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छत्तीसगढ़ का नल वंश | Nal Dynasty of Chhattisgarh | इतिहास, शासक, राजधानी, अभिलेख

09 Sep 2025 | Ful Verma | 267 views

छत्तीसगढ़ का नल वंश (Nal Dynasty of Chhattisgarh)

🏰 छत्तीसगढ़ का नल वंश (Nal Dynasty of Chhattisgarh)

🔰 नल वंश का परिचय

  • छत्तीसगढ़ का नल वंश प्राचीन भारत का एक महत्वपूर्ण राजवंश था।
  • इसे नल-नाग वंश भी कहा जाता था।
  • नल वंश का उल्लेख वायु पुराण में भी मिलता है।
  • नल वंश का उदय 4वीं शताब्दी में हुआ और इसका अस्तित्व लगभग 12वीं शताब्दी तक रहा।
  • इनका शासनक्षेत्र मुख्यतः दंडकारण्य क्षेत्र (बस्तर व कोरापुट, ओडिशा) था।
  • नल वंश का अंत कलचुरियों द्वारा कर दिया गया।

👑 नल वंश के संस्थापक

  • नल वंश का प्रारंभिक संस्थापक शिशुक (Shishuka) माना जाता है (लगभग 290–330 ई.)।
  • किंतु इस वंश का वास्तविक संस्थापक वराहराज (Varaharaja) माना जाता है (400–440 ई.), जिसने इस वंश को सुदृढ़ और विस्तृत किया।

🏛️ नल वंश के राजधानी

  • नल वंश की राजधानी थी – पुष्करी (वर्तमान भोपालपट्टनम, बस्तर)
  • कुछ स्रोत इसे कोरापुट (ओडिशा) भी मानते हैं।
  • बाद में राजधानी को बार-बार वाकाटकों और अन्य शत्रुओं के हमले झेलने पड़े।

🌍 नल वंश का शासन क्षेत्र

  • नल वंश का शासन क्षेत्र दंडकारण्य (बस्तर) से लेकर कोरापुट (ओडिशा) तक फैला था।
  • इन्होंने नागपुर, बस्तर, कोंडागांव और ओडिशा के कई हिस्सों पर शासन किया।
  • इनकी शक्ति का चरमकाल 6वीं–8वीं शताब्दी माना जाता है।

📜 नल वंश के अभिलेख

नल वंश के अब तक पाँच प्रमुख अभिलेख प्राप्त हुए हैं:

  1. ऋद्धिपुर का ताम्रपत्र – भवदत्त वर्मन
  2. केशरिबेड़ा का ताम्रपत्र – अर्थपति भट्टारक
  3. पड़ियापाथर का ताम्रपत्र – भीमसेन द्वितीय
  4. राजिम का शिलालेख – विलासतुंग
  5. पोड़ागढ़ का शिलालेख – स्कंदवर्मन

👉 इन शिलालेखों से नल वंश की धार्मिक प्रवृत्ति, प्रशासनिक व्यवस्था और राजनीतिक संघर्षों का विस्तृत विवरण मिलता है।

💰 नल वंश की मुद्रा व्यवस्था

  • नल वंश के शासकों ने सोने की मुद्रा चलाई।
  • अड़ेगा (कोंडागांव) से नल वंश की 29 स्वर्ण मुद्राएँ प्राप्त हुई हैं।
  • जिन शासकों ने सोने के सिक्के चलवाए:
  1. वराहराज
  2. अर्थपति भट्टारक
  3. भवदत्त वर्मन

⚔️ नल वंश और वाकाटक संघर्ष

  • नल वंश और वाकाटक वंश समकालीन थे।
  • दोनों के बीच लंबे समय तक संघर्ष चला।
  • भवदत्त वर्मन ने वाकाटक नरेश नरेन्द्रसेन को हराया और उसकी राजधानी नंदिवर्धन (नागपुर) को तहस-नहस कर दिया।
  • लेकिन बाद में वाकाटक नरेश पृथ्वीसेन द्वितीय ने भवदत्त वर्मन के पुत्र अर्थपति को पराजित किया और उसकी राजधानी पुष्करी को नष्ट कर दिया।

