्रदेशों के क्षेत्र पहली अनुसूची में निर्दिष्ट होंगे और भारत के राज्यपरिमाण में वे क्षेत्र, संघ-क्षेत्र तथा जो अन्य क्षेत्र अधिग्रहीत किए जाएँ, सम्मिलित होंगे।
अनुच्छेद 1 इस बात पर भी प्रकाश डालता है कि केंद्र का सिद्धान्तिक प्रभुत्व सीमित है—परंतु वह प्रभुत्व संवैधानिक शक्तियों और संसदिक व्यवस्थाओं के माध्यम से साकार होता है। कई न्यायिक निर्णयों में अनुच्छेद 1 के संघात्मक स्वरूप को संविधान के “मूल संरचना” के संदर्भ में देखा गया है (विस्तृत केस लॉ यहाँ की प्रकृति के अनुरूप अलग-अलग संदर्भों में आता है)।
अनुच्छेद 2 संसद को यह शक्ति देता है कि वह किसी नए राज्य को संघ में प्रवेश कराने या किसी नए राज्य की स्थापना करने के लिए विधि (कानून) पास कर सकती है और वह ऐसा कर सकती है उन शर्तों और प्रावधानों के अनुसार जो वह उचित समझे।
जब संसद किसी क्षेत्र को संघ में शामिल करने का निर्णय लेती है, तो यह विधि-प्रक्रिया संसद के दोनों सदनों में पारित होने वाली साधारण विधि के माध्यम से हो सकती है, और साथ ही आवश्यकतानुसार अनुसूचियों में संशोधन किए जाते हैं। अनुच्छेद 2 की शक्ति व्यापक है—परन्तु यह भी संवैधानिक तथा राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में संवेदनशील रहती है (राष्ट्रकूटिकरण, सीमा-नीति, अंतरराष्ट्रीय समझौते आदि से संबंधित)।
अनुच्छेद 3 संसद को अधिकार देता है कि वह कानून बनाकर :-
(a) किसी राज्य के किसी भाग को अलग करके नया राज्य बना सके।
(b) दो या अधिक राज्यों/भागों को मिलाकर नया राज्य बना सके।
(c) किसी राज्य का क्षेत्र बढ़ा या घटा सके।
(d) सीमाएँ बदल सके।
(e) किसी राज्य का नाम बदल सके। परन्तु ऐसा विधेयक राष्ट्रपति की सिफारिश पर ही संसद में प्रस्तुत किया जा सकता है और यदि यह किसी राज्य के क्षेत्र/सीमा/नाम को प्रभावित करता है तो राष्ट्रपति उस राज्य की विधान सभा से विचार-विमर्श करवा सकता है।
जो सबसे ताज़ा और प्रसिद्ध मामला है वह है तेलंगाना का गठन — जिसके लिए संसद ने Andhra Pradesh Reorganisation Act, 2014 पारित किया और तेलंगाना का गठन 2 जून 2014 को हुआ। यह अनुच्छेद 3 की प्रक्रिया का वास्तविक, संवेदनशील और राजनीतिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण उदाहरण है।
अनुच्छेद 3 से स्पष्ट होता है कि राज्यों के पुनर्गठन का दायरा संविधान ने केन्द्र को देकर रखा है परन्तु राज्यों की विधान सभाओं की राय लेने का प्रावधान यह दर्शाता है कि केन्द्र-विचार-विनिमय की आवश्यकता संवैधानिक रूप से मान्य की गई है। इसको लेकर न्यायालयों में भी कई बार प्रश्न उठे हैं—विशेषकर “कहाँ तक राष्ट्रपति द्वारा मांगी गई राय वैधानिक बाध्य शक्ति रखती है” जैसे मुद्दों पर।
