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भारतीय संविधान भाग 10 | स्थानीय प्रशासन व नीति | अनुच्छेद 244 व 244A | अनुसूचित जातीय और अनुसूचित जनजातीय क्षेत्र

13 Aug 2025 | Ful Verma | 125 views

भारतीय संविधान भाग 10 स्थानीय प्रशासन व नीति अनुच्छेद 244 व 244A अनुसूचित जातीयऔर अनुसूचित जनजातीय क्षेत्र

भारतीय संविधान भाग 10 स्थानीय प्रशासन व नीति अनुच्छेद 244 व 244A

अनुसूचित जातीयऔर अनुसूचित जनजातीय क्षेत्र


परिचय और महत्व

भाग 10 का उद्देश्य उन क्षेत्रों में विशेष प्रशासनिक व्यवस्था सुनिश्चित करना है जहाँ अनुसूचित जनजातियों (Scheduled Tribes) की सांस्कृतिक, सामाजिक और आर्थिक विचारधाराएँ भिन्न होती हैं और जहाँ परंपरागत संस्थाएँ तथा जमीन-संबंधी व्यवस्थाएँ महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। अनुच्छेद 244 और 244A संविधान को यह शक्ति देते हैं कि वे Fifth और Sixth Schedule के माध्यम से ऐसे क्षेत्रों के लिए विशिष्ट नियम तय करें।

यह व्यवस्था आदिवासी समुदायों को उनकी सामाजिक पहचान, पारंपरिक कानूनों और जमीन-अधिकारों की सुरक्षा देने हेतु बनाई गई है ताकि तेज़ी से बदलते विकास के दौर में उनके स्वशासन और जीवन-अभिव्यक्ति का संरक्षण हो सके।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

ब्रिटिश शासनकाल में 'Excluded Areas' और 'Partially Excluded Areas' की अवधारणा थी। स्वतंत्रता के बाद संविधान-निर्माणकर्ताओं ने इन ऐतिहासिक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए Fifth और Sixth Schedule की व्यवस्था की ताकि परंपरागत प्रशासन और संसाधन प्रबंधन को संरक्षण मिल सके। संविधान के प्रारूप में यह संवैधानिक सुरक्षा आदिवासी अधिकारों को मान्यता देती है और संघीय ढांचे के भीतर विशिष्ट स्वायत्तता का प्रावधान करती है।

➦ भारतीय संविधान अनुच्छेद 244 (Article 244)अनुसूचित क्षेत्रों और जनजाति क्षेत्रों का प्रशासन-

  • (1) पांचवीं अनुसूची के उपबंध असम, मेघालय, त्रिफुरा और मिजोरम राज्योंट से भिन्न किसी राज्य के अनुसूचित क्षेत्रों और अनुसूचित जनजातियों के प्रशासन और नियंत्रण के लिए लागू होंगे ।
  • (2) छठी अनुसूची के उपबंध असम, मेघालय, त्रिफुरा और मिजोरम राज्यों के जनजाति क्षेत्रों के प्रशासन के लिए लागू होंगे ।

➦ भारतीय संविधान अनुच्छेद 244क  (Article 244क)असम के कुछ जनजाति क्षेत्रों को समाविष्ट करने वाला एक स्वशासी राज्य बनाना और उसके लिए स्थानीय विधान-मंडल या मंत्रि-परिषद् का या दोनों का सॄजन-

(1) इस संविधान में किसी बात के होते हुए भी, संसद विधि द्वारा असम राज्य के भीतर एक स्वशासी राज्य बना सकेगी, जिसमें छठी अनुसूची के पैरा 20 से संलग्न सारणी के भाग 1 में विनिर्दिष्ट सभी या कोई जनजाति क्षेत्र (पुर्णतः या भागतः) समाविष्ट होंगे और उसके लिए --