🎨 नल वंश के संस्कृति और धर्म

  • नल वंश के शासक धर्मनिष्ठ थे और वैष्णव व शैव धर्म के अनुयायी रहे।
  • मंदिर निर्माण और भूमि दान की परंपरा को बढ़ावा दिया।
  • विलासतुंग ने 712 ई. में राजिम के राजीव लोचन मंदिर का निर्माण करवाया।
  • मंदिर स्थापत्य में मंडप और द्वार की शैली का विकास हुआ।
  • संस्कृत भाषा और साहित्य का संरक्षण किया।

👑 नल वंश के प्रमुख शासक (Chronology)

  1. शिशुक (संस्थापक)
  2. व्याघ्रराज (समुद्रगुप्त द्वारा पराजित)
  3. वृषभराज
  4. वराहराज (वास्तविक संस्थापक, स्वर्ण मुद्रा जारी की)
  5. भवदत्त वर्मन (वाकाटक से संघर्ष, विजयी)
  6. अर्थपति भट्टारक (वाकाटक द्वारा पराजित)
  7. स्कंदवर्मन (पुनर्स्थापक, विष्णु मंदिर निर्माण)
  8. स्तंभराज
  9. नंदराज
  10. पृथ्वीराज
  11. विरुपाक्ष
  12. विलासतुंग (सबसे प्रतापी, राजिम मंदिर निर्माण)
  13. पृथ्वीव्याघ्र
  14. भीमसेन देव
  15. नरेन्द्र थबल (अंतिम शासक)

👑 नल वंश के प्रमुख शासक (Chief Rulers of Nal Dynasty)

1. शिशुक (290 – 330 ई.)

  • नल वंश का संस्थापक शासक माना जाता है।
  • इसने वंश की नींव रखी और छोटे क्षेत्र में शासन शुरू किया।
  • इसके शासनकाल में वंश की पहचान और आधार तैयार हुआ।

2. व्याघ्रराज

  • हरिषेण की प्रयाग प्रशस्ति में उल्लेख मिलता है।
  • समुद्रगुप्त के दक्षिणापथ विजय अभियान (4वीं शताब्दी) में यह पराजित हुआ।
  • समुद्रगुप्त ने इसे हराकर “व्याघ्रहंता” की उपाधि धारण की।

3. वृषभराज

  • सत्ता संचालन करने वाला शासक, लेकिन इसके बारे में बहुत अधिक जानकारी उपलब्ध नहीं है।
  • संभवतः यह संक्रमण कालीन शासक था।

4. वराहराज (400 – 440 ई.)

  • नल वंश का वास्तविक संस्थापक कहा जाता है।
  • इसकी स्वर्ण मुद्राएँ कोंडागाँव (अड़ेगा गाँव) से मिली हैं।
  • अड़ेगा गाँव के मृदभांड में 29 स्वर्ण मुद्राएँ प्राप्त हुईं।
  • इसने आर्थिक व राजनीतिक रूप से वंश को मज़बूत किया।

5. भवदत्तवर्मन (440 – 460 ई.)

  • उपाधि – “महाराजा” और “भट्टारक”
  • विवाह – अंचाली भट्टारिका से हुआ।
  • जानकारी के स्रोत – रिद्दीपुर ताम्रपत्र और पोड़ागढ़ शिलालेख
  • पोड़ागढ़ शिलालेख में इसे नल वंश का प्रथम प्रमुख शासक बताया गया।
  • इसने वाकाटक नरेश नरेन्द्रसेन को पराजित कर उसकी राजधानी नंदिवर्धन (नागपुर) को तहस-नहस किया।
  • बाद में वाकाटक नरेन्द्रसेन के पुत्र पृथ्वीसेन द्वितीय ने बदला लेते हुए भवदत्तवर्मन के पुत्र अर्थपति को पराजित किया।

6. अर्थपति भट्टारक (460 – 475 ई.)

  • राजधानी – पुष्करी
  • उपाधि – “भट्टारक”
  • जानकारी के स्रोत – केसरीबेड़ा ताम्रपत्र, पड़ियापाथर ताम्रपत्र, पोड़ागढ़ शिलालेख
  • वाकाटक नरेश पृथ्वीसेन ने इसे पराजित कर पुष्करी को तहस-नहस कर दिया।
  • युद्ध में अर्थपति की मृत्यु हुई।
  • इसने अपने शासन में सोने के सिक्के चलवाए।

7. स्कंदवर्मन (475 – 515 ई.)

