
भारतीय संविधान भाग 14 - सरकारी सेवाएँ (अनुच्छेद 308–323)
नियम, अधिकार, भर्ती, अनुशासन
भारतीय संविधान भाग 14 - सरकारी सेवाएँ (अनुच्छेद 308–323)
परिचय और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
भारतीय प्रशासन की रीढ़ सरकारी सेवाएँ हैं। संविधान के निर्माताओं ने भाग 14 में नियुक्ति, पदस्थापन, सेवा शर्तें, अनुशासन और भर्ती के लिए एक स्पष्ट संवैधानिक ढाँचा बनाया। उद्देश्य था — कुशल, निष्पक्ष और उत्तरदायी लोकसेवा बनाना, जो राजनीतिक परिवर्तन से परे स्थिर रहे, नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करे और कल्याणकारी राज्य की नीतियों को क्रियान्वित करे।
भाग 14 तीन स्तम्भों पर टिका है — (1) नियुक्ति/सेवा शर्तें (308–311), (2) अखिल भारतीय सेवाएँ (312/312A), (3) लोक सेवा आयोग (315–323)।
औपनिवेशिक दौर में सिविल सेवा इम्पीरियल सर्विस का स्वरूप रखती थी। स्वतंत्रता के बाद लक्ष्य एक लोकतांत्रिक, उत्तरदायी और मेरिट‑आधारित सेवा ढाँचा बनाना था। इसी क्रम में अनु. 311 के सुरक्षा प्रावधान और UPSC/SPSC जैसे स्वायत्त भर्ती निकाय सुनिश्चित किए गए।
अनुच्छेद मानचित्र (308–323) - एक नजर में
- 308परिभाषा व दायराकिस‑किस सेवा पर भाग 14 लागू; अपवाद/स्पष्टीकरण
- 309सेवा शर्तेंनियुक्ति/वेतन/पदोन्नति/अनुशासन हेतु नियम बनाने का अधिकार
- 310Pleasure DoctrinePresident/Governor के Pleasure पर सेवा, पर
- 311 की सीमाएँ311सुरक्षा प्रावधानहटाने/बर्खास्तगी/पदावनति से पूर्व प्राकृतिक न्याय
- 312, 312Aअखिल भारतीय सेवाएँIAS/IPS/IFoS आदि; संसद द्वारा नियम; राज्यों की सहमति
- 313–314संक्रमणपूर्व सेवाओं/अधिकारों की निरंतरता
- (314 अब निरस्त)
- 315–323UPSC/SPSCसंरचना, नियुक्ति, कार्यकाल, कर्तव्य, रिपोर्टिंग, व्यय
सरकारी सेवाएँ — नियुक्ति, अधिकार, अनुशासन और आयोग
अनुच्छेद 308 - परिभाषा और लागू क्षेत्र
यह अनुच्छेद बताता है कि भाग 14 किन सेवाओं पर लागू होता है और ‘राज्य’ शब्द का अर्थ यहाँ क्या है। सामान्यतः यह संघ एवं राज्यों के अधीन सभी सेवाओं को कवर करता है; न्यायपालिका/विधानपालिका के कुछ पहलुओं पर विशेष उपबंध अन्य भागों में हैं।
याद रखें: भाग 14 का उद्देश्य सेवा प्रशासन का एक एकरूप आधार बनाना है, ताकि नियमों में पारदर्शिता और अनुमान‑योग्यता रहे।
अनुच्छेद 309 - नियुक्ति और सेवा शर्तों के नियम
अनु. 309 के तहत संसद/राज्य विधानमंडल अपने‑अपने क्षेत्रों में भर्ती, पद, वेतन, भत्ते, अवकाश, वरिष्ठता, पदोन्नति, अवकाश ट्रैवल, आचरण, अनुशासन, अपील आदि का विस्तृत नियम‑निर्माण कर सकते हैं। जब तक विधान न बने, तब तक राष्ट्रपति/राज्यपाल नियम बना सकते हैं।
सेवा नियमों की सामान्य श्रेणियाँ
- भर्ती नियम (Recruitment Rules)
- आचरण नियम (Conduct Rules)
- अनुशासन व अपील नियम (CCA Rules)
- वेतन/पेंशन/ग्रेच्युटी नियम