  • (क) उस स्वशासी राज्य के विधान-मंडल के रूप में कार्य करने के लिए निर्वाचित या भागतः नामनिर्देशित और भागतः निर्वाचित निकाय का, या
  • (ख) मंत्रि-परिषद् का, या दोनों का सॄजन कर सकेगी, जिनमें से प्रत्येक का गठन, शक्तियां और कॄत्य वे होंगे जो उस विधि में विनिर्दिष्ट किए जाएं ।

(2) खंड (1) में निर्दिष्ट विधि, विशिष्टतया,

  • (क) राज्य सूची या समवर्ती सूची में प्रगणित वे विषय विनिर्दिष्ट कर सकेगी जिनके संबंध में स्वशासी राज्य के विधान-मंडल को संपूर्ण स्वशासी राज्यके लिए या उसके किसी भाग के लिए विधि बनाने की शक्ति, असम राज्य के विधान-मंडल का अपवर्जन करके या अन्यथा, होगी ;
  • (ख) वे विषय परिनिाश्चित कर सकेगी जिन पर उस स्वशासी राज्य की कार्यफालिका शक्ति का विस्तार होगा ;
  • (ग) यह उपबंध कर सकेगी कि असम राज्य द्वारा उद्गॄहीत कोई कर स्वशासी राज्य को वहां तक सौंपा जाएगा जहां तक उसके आगम स्वशासी राज्य से प्राप्त हुए माने जा सकते हैं ;
  • (घ) यह उपबंध कर सकेगी कि इस संविधान के किसी अनुच्छेद में राज्य के प्रति किसी निर्देश का यह अर्थ लगाया जाएगा कि उसके अंतर्गत स्वशासी राज्य के प्रति निर्देश है ;और
  • (ङ) ऐसे अनुफूरक, आनुषांगिक या पारिणामिक उपबंध कर सकेगी जा आवश्यक समझे जाएं ।

(3) पूर्वोक्त प्रकार की किसी विधि का कोई संशोधन, जहां तक वह संशोधन खंड (2) के उपखंड (क) या उपखंड (ख) में विनिर्दिष्ट विषयों में से किसी से संबंधित है, तब तक प्रभावी नहीं होगा जब तक वह संशोधन संसद के प्रत्येक सदन में उफास्थित और मत देने वाले कम से कम दो-तिहाई सदस्यों द्वारा पारित नहीं कर दिया जाता है ।

(4) इस अनुच्छेद में निर्दिष्ट विधि को अनुच्छेद 368 के प्रयोजनों के लिए इस संविधान का संशोधन इस बात के होते हुए भी नहीं समझा जाएगा कि उसमें कोई ऐसा उपबंध अंतर्विष्ट है जो इस संविधान का संशोधन करता है या संशोधन करने का प्रभाव रखता है ।

Fifth Schedule — संरचना और प्रावधान

Fifth Schedule उन राज्यों के जिलों/क्षेत्रों के लिये विशेष प्रावधान देता है जहाँ अनुसूचित जनजातियों की उपस्थिति ज्यादा है। इसका लक्ष्य है समुदाय-आधारित संसाधन प्रबंधन, भूमि-संरक्षण, और स्थानीय परंपराओं की रक्षा।

Fifth Schedule के प्रमुख तत्त्व

  • राष्ट्रपति अधिसूचना: राष्ट्रपति किसी क्षेत्र को Fifth Schedule में घोषित कर सकते हैं और आवश्यक नियम/निर्देश जारी कर सकते हैं।
  • भूमि-विनियम: भूमि का लेन-देन, पट्टे, विक्रय पर सीमाएँ लगाई जा सकती हैं।
  • प्रशासकीय हस्तक्षेप: स्थानीय प्रशासन, योजना और विकास के मामलों में परामर्श और संरक्षण का प्रावधान।
  • नियुक्त प्राधिकारी: राज्यों/केंद्र द्वारा ऐसे क्षेत्रों के लिये विशेष प्रशासक/अधिकारी नियुक्त किए जा सकते हैं।