  • जानकारी का स्रोत – पोड़ागढ़ शिलालेख (नल वंश का सबसे प्राचीन शिलालेख)।
  • पोड़ागढ़ शिलालेख इन्हीं के आदेश पर जारी हुआ।
  • इसने नल वंश की पुनर्स्थापना की और इसे मज़बूत किया।
  • राजधानी पुष्करी को पुनः बसाया।
  • अपने साम्राज्य का विस्तार किया।
  • विष्णु मंदिर (पोड़ागढ़) का निर्माण कराया।
  • वाकाटक शासक देवसेन को पराजित किया।

8. स्तंभराज

  • जानकारी का स्रोत – कुलिया अभिलेख (दुर्ग)
  • इसमें स्तंभराज और नंदराज दोनों का वर्णन मिलता है।

9. नंदराज

  • कुलिया अभिलेख से ही इसकी जानकारी मिलती है।
  • संभवतः स्तंभराज के समकालीन या उत्तराधिकारी रहे।

10. पृथ्वीराज

  • चालुक्य शासक कीर्तिवर्मन प्रथम ने इसके शासनकाल में आक्रमण किया।
  • जानकारी का स्रोत – राजिम शिलालेख
  • यह विलासतुंग का पितामह था।

11. विरुपाक्ष

  • जानकारी का स्रोत – राजिम शिलालेख
  • यह विलासतुंग का पिता था।
  • संभवतः धार्मिक और शांतिप्रिय शासक था।

12. विलासतुंग (700 – 740 ई.)

  • नल वंश का सबसे प्रतापी और प्रभावशाली शासक
  • भगवान विष्णु का उपासक था।
  • जानकारी का स्रोत – राजिम शिलालेख
  • 712 ई. में इसने राजिम के राजीव लोचन मंदिर का निर्माण कराया।
  • इसके काल में मंदिर निर्माण में मंडप और द्वार जैसी नई स्थापत्य शैलियाँ विकसित हुईं।
  • इसे नल वंश का स्वर्णकालीन शासक कहा जाता है।

13. पृथ्वीव्याघ्र

  • जानकारी का स्रोत – उदयेन्दिरम शिलालेख
  • इसके बारे में सीमित जानकारी उपलब्ध है।

14. भीमसेन देव

  • शैव धर्म के उपासक शासक थे।
  • धार्मिक प्रवृत्ति के कारण इन्होंने मंदिरों और दान की परंपरा को बढ़ावा दिया।

15. नरेन्द्र थबल

  • नल वंश का अंतिम शासक
  • इसके बाद नल वंश का राजनीतिक अस्तित्व समाप्त हो गया।
  • छत्तीसगढ़ के इतिहास में यह वंश विलासतुंग और स्कंदवर्मन के कारण प्रसिद्ध रहा।

📌 सारांश

  • प्रारंभिक शासक – शिशुक, व्याघ्रराज, वृषभराज।
  • वास्तविक संस्थापक – वराहराज।
  • सबसे शक्तिशाली शासक – स्कंदवर्मन व विलासतुंग।
  • प्रसिद्ध शासक – भवदत्तवर्मन (वाकाटक से संघर्ष), अर्थपति (पराजय), स्कंदवर्मन (पुनर्निर्माता), विलासतुंग (राजिम मंदिर निर्माण)।
  • अंतिम शासक – नरेन्द्र थबल।

⚔️ नल वंश का पतन

  • नल वंश का लगातार संघर्ष वाकाटकों और बाद में चालुक्यों से होता रहा।
  • अंततः 12वीं शताब्दी तक यह वंश कमजोर हो गया।
  • इसका अंतिम समापन कलचुरी वंश द्वारा किया गया।

📌 निष्कर्ष

छत्तीसगढ़ का नल वंश भारतीय इतिहास का गौरवपूर्ण अध्याय है।

  • इस वंश ने बस्तर और ओडिशा क्षेत्र में लंबे समय तक शासन किया।
  • भवदत्त वर्मन और विलासतुंग जैसे शासकों ने इस वंश को उन्नति के शिखर पर पहुँचाया।
  • नल वंश कला, संस्कृति और धार्मिकता का संरक्षक रहा।
  • अंततः कलचुरियों के उदय के साथ इसका राजनीतिक अस्तित्व समाप्त हो गया, लेकिन इसके शिलालेख, मंदिर और मुद्राएँ आज भी इसके गौरवशाली इतिहास की गवाही देते हैं।