- संविदा/स्थायी/अस्थायी नियुक्ति के नियम
नियम बनाते समय समता (Equality), अनुच्छेद 14/16 और प्राकृतिक न्याय का पालन अनिवार्य है।
अनुच्छेद 310 - Pleasure Doctrine
यह सिद्धान्त ब्रिटिश कानून से आया — सरकारी सेवक President/Governor के Pleasure पर पद धारण करता है। पर भारतीय संविधान में इसे अनु. 311 द्वारा संतुलित किया गया है ताकि मनमानी समाप्ति न हो।
सीमाएँ
- अनु. 311 के ड्यू‑प्रोसेस/सुनवाई प्रावधान।
- न्यायिक समीक्षा: मनमाना, बदनीयती, भेदभावपूर्ण निर्णय शून्य।
- करार/स्थायी सेवा नियमों के उल्लंघन पर राहत।
गलतफहमी: Pleasure doctrine असीमित अधिकार नहीं देता; Rule of Law सर्वोपरि है।
अनुच्छेद 311 - सेवा‑सुरक्षा और प्राकृतिक न्याय
अनु. 311 केंद्रीय/राज्य सेवकों को हटाने, बर्खास्त करने या पदावनत करने से पहले उचित प्रक्रिया और सुनवाई का अधिकार देता है।
मुख्य प्रावधान
- आरोपित कर्मचारी को कारण बताओ नोटिस (charge‑sheet) और साक्ष्य तक पहुँच।
- स्वतंत्र जाँच अधिकारी, क्रॉस‑एग्ज़ामिनेशन का अवसर, प्रस्तुतिकरण।
- सज़ा अनुपातिक (proportionate) हो; आदेश में कारण दर्ज हों।
अपवाद/विशेष स्थितियाँ
- सुरक्षा कारणों से विस्तृत सुनवाई व्यावहारिक रूप से असंभव (जैसे 311(2)(c) प्रकार) — पर न्यायिक जांच योग्य।
- दोषसिद्धि पर सेवामुक्ति — पर सज़ा का अनुपात परीक्षण संभव।
न्यायालयों का दृष्टिकोण: प्राकृतिक न्याय (audi alteram partem) सेवा‑कानून का मूल है।
अनुच्छेद 312/312A - अखिल भारतीय सेवाएँ
संसद, राज्यों की परिषद (राज्यसभा) की विशेष संकल्प सहमति से अखिल भारतीय सेवाएँ सृजित कर सकती है — जैसे IAS, IPS, IFoS। इन सेवाओं की भर्ती, प्रशिक्षण, कैडर प्रबंधन और अनुशासन के नियम संसद द्वारा निर्धारित होते हैं; राज्य इनके कैडर प्रबंधन में साझेदार होते हैं।
लाभ
- राष्ट्रीय मानकीकरण, मेरिट‑आधारित चयन, एकीकृत प्रशासनिक संस्कृति।
- केंद्र‑राज्य समन्वय, नीतियों की एकरूप क्रियान्विति।
312A कुछ विशेष संक्रमण/संरक्षण प्रावधानों का संदर्भ देता है (ऐतिहासिक/तकनीकी)।
अनुच्छेद 313–314 - संक्रमणकालीन व्यवस्थाएँ
स्वतंत्रता के बाद जो सेवाएँ/नियम अस्तित्व में थे, उनकी निरंतरता तब तक जब तक नए कानून/नियम न बन जाएँ। अनु. 314 (अब निरस्त) ऐतिहासिक महत्व रखता है।
अनुच्छेद- 315. संघ और राज्यों के लिए लोक सेवा आयोग
- इस अनुच्छेद के उपबंधों के अधीन रहते हुए, संघ के लिए एक लोक सेवा आयोग और प्रत्येक राज्य के लिए एक लोक सेवा आयोग होगा।
- दो या अधिक राज्य यह करार कर सकेंगे कि राज्यों के उस समूह के लिए एक ही लोक सेवा आयोग होगा और यदि इस आशय का संकल्प उन राज्यों में से प्रत्येक राज्य के विधान-मंडल के सदन द्वारा या जहाँ दो सदन हैं वहाँ प्रत्येक सदन द्वारा पारित कर दिया जाता है तो संसद उन राज्यों की आवश्यकताओं की पूर्ति करने के लिए विधि द्वारा संयुक्त राज्य लोक सेवा आयोग की (जिसे इस अध्याय में संयुक्त आयोग कहा गया है) नियुक्ति का उपबंध कर सकेगी।
