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भारतीय संविधान भाग 15 - चुनाव संबंधी प्रावधान (अनुच्छेद 324–329A) | चुनाव आयोग, निर्वाचन प्रक्रियाएँ

14 Aug 2025 | Ful Verma | 131 views

केंद्रीय चुनाव आयोग, निर्वाचन अधिकार, आचार संहिता, शक्तियाँ, प्रमुख मामला‑कानून और चुनाव सुधार

भारतीय संविधान भाग 15 - चुनाव संबंधी प्रावधान (अनुच्छेद 324–329A)

चुनाव आयोग, निर्वाचन प्रक्रियाएँ

भाग 15 - चुनाव संबंधी प्रावधान (अनुच्छेद 324–329A)

केंद्रीय चुनाव आयोग, निर्वाचन अधिकार, आचार संहिता, शक्तियाँ, प्रमुख मामला‑कानून और चुनाव सुधार

परिचय: चुनाव का संवैधानिक महत्व

यह हिस्सा चुनाव और चुनाव आयोग के आचरण से संबंधित है। यह चुनाव आयोग में निहित होने के लिए अधीक्षण, दिशा, और चुनावों के नियंत्रण का अधिकार देता है। तीन निर्वाचन आयुक्तों को उनमें से एक के साथ मुख्य निर्वाचन आयुक्त के रूप में नियुक्त किया जाना है जो चुनाव के संचालन के लिए जिम्मेदार होंगे। अनुच्छेद 329 ए को संविधान 44 वें संशोधन अधिनियम 1978 द्वारा निरस्त कर दिया गया था।यह भाग निर्वाचन‑प्रक्रिया, मतदाता‑पंजीकरण, चुनाव अधिकारियों की नियुक्ति, और चुनावी अनियमितताओं के निवारण के लिए आवश्यक कानूनी ढाँचा प्रदान करता है।

अनुच्छेद 324 - चुनाव आयोग की नियुक्ति, स्वतंत्रता और शक्तियाँ

  • (1) इस संविधान केअधीन संसद् और प्रत्येक राज्य के विधान-मंडल के लिए कराए जाने वाले सभी निर्वाचनों के लिए तथा राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के पदों के लिए निर्वाचनों के लिए निर्वाचक-नामावली तैयारकराने का और उन सभी निर्वाचनों के संचालन का अधीक्षण, निदेशन और नियंत्रण, एक आयोग में निहित होगा (जिसे इस संविधान में निर्वाचन आयोग कहा गया है) ।
  • (2) निर्वाचन आयोग मुख्य निर्वाचन आयुक्त और उतने अन्य निर्वाचन आयुक्तों से, यदि कोई हों, जितने राष्ट्रपति समय-समय पर नियत करे, मिलकर बनेगा तथा मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति, संसद् द्वारा इस निमित्त बनाई गईविधि के उपबंधों के अधीन रहते हुए, राष्ट्रपति द्वारा की जाएगी ।
  • (3) जब कोई अन्य निर्वाचन आयुक्त इस प्रकार नियुक्त किया जाता है तब मुख्य निर्वाचन आयुक्त निर्वाचन आयोग के अध्यक्ष के रूप में कार्य करेगा ।
  • (4) लोक सभा के और प्रत्येक राज्य की विधान सभा के प्रत्येक साधारण निर्वाचन से पहले तथा विधान परिषद् वाले प्रत्येक राज्य की विधान परिषद् के लिए प्रथम साधारण निर्वाचन से पहले और उसके पश्चात् प्रत्येक द्विवार्षिक निर्वाचन से पहले, राष्ट्रपति निर्वाचन आयोग से परामर्श करने के पश्चात्, खंड (1) द्वारा निर्वाचन आयोग को सौपें गए कॄत्यों के पालन में आयोग की सहायता के लिए उतने प्रादेशिक आयुक्तों की भी नियुक्ति कर सकेगा जितने वह आवश्यक समझे ।
  • (5) संसद् द्वारा बनाई गई किसी विधि के उपबंधों के अधीन रहते हुए, निर्वाचन आयुक्तों और प्रादेशिक आयुक्तों की सेवा की शर्तें और पदावधि ऐसी होंगी जो राष्ट्रपति नियम द्वारा अवधारित करे :
  • परन्तु मुख्य निर्वाचन आयुक्त को उसके पद से उसी रीति से और उन्हीं आधारों पर ही हटाया जाएगा , जिस रीति से और जिन आधारों पर उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश को हटाया जाता है अन्यथा नहीं और मुख्य निर्वाचन आयुक्त की सेवा की शर्तों में उसकी नियुक्ति के पश्चात् उसके लिए अलाभकारी परिवर्तन नहीं किया जाएगा :
  • परन्तु यह और कि किसी अन्य निर्वाचन आयुक्त या प्रादेशिक आयुक्त को मुख्य निर्वाचन आयुक्त की सिफारिश पर ही पद से हटाया जाएगा , अन्यथा नहीं ।
  • (6) जब निर्वाचन आयोग ऐसा अनुरोध करे तब, राष्ट्रपति या किसी राज्य का राज्यपाल निर्वाचन आयोग या प्रादेशिक आयुक्त को उतने कर्मचारिवॄन्द उपलब्ध कराए गा जितने खंड (1) द्वारा निर्वाचन आयोग को सौपें गए कॄत्यों के निर्वहन के लिए आवश्यक हों ।

