🏰 मौर्य साम्राज्य (Maurya Empire) – भाग 1
प्रस्तावना
- भारतीय इतिहास में मौर्य साम्राज्य का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह भारत का पहला साम्राज्य था जिसने उपमहाद्वीप के अधिकांश भू-भाग को एकीकृत राजनीतिक सत्ता के अंतर्गत लाकर भारत को एक विशाल साम्राज्य का स्वरूप दिया।
- मौर्य साम्राज्य की स्थापना 321 ईसा पूर्व में चन्द्रगुप्त मौर्य ने की और यह साम्राज्य लगभग 185 ईसा पूर्व तक टिका रहा। इस काल में शासन, राजनीति, अर्थव्यवस्था, समाज, संस्कृति, कला, और धर्म सभी क्षेत्रों में व्यापक विकास हुआ।
मौर्य साम्राज्य का महत्व केवल इसलिए नहीं है कि यह भारत का पहला अखिल–भारतीय साम्राज्य था, बल्कि इसलिए भी कि इस काल ने भारतीय उपमहाद्वीप को एक साझा प्रशासनिक और सांस्कृतिक पहचान प्रदान की। विशेषकर अशोक महान का काल भारतीय और एशियाई इतिहास में अद्वितीय स्थान रखता है।
मौर्य साम्राज्य का उदय
मौर्य साम्राज्य के उदय को समझने के लिए हमें मगध की राजनीतिक परिस्थितियों पर दृष्टि डालनी होगी। मौर्य वंश के उदय से पूर्व नंद वंश मगध पर शासन कर रहा था।
- नंद वंश अत्यधिक शक्तिशाली था, लेकिन उसकी नीतियों और कर व्यवस्था से प्रजा असंतुष्ट हो गई थी।
- नंद शासकों ने अत्यधिक कर वसूले और प्रजा पर कठोर दंड लगाए।
- यही असंतोष उनके पतन का कारण बना।
यही समय था जब चाणक्य (कौटिल्य/विष्णुगुप्त) ने चन्द्रगुप्त मौर्य को तैयार किया और नंद वंश को समाप्त कर एक नए साम्राज्य की नींव रखी।
चन्द्रगुप्त मौर्य (321 ई.पू.–297 ई.पू.)
जीवन परिचय
- चन्द्रगुप्त मौर्य को मौर्य साम्राज्य का संस्थापक माना जाता है।
- वह एक साधारण परिवार में जन्मा, किंतु चाणक्य की शिक्षा और मार्गदर्शन से उसने साम्राज्य स्थापित किया।
- यूनानी दूत मैगस्थनीज ने अपनी पुस्तक इंडिका (Indica) में चन्द्रगुप्त के दरबार और शासन का उल्लेख किया है।
सत्ता प्राप्ति
- चन्द्रगुप्त मौर्य ने चाणक्य की सहायता से नंद वंश के अंतिम शासक घनानंद को पराजित किया।
- लगभग 321 ई.पू. में उसने मौर्य साम्राज्य की स्थापना की।
सिकंदर के उत्तराधिकारी से संघर्ष
- जब सिकंदर भारत से लौट गया (323 ई.पू.), तो उसके द्वारा छोड़े गए यूनानी सेनापति भारत के उत्तर-पश्चिम में शासन कर रहे थे।
- चन्द्रगुप्त ने उन्हें परास्त किया और उत्तर-पश्चिमी भारत को अपने साम्राज्य में शामिल किया।
प्रशासन
- चन्द्रगुप्त का प्रशासन अत्यंत संगठित और सुदृढ़ था।
- उसके प्रधानमंत्री चाणक्य (कौटिल्य) ने अर्थशास्त्र नामक ग्रंथ की रचना की, जिसमें राज्यनीति, कर व्यवस्था, विदेश नीति, और युद्ध नीति का विस्तृत वर्णन है।
- राजधानी पाटलिपुत्र को प्रशासनिक केंद्र बनाया गया।
सेल्यूकस निकेटर से युद्ध (305 ई.पू.)
- सिकंदर के उत्तराधिकारी सेल्यूकस निकेटर ने चन्द्रगुप्त से संघर्ष किया।
- परंतु अंततः चन्द्रगुप्त ने उसे पराजित किया और एक संधि की गई।
- इस संधि के अंतर्गत सेल्यूकस ने चन्द्रगुप्त को अराकोसिया, गंधार, पारोपामिसाद और अरियाना क्षेत्र दे दिए।
- इसके बदले चन्द्रगुप्त ने उसे 500 हाथी उपहार में दिए।
- इस संधि को मजबूत करने के लिए चन्द्रगुप्त ने सेल्यूकस की पुत्री से विवाह किया।
जैन धर्म की ओर झुकाव
- चन्द्रगुप्त मौर्य के अंतिम समय में जैन धर्म की ओर झुकाव हुआ।
- उसने अपने पुत्र बिन्दुसार को गद्दी सौंपी और जैन साधुओं के साथ श्रवणबेलगोला (कर्नाटक) चला गया।
- वहीं उसने संलेखन व्रत धारण कर प्राण त्याग दिए (लगभग 297 ई.पू.)।
चन्द्रगुप्त मौर्य का महत्व
- भारत में पहला अखिल-भारतीय साम्राज्य स्थापित किया।
- विदेशी आक्रमणकारियों को परास्त कर उत्तर-पश्चिमी भारत को सुरक्षित किया।
- संगठित प्रशासन की नींव रखी।
- कौटिल्य के अर्थशास्त्र की नीतियों को व्यवहारिक रूप दिया।
🏰 मौर्य साम्राज्य (Maurya Empire) – भाग 2
बिन्दुसार (297 ई.पू.–273 ई.पू.)