- पूर्वोक्त प्रकार की किसी विधि में ऐसे आनुषंगिक और पारिणामिक उपबंध हो सकेंगे जो उस विधि के प्रयोजनों को प्रभावी करने के लिए आवश्यक या वांछनीय हों।
- यदि किसी राज्य का राज्यपाल संघ लोक सेवा आयोग से ऐसा करने का अनुरोध करता है तो वह राष्ट्रपति के अनुमोदन से उस राज्य की सभी या किन्हीं आवश्यकताओं की पूर्ति करने के लिए सहमत हो सकेगा।
- इस संविधान में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो संघ लोक सेवा आयोग या किसी राज्य लोक सेवा आयोग के प्रति निर्देशों का यह अर्थ लगाया जाएगा कि वे ऐसे आयोग के प्रति निर्देश हैं जो प्रश्नगत किसी विशिष्ट विषय के संबंध में, यथास्थिति, संघ की या राज्य की आवश्यकताओं की पूर्ति करता है।
अनुच्छेद- 316. सदस्यों की नियुक्ति और पदावधि
लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष और अन्य सदस्यों की नियुक्ति, यदि वह संघ आयोग या संयुक्त आयोग है तो, राष्ट्रपति द्वारा और, यदि वह राज्य आयोग है तो, राज्य के राज्यपाल द्वारा की जाएगी
परंतु प्रत्येक लोक सेवा आयोग के सदस्यों में से यथाशक्य निकटतम आधे ऐसे व्यक्ति होंगे जो अपनी-अपनी नियुक्ति की तारीख पर भारत सरकार या किसी राज्य की सरकार के अधीन कम से कम दस वर्ष तक पद धारण कर चुके हैं और उक्त दस वर्ष की अवधि की संगणना करने में इस संविधान के प्रारंभ से पहले की ऐसी अवधि भी सम्मिलित की जाएगी जिसके दौरान किसी व्यक्ति ने भारत में क्राउन के अधीन या किसी देशी राज्य की सरकार के अधीन पद धारण किया है।
- यदि आयोग के अध्यक्ष का पद रिक्त हो जाता है या यदि कोई ऐसा अध्यक्ष अनुपस्थिति के कारण या अन्य कारण से अपने पद के कर्तव्यों का पालन करने में असमर्थ है तो, यथास्थिति, जब तक रिक्त पद पर खंड (1) के अधीन नियुक्त कोई व्यक्ति उस पद का कर्तव्य भार ग्रहण नहीं कर लेता है या जब तक अध्यक्ष अपने कर्तव्यों को फिर से नहीं संभाल लेता है तब तक आयोग के अन्य सदस्यों में से ऐसा एक सदस्य, जिसे संघ आयोग या संयुक्त आयोग की दशा में राष्ट्रपति और राज्य आयोग की दशा में उस राज्य का राज्यपाल इस प्रयोजन के लिए नियुक्त करे, उन कर्तव्यों का पालन करेगा।
लोक सेवा आयोग का सदस्य, अपने पद ग्रहण की तारीख से छह वर्ष की अवधि तक या संघ आयोग की दशा में पैंसठ वर्ष की आयु प्राप्त कर लेने तक और राज्य आयोग या संयुक्त आयोग की दशा में [बासठ वर्ष] की आयु प्राप्त कर लेने तक इनमें से जो भी पहले हो, अपना पद धारण करेगा।
- लोक सेवा आयोग का कोई सदस्य, संघ आयोग या संयुक्त आयोग की दशा में राष्ट्रपति को और राज्य आयोग की दशा में राज्य के राज्यपाल को संबोधित अपने हस्ताक्षर सहित लेख द्वारा अपना पद त्याग सकेगा;
- लोक सेवा आयोग के किसी सदस्य को, अनुच्छेद 317 के खंड (1) या खंड (3) में उपबंधित रीति से उसके पद से हटाया जा सकेगा।