अनुच्छेद 325. धर्म, मूलवंश, जाति या लिंग के आधार पर किसी व्यक्ति का निर्वाचक-

  • नामावली में साम्मिलित किए जाने के लिए अपात्र न होना और उसके द्वारा किसी विशेष निर्वाचक-नामावली में साम्मिलित किए जाने का दावा न किया जाना---संसद् के प्रत्येक सदन या किसी राज्य के विधान-मंडल के सदन या प्रत्येक सदन के लिए निर्वाचन के लिए प्रत्येक प्रादेशिक निर्वाचन-क्षेत्र के लिए एक साधारण निर्वाचक-नामावली होगी और केवल धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या इनमें से किसी के आधार पर कोई व्यक्ति ऐसी किसी नामावली में साम्मिलित किए जाने के लिए अपात्र नहीं होगा या ऐसे किसी निर्वाचन-क्षेत्र के लिए किसी विशेष निर्वाचक-नामावली में साम्मिलित किए जाने का दावा नहीं करेगा ।

अनुच्छेद 326. लोक सभा और राज्यों की विधान सभाओं के लिए निर्वाचनों का वयस्क मताधिकार के आधार पर होना---

  • लोक सभा और प्रत्येक राज्य की विधान सभा के लिए निर्वाचन वयस्क मताधिकार के आधार पर होंगे अर्थात् प्रत्येक व्यक्ति , जो भारत का नागरिक है और ऐसी तारीख को, जो समुचित विधान-मंडल द्वारा बनाई गई किसी विधि द्वारा या उसके अधीन इस निमित्त नियत की जाए, कम से कम [3][अठारह वर्ष] की आयु का है और इस संविधान या समुचित विधान-मंडल द्वारा बनाई गई किसी विधि के अधीन अनिवास, चित्तविकॄति, अपराध या भ्रष्ट या अवैध आचरण के आधार पर अन्यथा निरर्हित नहीं कर दिया जाता है, ऐसे किसी निर्वाचन में मतदाता के रूप में रजिस्ट्रीकॄत होने का हकदार होगा ।

अनुच्छेद 327. विधान-मंडल के लिए निर्वाचनों के संबंध में उपबंध करने की संसद् की शक्ति ---

  • इस संविधान के उपबंधों के अधीन रहते हुए , संसद् समय-समय पर, विधि द्वारा, संसद् के प्रत्येक सदन या किसी राज्य के विधान-मंडल के सदन या प्रत्येक सदन के लिए निर्वाचनों से संबंधित या संसक्त सभी विषयों के संबंध में, जिनके अंतर्गत निर्वाचक-नामावली तैयार कराना, निर्वाचन-क्षेत्रों का परिसीमन और ऐसे सदन या सदनों का सम्यक् गठन सुनिाश्चित करने के लिए अन्य सभी आवश्यक विषय हैं, उपबंध कर सकेगी ।