व्यावहारिक प्रभाव

Fifth Schedule के तहत लागू नियमों से पारंपरिक भूमि-अधिकार सुरक्षित रहते हैं, औद्योगिक परियोजनाओं के लिये परामर्श की प्रक्रिया अनिवार्य होती है और स्थानीय स्वशासन को प्रोत्साहन मिलता है।

Sixth Schedule — Autonomous District Councils (ADCs)

Sixth Schedule पूर्वोत्तर राज्यों के कुछ भागों में स्वायत्त जिला परिषदों के माध्यम से विशेष स्वशासन प्रदान करता है। इन ADCs को सीमित विधायी, प्रशासनिक और न्यायिक शक्तियाँ दी जाती हैं।

ADCs की संरचना

  • निर्वाचित परिषद सदस्य और कुछ नामांकित सदस्य होते हैं।
  • परिषदें स्थानीय नीतियाँ बनाती हैं: भूमि, कृषि, अनुषंगी संसाधन, और स्थानीय न्यायिक प्रावधान।
  • ADCs आम तौर पर पूर्वोत्तर के राज्यों—जैसे मेघालय, असम (कुछ हिस्से), त्रिपुरा और मिज़ोरम—में पाए जाते हैं।

ADCs के अधिकार

  • स्थानीय विधि-निर्माण (नियत सीमाओं के भीतर)
  • भूमि और संसाधन का प्रबंधन
  • स्थानीय न्यायाधिकरण और परंपरागत नियमों का पालन-नियमन

PESA Act, 1996 — Panchayats (Extension to Scheduled Areas)

PESA का उद्देश्य Fifth Schedule के अंतर्गत आने वाले क्षेत्रों में पंचायत व्यवस्था को स्थानीय परंपरागत संस्थाओं और जनजातीय स्वशासन के अनुरूप विस्तारित करना है। PESA स्थानीय निर्णय-प्रक्रिया और संसाधन नियंत्रण को मजबूत करने के लिये बना एक महत्वपूर्ण कानून है।

PESA के महत्वपूर्ण प्रावधान

  • स्थानीय परंपरागत संस्थाओं की मान्यता और अधिकार।
  • भूमि, वन, प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग पर समुदाय की सहमति व परामर्श।
  • स्थानीय स्तर पर विकास परियोजनाओं के चयन और निगरानी की क्षमता।

महत्वपूर्ण: PESA का प्रभाव तभी अधिक होता है जब राज्य सरकारें इसे सही ढंग से लागू कर के स्थानीय संस्थाओं को वास्तविक निर्णय-शक्ति दें और वित्तीय संसाधन उपलब्ध कराएँ।

राज्यवार उदाहरण (व्यवहारिक परिदृश्य)

नीचे कुछ राज्यों/क्षेत्रों के उदाहरण और उनके प्रावधान दिए जा रहे हैं, ताकि पाठक व्यवहारिक समझ प्राप्त कर सकें:

छत्तीसगढ़ और ओडिशा

छत्तीसगढ़ व ओडिशा में Fifth Schedule वाले कई जिले हैं जहाँ भूमि संरक्षण, वन अधिकार और लोकपरंपराओं का संरक्षण केंद्रीय व राज्य नीतियों के जरिये किया जाता है। PESA के अनुरूप पंचायतों को अधिक निर्णय-शक्ति देने के लिए राज्य-स्तर योजनाएँ बनाई गई हैं, पर कार्यान्वयन चुनौतीपूर्ण रहा है।

झारखंड

झारखंड में भी अनुसूचित क्षेत्रों में पारंपरिक भूमि-स्वामित्व और वनाधिकार के अधिकारों के संवैधानिक संरक्षण पर विशेष जोर है। खनन और विकास परियोजनाओं के कारण स्थानीय समुदायों के अधिकारों और विस्थापन के मुद्दे सामने आते रहते हैं।