कोई व्यक्ति जो लोक सेवा आयोग के सदस्य के रूप में पद धारण करता है, अपनी पदावधि की समाप्ति पर उस पद पर पुनर्नियुक्ति का पात्र नहीं होगा।
अनुच्छेद- 317. लोक सेवा आयोग के किसी सदस्य का हटाया जाना और निलंबित किया जाना
- 01) खंड (3) के उपबंधों के अधीन रहते हुए, लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष या किसी अन्य सदस्य को केवल कदाचार के आधार पर किए गए राष्ट्रपति के ऐसे आदेश से उसके पद से हटाया जाएगा जो उच्चतम न्यायालय को राष्ट्रपति द्वारा निर्देश किए जाने पर उस न्यायालय द्वारा अनुच्छेद 145 के अधीन इस निमित्त विहित प्रक्रिया के अनुसार की गई जाँच पर, यह प्रतिवेदन किए जाने के पश्चात् किया गया है कि, यथास्थिति, अध्यक्ष या ऐसे किसी सदस्य को ऐसे किसी आधार पर हटा दिया जाए।
- 02) आयोग के अध्यक्ष या किसी अन्य सदस्य को, जिसके संबंध में खंड (1) के अधीन उच्चतम न्यायालय को निर्देश किया गया है, संघ आयोग या संयुक्त आयोग की दशा में राष्ट्रपति और राज्य आयोग की दशा में राज्यपाल उसके पद से तब तक के लिए निलंबित कर सकेगा जब तक राष्ट्रपति ऐसे निर्देश पर उच्चतम न्यायालय का प्रतिवेदन मिलने पर अपना आदेश पारित नहीं कर देता है।
- 03) खंड (1) में किसी बात के होते हुए भी, यदि लोक सेवा आयोग का, यथास्थिति, अध्यक्ष या कोई अन्य सदस्य –
दिवालिया न्यायनिर्णीत किया जाता है,या
अपनी पदावधि में अपने पद के कर्तव्यों के बाहर किसी सवेतन नियोजन में लगता है,या
राष्ट्रपति की राय में मानसिक या शारीरिक शैथिल्य के कारण अपने पद पर बने रहने के लिए अयोग्य है, तो राष्ट्रपति, अध्यक्ष या ऐसे अन्य सदस्य को आदेश द्वारा पद से हटा सकेगा।
- 04) यदि लोक सेवा आयोग का अध्यक्ष या कोई अन्य सदस्य, निगमित कंपनी के सदस्य के रूप में और कंपनी के अन्य सदस्यों के साथ सम्मिलित रूप से अन्यथा, उस संविदा या करार से, जो भारत सरकार या राज्य सरकार के द्वारा या निमित्त की गई या किया गया है, किसी प्रकार से संपृक्त या हितबद्ध है या हो जाता है या उसके लाभ या उससे उद्भूत किसी फायदे या उपलब्धि में भाग लेता है तो वह खंड (1) के प्रयोजनों के लिए कदाचार का दोषी समझा जाएगा।
अनुच्छेद- 318. आयोग के सदस्यों और कर्मचारिवृंद की सेवा की शर्तों के बारे में विनियम बनाने की शक्ति
संघ आयोग या संयुक्त आयोग की दशा में राष्ट्रपति और राज्य आयोग की दशा में उस राज्य का राज्यपाल विनियमों द्वारा –
- आयोग के सदस्यों की संख्या और उनकी सेवा की शर्तों का अवधारण कर सकेगा; और
- आयोग के कर्मचारिवृंद के सदस्यों की संख्या और उनकी सेवा की शर्तों के संबंध में उपबंध कर सकेगा:
परंतु लोक सेवा आयोग के सदस्य की सेवा की शर्तों में उसकी नियुक्ति के पश्चात् उसके लिए अलाभकारी परिवर्तन नहीं किया जाएगा।
अनुच्छेद- 319. आयोग के सदस्यों द्वारा ऐसे सदस्य न रहने पर पद धारण करने के संबंध में प्रतिषेध