अनुच्छेद 328. किसी राज्य के विधान-मंडल के लिए निर्वाचनों के संबंध में उपबंध करने की उस विधान-मंडल की शक्ति ---

  • इस संविधान के उपबंधों के अधीन रहते हुए और जहां तक संसद् इस निमित्त उपबंध नहीं करती है वहां तक, किसी राज्य का विधान-मंडल समय-समय पर, विधि द्वारा, उस राज्य के विधान-मंडल के सदन या प्रत्येक सदन के लिए निर्वाचनों से संबंधित या संसक्त सभी विषयों के संबंध में, जिनके अंतर्गत निर्वाचक-नामावली तैयार कराना और ऐसे सदन या सदनों का सम्यक् गठन सुनिाश्चित करने के लिए अन्य सभी आवश्यक विषय हैं, उपबंध कर सकेगा ।

अनुच्छेद 329. निर्वाचन संबंधी मामलों में न्यायालयों के हस्तक्षेप का वर्जन

इस संविधान में किसी बात के होते हुए भी

  • (क) अनुच्छेद 327 या अनुच्छेद 328 के अधीन बनाई गई या बनाई जाने के लिए तात्पर्यित किसी ऐसी विधि की विधिमान्यता, जो निर्वाचन-क्षेत्रों के परिसीमन या ऐसे निर्वाचन-क्षेत्रों को स्थानों के आबंटन से संबंधित है, किसी न्यायालय में प्रश्नगत नहीं की जाएगी ;
  • (ख) संसद् के प्रत्येक सदन या किसी राज्य के विधान-मंडल के सदन या प्रत्येक सदन के लिए कोई निर्वाचन ऐसी निर्वाचन अर्जी पर ही प्रश्नगत किया जाएगा , जो ऐसे प्राधिकारी को और ऐसी रीति से प्रस्तुत की गई है जिसका समुचित विधान-मंडल द्वारा बनाई गई विधि द्वारा या उसके अधीन उपबंध किया जाए, अन्यथा नहीं ।

अनुच्छेद 329क. प्रधान मंत्री और अध्यक्ष के मामले

प्रधान मंत्री और अध्यक्ष के मामले में संसद् के लिए निर्वाचनों के बारे में विशेष उपबंध संविधान चवालीसवां संशोधन अधिनियम, 1978 की धारा 36 द्वारा (20-6-1979 से) निरसित ।

  • [1] संविधान (उन्नीसवां संशोधऩ) अधिनियम, 1966 की धारा 2 द्वारा “जिसके अंतर्गत संसद् के और राज्य के विधान-मंडलों के निर्वाचनों से उदभूत या संसक्त संदेहों और विवाद के निर्णय के लिए निर्वाचन न्यायाधिकरण की नियुक्ति भी है” शब्दों का लोप किया गया ।
  • [2] संविधान (सातवां संशोधन) अधिनियम, 1956 की धारा 29 और अनुसूची द्वारा “या राजप्रमुख” शब्दों का लोप किया गया ।
  • [3] संविधान (इकसठवां संशोधन) अधिनियम, 1988 की धारा 2 द्वारा “इक्कीस वर्ष ” के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
  • [4] संविधान (उनतालीसवां संशोधन) अधिनियम, 1975 की धारा 3 द्वारा कुछ शब्दों के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
  • [5] संविधान (चवालीसवां संशोधन) अधिनियम, 1978 की धारा 35 द्वारा (20-6-1979 से) “परंतु अनुच्छेद 329क के उपबंधों के अधीन रहते हुए” शब्दों, अंकों और अक्षर का लोप किया गया ।
  • [6] संविधान (उनतालीसवां संशोधन) अधिनियम, 1975 की धारा 4 द्वारा अंतःस्थापित ।

निर्वाचन आचार‑संहिता और उसका कानूनी स्थान

Model Code of Conduct (MCC) चुनाव आयोग द्वारा पारम्परिक/निर्वाचन निर्देशों का समूह है—जो राजनीतिक दलों/उम्मीदवारों के चुनावी आचरण का मार्गदर्शन करता है। MCC का संवैधानिक वैधानिक अधिकार स्पष्ट नहीं, पर आयोग को नियंत्रित करने वाले आदेशों और नियमों के माध्य्म से यह प्रभावी बनाया गया है। MCC का पालन चुनावों की शांति और निष्पक्षता के लिए महत्वपूर्ण है।