पूर्वोत्तर (मेघालय, असम, मिजोरम, त्रिपुरा)

Sixth Schedule के तहत Autonomous District Councils ने स्थानीय परंपराओं व न्यायिक प्रक्रियाओं को संरक्षित किया है। परन्तु ADC और राज्य सरकारों के बीच वित्तीय निर्भरता, अधिकारों की अस्पष्टता तथा बड़े इन्फ्रास्ट्रक्चर पर टकराव सामान्य परेशानियाँ हैं।

कानूनी मामले और सुप्रीम कोर्ट/हाई कोर्ट के निर्णय (सार)

सम्बंधित मामलों में न्यायालयों ने यह स्पष्ट किया है कि Fifth/Sixth Schedule एवं PESA के प्रावधानों का उद्देश्य स्थानीय अधिकारों की रक्षा है। कई मामलों में न्यायालयों ने विकास परियोजनाओं में उचित परामर्श और मुआवजे की आवश्यकता को बल दिया है।

(यहाँ विशिष्ट मामलों/हाई-प्रोफाइल निर्णयों के उद्धरण जोड़ना उपयोगी होगा — यदि आप चाहें तो मैं प्रमुख सुप्रीम-कोर्ट निर्णयों की सूची और सार यहाँ जोड़ दूँ।)

जमीनी चुनौतियाँ

  • भूमि-अधिकार विवाद: निजीकरण व निवेश के दबाव से जमीन के पारंपरिक अधिकारों पर खतरा।
  • विकास बनाम संरक्षण: बड़े ढांचागत प्रोजेक्ट अक्सर स्थानीय परामर्श की अनदेखी कर के आयाम प्रभावित करते हैं।
  • वित्तीय स्वायत्तता का अभाव: ADC/स्थानीय निकायों पर राजस्व की कमी और राज्य/केंद्र पर निर्भरता।
  • कानूनी और प्रशासनिक अस्पष्टता: Fifth/Sixth Schedule के प्रावधान और राज्य-क़ानूनों के बीच समन्वय हीनता।
  • निगरानी और कार्यान्वयन: PESA जैसे कानूनों के अनुपालन की कमी और स्थानीय संस्थाओं की क्षमता में कमी।

नीति-सुझाव व सुधार

नीचे कुछ व्यावहारिक नीति-सुझाव दिए जा रहे हैं, जिन्हें अपनाने पर आदिवासी क्षेत्रों के प्रशासन व संरक्षण में सुधार हो सकता है:

  • क़ानूनी स्पष्टता: Fifth/Sixth Schedule, PESA और राज्य-क़ानूनों के बीच संगति लाने के लिए संशोधन व दिशानिर्देश।
  • वित्तीय सशक्तिकरण: SFC (State Finance Commission) की सिफारिशों के आधार पर ADC/स्थानीय निकायों को स्थायी राजस्व स्रोत दिए जाएँ।
  • स्थानीय क्षमता निर्माण: तकनीकी प्रशिक्षण, शासन-प्रशासन के प्रशिक्षण और वित्तीय प्रबंधन की क्षमताओं का विकास।
  • पूर्व-परामर्श और सहमति: विकास परियोजनाओं से पहले सुव्यवस्थित और बाध्यकारी परामर्श प्रक्रियाएँ।
  • न्यायिक मार्गदर्शन: सुप्रीम-कोर्ट/हाई-कोर्ट से दिशानिर्देशों के माम से विवादों का शीघ्र निवारण।

➦ नोट - इस पेज पर आगे और भी जानकारियां अपडेट की जायेगी, उपरोक्त जानकारियों के संकलन में पर्याप्त सावधानी रखी गयी है फिर भी किसी प्रकार की त्रुटि अथवा संदेह की स्थिति में स्वयं किताबों में खोजें तथा फ़ीडबैक/कमेंट के माध्यम से हमें भी सूचित करें