पद पर न रह जाने पर –
- संघ लोक सेवा आयोग का अध्यक्ष भारत सरकार या किसी राज्य की सरकार के अधीन किसी भी और नियोजन का पात्र नहीं होगा;
- किसी राज्य लोक सेवा आयोग का अध्यक्ष संघ लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष या अन्य सदस्य के रूप में अथवा किसी अन्य राज्य लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष के रूप में नियुक्त होने का पात्र होगा, किन्तु भारत सरकार या किसी राज्य की सरकार के अधीन किसी अन्य नियोजन का पात्र नहीं होगा;
- संघ लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष से भिन्न कोई अन्य सदस्य संघ लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष के रूप में या किसी राज्य लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष के रूप में नियुक्त होने का पात्र होगा, किन्तु भारत सरकार या किसी राज्य की सरकार के अधीन किसी अन्य नियोजन का पात्र नहीं होगा;
- किसी राज्य लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष से भिन्न कोई अन्य सदस्य संघ लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष या किसी अन्य सदस्य के रूप में अथवा उसी या किसी अन्य राज्य लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष के रूप में नियुक्त होने का पात्र होगा, किन्तु भारत सरकार या किसी राज्य की सरकार के अधीन किसी अन्य नियोजन का पात्र नहीं होगा।
अनुच्छेद- 320 लोक सेवा आयोगों के कृत्य
- संघ और राज्य लोक सेवा आयोगों का यह कर्तव्य होगा कि वे क्रमशः संघ की सेवाओं और राज्य की सेवाओं में नियुक्तियों के लिए परीक्षाओं का संचालन करें।
- यदि संघ लोक सेवा आयोग से कोई दो या अधिक राज्य ऐसा करने का अनुरोध करते हैं तो उसका यह भी कर्तव्य होगा कि वह ऐसी किन्हीं सेवाओं के लिए, जिनके लिए विशेष अर्हताओं वाले अभ्यर्थी अपेक्षित हैं, संयुक्त भर्ती की स्कीमें बनाने और उनका प्रवर्तन करने में उन राज्यों की सहायता करे।
यथास्थिति, संघ लोक सेवा आयोग या राज्य लोक सेवा आयोग से--
- सिविल सेवाओं में और सिविल पदों के लिए भर्ती की पद्धतियों से संबंधित सभी विषयों पर,
- सिविल सेवाओं और पदों पर नियुक्ति करने में तथा एक सेवा से दूसरी सेवा में प्रोन्नति और अंतरण करने में अनुसरण किए जाने वाले सिद्धांतों पर और ऐसी नियुक्ति, प्रोन्नति या अंतरण के लिए अभ्यर्थियों की उपयुक्तता पर,
- ऐसे व्यक्ति पर, जो भारत सरकार या किसी राज्य की सरकार की सिविल हैसियत में सेवा कर रहा है, प्रभाव डालने वाले, सभी अनुशासनिक विषयों पर, जिनके अंतर्गत ऐसे विषयों से संबंधित अभ्यावेदन या याचिकाएँ हैं,