चुनाव आयोग की शक्तियाँ

प्रशासनिक

  • निर्वाचन कार्यक्रम तय करना, चुनाव रद्द/स्थगन करना, मतदाता‑सूची का अद्यतन।
  • निर्वाचन अधिकारियों के प्रशिक्षण व तैनाती की देखरेख।

निर्देशात्मक

  • MCC लागू करना, मीडिया/निगरानी के लिए दिशा‑निर्देश जारी करना।

दंडात्मक

  • उपलब्धता में राय/सिटीज़नशिप जांच में प्रत्याशियों के नामांकन रद्द कराना; परिस्थिति‑अनुसार रिपोर्ट भेजना।

प्रमुख न्यायालयीन मामले और उनके प्रभाव

1. S. R. Bommai v. Union of India (1994)

  • यह केस संघ और राज्यों के बीच राज्यपाल/शासनादेश के इस्तेमाल और चुनाव प्रक्रियाओं के राजनीतिक दुरुपयोग पर महत्वपूर्ण मिसाल देता है। चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और राष्ट्रपति/राज्यपाल के निर्णयों की सीमाओं पर इसे उद्धृत किया जाता है।

2. Anwar v. State of Bihar / Other election petition cases

  • निर्वाचन निरस्ति/रद्द के विषय में सुप्रीम कोर्ट ने कई बार स्पष्ट किया कि न्यायालय जांच‑पड़ताल कर सकते हैं पर चुनाव आयोग के विशेषज्ञ निर्णयों का सम्मान भी आवश्यक है।

3. Mohd. Ahmed Khan v. Shah Bano (context)

  • यहां केवल चुनावी संदर्भ में वैधानिक प्रक्रिया व संवैधानिक अधिकारों का उल्लेख है—प्रत्यक्ष केस नहीं पर विधि‑व्याख्या का महत्व दिखता है।

चुनाव सुधार और तकनीकी चुनौतियाँ

1. EVM और VVPAT

  • Electronic Voting Machines और VVPAT ने मतदान प्रक्रिया में पारदर्शिता बढ़ाई—पर उनके विश्वसनीयता, साइबर‑सुरक्षा और नियमों का पालन अभी भी बहस का विषय है।

2. डिजिटल मतदाता‑पंजीकरण

  • ऑनलाइन पोर्टल से पंजीकरण और संशोधन संभव—पर पहचान/डुप्लिकेट मुद्दे, ग्राम्य कनेक्टिविटी, और डेटा प्राइवेसी प्रमुख चुनौतियाँ हैं।

3. वोट‑बैंक व सोशल मीडिया और फेक न्यूज

  • MCC और आयोग के दिशा‑निर्देशों के बावजूद सोशल मीडिया के प्रभाव/विभाजनकारी प्रचार व दुष्प्रचार पर नियंत्रण कठिन है। आयोग ने दिशा‑निर्देश दिए हैं पर नियमन नीति पर और स्पष्ट कानून की आवश्यकता बनी हुई है।

FAQ और Quick Revision

Q1: क्या चुनाव आयोग के निर्णय अंतिम होते हैं?

A: अधिकांश प्रशासनिक निर्णयों पर आयोग का अंतिम प्रभाव होता है पर न्यायिक समीक्षा सदैव खुली रहती है।

Q2: MCC का पालन अनिवार्य है?

A: MCC स्वयं कानूनी दर्जा नहीं रखती पर आयोग के निर्देशों से यह व्यवहारिक रूप से अनिवार्य है — उल्लंघन पर अनुषंगिक कार्रवाई हो सकती है।

Q3: EVM/VVPAT विवादों पर क्या कदम उठाए गए?

A: VVPAT audits, randomization और stricter testing protocols लागू किए गए हैं; कोर्ट ने भी कई बार संतुलित दृष्टिकोण दिखाया है।

Revision Tips: 324 का मूल स्वरूप याद रखें; MCC, EVM/VVPAT, मतदान अधिकार (326), और आयोग की शक्तियों पर केंद्रित प्रमुख केस‑लॉ को संक्षेप में पढ़ें।