जब भी अनुच्छेद 2 या 3 के अनुसार कोई विधि (Act) बनती है, तो उस विधि में पहली और चौथी अनुसूची (First and Fourth Schedules) के संशोधन तथा उससे उत्पन्न अनुपूरक, आनुषंगिक और पारिणामिक प्रावधानों का प्रावधान भी रखा जाना चाहिए। और ये विशेष विधियाँ संविधान के अनुच्छेद 368 (संशोधन की सामान्य प्रक्रिया) के अंतर्गत 'संविधान संशोधन' नहीं मानी जाएँगी।
सिक्किम को भारत में शामिल करने की प्रक्रिया ने अनुच्छेद 2/4 के व्यवहारिक अर्थ स्पष्ट किए — 1975 में सिक्किम की स्थिति पर संवैधानिक संशोधन व विधायी कार्यवाही हुई और सिक्किम को भारत का राज्य बनाया गया। यह दिखाता है कि कभी-कभी विदेशी-सम्बन्धित या संधिगत पृष्ठभूमि वाले प्रदेशों को संविधान में समायोजित करने के लिए विशेष कानूनी रास्ते अपनाने पड़ते हैं।
तेलंगाना का मामला बताता है कि सामाजिक-राजनीतिक मांगों, क्षेत्रीय आकांक्षाओं और संसदीय/राजनीतिक संतुलन के बीच किस प्रकार अनुच्छेद 3 के अन्तर्गत पुनर्गठन होता है। संसद ने री-ऑर्गनाइज़ेशन एक्ट पारित किया, अनुसूचियाँ संशोधित कीं और नया राज्य अस्तित्व में आया।
अनुच्छेद 1–4 पर कभी-कभी निम्नलिखित प्रकार के प्रश्न उठते हैं:
Q1: अनुच्छेद 1 में 'Union of States' का क्या अर्थ है?
A: संघ का अर्थ यह है कि भारत राज्यों का संघ है - इससे यह स्पष्ट होता है कि राज्य अपना अस्तित्व रखते हैं पर संविधान के ढाँचे में। (संदर्भ: संविधान के भाग I)।
Q2: अनुच्छेद 3 के अंतर्गत संसद किन-किन चीज़ों का निर्णय कर सकती है?
A: कोई नया राज्य बनाना, किसी राज्य का भाग अलग करना, किसी राज्य की सीमा/क्षेत्र/नाम बदलना, किसी राज्य का क्षेत्र बढ़ाना या घटाना - पर ये विधेयक राष्ट्रपति की सिफारिश पर ही पेश हो सकते हैं और प्रभावित राज्य की विधान सभा से राय ली जा सकती है।
Q3: क्या अनुच्छेद 2/3 के तहत बनी कोई विधि संविधान संशोधन मानी जायेगी?
A: नहीं - अनुच्छेद 4 स्पष्ट करता है कि ऐसी विधियाँ अनुच्छेद 368 के लिए 'संविधान संशोधन' नहीं मानी जाएँगी, पर वे आवश्यक संशोधनों व परिणामी प्रावधानों के साथ लागू होंगी।
भाग I (अनुच्छेद 1–4) भारतीय संघ की संवैधानिक आधारशिला है। यह भाग न केवल देश के नाम और भू-राजनीतिक सीमाओं का कानूनी निर्धारण करता है, बल्कि राज्यों/केंद्र-शासित प्रदेशों के गठन, उनके क्षेत्रीय परिवर्तन और उससे जुड़ी विधायी प्रक्रियाओं की रूपरेखा भी देता है। ये प्रावधान दिखाते हैं कि भारतीय संघ ढाँचे में जहाँ राज्यों का स्वायत्त अस्तित्व है, वहीं केन्द्र के पास ऐसे परिवर्तन लागू करने की संवैधानिक शक्ति भी है — और यह शक्ति लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं (राष्ट्रपति की सिफारिश, राज्य विधान सभाओं की राय, संसद की पारितियाँ) से जुड़ी हुई है।
वर्तमान प्रशासनिक गणना के अनुसार भारत में 28 राज्य और 8 केंद्र शासित प्रदेश (Union Territories) हैं - यह व्यवस्था 2019 के जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन और 2020 के कुछ केन्द्र-शासित प्रदेशों के मर्ज/रंग-रूप के बाद स्थिर हुई।