- ऐसे व्यक्ति द्वारा या उसके संबंध में, जो भारत सरकार या किसी राज्य की सरकार के अधीन या भारत में क्राउन के अधीन या किसी देशी राज्य की सरकार के अधीन सिविल हैसियत में सेवा कर रहा है या कर चुका है, इस दावे पर कि अपने कर्तव्य के निष्पादन में किए गए या किए जाने के लिए तात्पर्यित कार्यों के संबंध में उसके विरुद्ध संस्थित विधिक कार्यवाहियों की प्रतिरक्षा में उसके द्वारा उपगत खर्च का, यथास्थिति, भारत की संचित निधि में से या राज्य की संचित निधि में से संदाय किया जाना चाहिए,
- भारत सरकार या किसी राज्य की सरकार या भारत में क्राउन के अधीन या किसी देशी राज्य की सरकार के अधीन सिविल हैसियत में सेवा करते समय किसी व्यक्ति को हुई क्षतियों के बारे में पेंशन अधिनिर्णित किए जाने के लिए किसी दावे पर और ऐसे अधिनिर्णय की रकम विषयक प्रश्न पर परामर्श किया जाएगा और इस प्रकार उसे निर्देशित किए गए किसी विषय पर तथा ऐसे किसी अन्य विषय पर, जिसे, यथास्थिति, राष्ट्रपति या उस राज्य का राज्यपाल उसे निर्देशित करे, परामर्श देने का लोक सेवा आयोग का कर्तव्य होगा :
- परंतु अखिल भारतीय सेवाओं के संबंध में तथा संघ के कार्यकलाप से संबंधित अन्य सेवाओं और पदों के संबंध में भी राष्ट्रपति तथा राज्य के कार्यकलाप से संबधित अन्य सेवाओं और पदों के संबंध में राज्यपाल उन विषयों को विनिर्दिष्ट करने वाले विनियम बना सकेगा जिनमें साधारणतया या किसी विशिष्ट वर्ग के मामले में या किन्हीं विशिष्ट परिस्थितियों में लोक सेवा आयोग से परामर्श किया जाना आवश्यक नहीं होगा।
- खंड (3) की किसी बात से यह अपेक्षा नहीं होगी कि लोक सेवा आयोग से उस रीति के संबंध में, जिससे अनुच्छेद 16 के खंड (4) में निर्दिष्ट कोई उपबंध किया जाना है या उस रीति के संबंध में, जिससे अनुच्छेद 335 के उपबंधों को प्रभावी किया जाना है, परामर्श किया जाए।
- राष्ट्रपति या किसी राज्य के राज्यपाल द्वारा खंड (3) के परंतुक के अधीन बनाए गए सभी विनियम, बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, यथास्थिति, संसद के प्रत्येक सदन या राज्य के विधान-मंडल के सदन या प्रत्येक सदन के समक्ष कम से कम चौदह दिन के लिए रखे जाएँगे और निरसन या संशोधन द्वारा किए गए ऐसे उपांतरणों के अधीन होंगे जो संसद के दोनों सदन या उस राज्य के विधान-मंडल का सदन या दोनों सदन उस सत्र में करें जिसमें वे इस प्रकार रखे गए हैं।
अनुच्छेद- 321. लोक सेवा आयोगों के कृत्यों का विस्तार करने की शक्ति
- यथास्थिति, संसद द्वारा या किसी राज्य के विधान-मंडल द्वारा बनाया गया कोई अधिनियम संघ लोक सेवा आयोग या राज्य लोक सेवा आयोग द्वारा संघ की या राज्य की सेवाओं के संबंध में और किसी स्थानीय प्राधिकारी या विधि द्वारा गठित अन्य निगमित निकाय या किसी लोक संस्था की सेवाओं के संबंध में भी अतिरिक्त कृत्यों के प्रयोग के लिए उपबंध कर सकेगा।
अनुच्छेद- 322. लोक सेवा आयोगों के व्यय
- संघ या राज्य लोक सेवा आयोग के व्यय, जिनके अंतर्गत आयोग के सदस्यों या कर्मचारिवृंद को या उनके संबंध में संदेय कोई वेतन, भत्ते और पेंशन हैं, यथास्थिति, भारत की संचित निधि या राज्य की संचित निधि पर भारित होंगे।
अनुच्छेद-323. लोक सेवा आयोगों के प्रतिवेदन
- संघ आयोग का यह कर्तव्य होगा कि वह राष्ट्रपति को आयोग द्वारा किए गए कार्य के बारे में प्रतिवर्ष प्रतिवेदन दे और राष्ट्रपति ऐसा प्रतिवेदन प्राप्त होने पर उन मामलों के संबंध में, यदि कोई हों, जिनमें आयोग की सलाह स्वीकार नहीं की गई थी, ऐसी अस्वीकृति के कारणों को सपष्ट करने वाले ज्ञापन सहित उस प्रतिवेदन की प्रति संसद के प्रत्येक सदन के समक्ष रखवाएगा।
- राज्य आयोग का यह कर्तव्य होगा कि वह राज्य के राज्यपाल को आयोग द्वारा किए गए कार्य के बारे में प्रतिवर्ष प्रतिवेदन दे और संयुक्त आयोग का यह कर्तव्य होगा कि ऐसे राज्यों में से प्रत्येक के, जिनकी आवश्यकताओं की पूर्ति संयुक्त आयोग द्वारा की जाती है, राज्यपाल को उस राज्य के संबंध में आयोग द्वारा किए गए कार्य के बारे में प्रतिवर्ष प्रतिवेदन दे और दोनों में से प्रत्येक दशा में ऐसा प्रतिवेदन प्राप्त होने पर, राज्यपाल उन मामलों के संबंध में, यदि कोई हों, जिनमें आयोग की सलाह स्वीकार नहीं की गई थी, ऐसी अस्वीकृति के कारणों को स्पष्ट करने वाले ज्ञापन सहित उस प्रतिवेदन की प्रति राज्य के विधान-मंडल के समक्ष रखवाएगा।
प्रमुख केस‑लॉ, उदाहरण और व्यावहारिक पहलू
1) Pleasure Doctrine बनाम प्राकृतिक न्याय
न्यायालयों ने बार‑बार स्पष्ट किया कि Pleasure doctrine अनु. 311 द्वारा सीमित है। मनमानी/द्वेष/भेदभावपूर्ण कार्रवाई रद्द की जा सकती है; कारण‑दर्शित आदेश और सुनवाई आवश्यक।
2) Disciplinary Proceedings — अनुपातिकता
जाँच में दोष सिद्ध होने पर भी सज़ा का अनुपात (proportionality) महत्त्वपूर्ण है। अत्यधिक कठोर सज़ा न्यायिक समीक्षा में घटाई जा सकती है।
3) भर्ती/पदोन्नति में समता
अनु. 14/16 के तहत समान अवसर; आरक्षण नीतियाँ विधि के अनुसार; अनुभव/वरिष्ठता/मेधावी मानकों का समुचित संतुलन आवश्यक।
4) संविदा बनाम स्थायी
संविदा कर्मियों पर 309/311 का लागू क्षेत्र अलग‑अलग परिस्थितियों पर निर्भर करता है; अनुबंध शर्तें, वैधानिक नियम और वास्तविक कार्य‑संबंध निर्णायक होते हैं।
5) UPSC/SPSC सलाह का पालन
सलाह का सम्मान न करने पर रिकॉर्ड में कारण आवश्यक; मनमानी से निर्णय रद्द हो सकते हैं।
Do/Don’t और Best Practices (विभाग/HR के लिए)
Do
- भर्ती/अनुशासन में रिकॉर्ड‑आधारित निर्णय; कारण स्पष्ट लिखें।
- सुनवाई, क्रॉस‑एग्ज़ामिनेशन, दस्तावेज़ उपलब्धता सुनिश्चित करें।
- UPSC/SPSC की सलाह को रिकॉर्ड पर विचारित करें।
- नियमों का समय‑समय पर अद्यतन; प्रशिक्षण/जागरूकता।
Don’t
- दंड पूर्वधारणा या राजनीतिक दबाव में न दें।
- प्रक्रियात्मक त्रुटियाँ (नोटिस न देना, जाँच अधिकारी पक्षपाती, आदि) से बचें।
- भर्ती/पदोन्नति में मनमानी/भेदभाव न करें।
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