परिचय
- बिन्दुसार मौर्य साम्राज्य का दूसरा शासक था।
- यह चन्द्रगुप्त मौर्य का पुत्र और अशोक महान का पिता था।
- यूनानी लेखक एथेनियस ने इसे "अमित्रघात" (शत्रुओं का संहार करने वाला) कहा है।
- ग्रीक स्रोतों में इसका नाम Amitrochates (संस्कृत "अमित्रघात") मिलता है।
कार्यकाल (297 ई.पू.–273 ई.पू.)
- चन्द्रगुप्त मौर्य के जैन धर्म की ओर झुकने और गद्दी त्यागने के बाद 297 ई.पू. में बिन्दुसार मौर्य सिंहासन पर बैठा।
- उसने लगभग 24 वर्ष शासन किया।
उपलब्धियाँ
- साम्राज्य का विस्तार
- बिन्दुसार ने अपने पिता चन्द्रगुप्त द्वारा स्थापित साम्राज्य को आगे बढ़ाया।
- उसने दक्षिण भारत के कई राज्यों को अपने अधीन किया।
- कहा जाता है कि उसने "चोल, पाण्ड्य, सातवाहन और केरल" को अपने अधीन कर लिया।
- केवल कर्णाटक और तमिलनाडु के कुछ सुदूर क्षेत्र स्वतंत्र रहे।
- सेल्यूकस से संबंध
- यूनानी स्रोतों में उल्लेख है कि बिन्दुसार ने मिस्र के शासक टॉलेमी II से संपर्क किया और यूनानी उपहार मंगवाए।
- इससे स्पष्ट है कि बिन्दुसार का साम्राज्य अंतर्राष्ट्रीय व्यापार और कूटनीति में भी सक्रिय था।
- धर्म और नीति
- बिन्दुसार के बारे में कहा जाता है कि वह आजीविक संप्रदाय से प्रभावित था।
- उसने चाणक्य की नीति को अपनाकर साम्राज्य को संगठित बनाए रखा।
बिन्दुसार का महत्व
- उसने साम्राज्य को दक्षिण भारत तक फैलाया।
- प्रशासन को चाणक्य की नीतियों पर आगे बढ़ाया।
- अपने पुत्र अशोक को शासन के लिए तैयार किया।
अशोक महान (273 ई.पू.–232 ई.पू.)
परिचय
- अशोक भारतीय इतिहास का सबसे महान शासक माना जाता है।
- उसका पूरा नाम देवानामप्रिय अशोक (देवताओं का प्रिय अशोक) और प्रियदर्शी (सुंदर रूप वाला) मिलता है।
- अशोक का काल मौर्य साम्राज्य के उत्कर्ष का काल माना जाता है।
कार्यकाल (273 ई.पू.–232 ई.पू.)
- बिन्दुसार की मृत्यु के बाद, उत्तराधिकार युद्ध हुआ।
- अंततः 273 ई.पू. में अशोक गद्दी पर बैठा।
- उसका शासन लगभग 41 वर्षों तक चला।
प्रारंभिक शासन
- अशोक का शासन प्रारंभ में सामान्य शासकों की तरह कठोर था।
- उसने विद्रोहों का दमन किया और साम्राज्य को सुदृढ़ किया।
- तक्षशिला और उज्जैन जैसे क्षेत्रों में उसने शासन की मजबूती दिखाई।
कलिंग युद्ध (261 ई.पू.)
- अशोक के शासन का सबसे महत्वपूर्ण मोड़ कलिंग युद्ध था।
- कलिंग (वर्तमान ओडिशा) एक स्वतंत्र और समृद्ध राज्य था।
- अशोक ने इसे जीतने के लिए युद्ध छेड़ा।
परिणाम
- युद्ध अत्यंत भीषण था।
- अशोक के शिलालेखों के अनुसार –
- लगभग 1,00,000 लोग मारे गए
- 1,50,000 लोग बंदी बनाए गए
- और असंख्य लोग पीड़ित हुए।
- यह दृश्य देखकर अशोक का हृदय परिवर्तन हुआ।
अशोक का धर्म परिवर्तन
- कलिंग युद्ध के बाद अशोक ने बौद्ध धर्म अपना लिया।
- वह बौद्ध धर्म का महान संरक्षक बन गया।
- उसने अपने साम्राज्य में धम्म नीति (Dhamma Policy) लागू की।
धम्म नीति
- अहिंसा, करुणा और सहिष्णुता पर आधारित।
- प्रजा के लिए धर्म-महामात्र नियुक्त किए गए।
- शिलालेखों और स्तंभों के माध्यम से जनता को उपदेश दिए।
प्रशासन और शासन
- राजधानी – पाटलिपुत्र
- प्रशासनिक विभाजन – साम्राज्य को प्रांतों में बाँटा गया।
- उज्जैन
- तक्षशिला
- सुवर्णगिरि
- कश्मीर
- धम्म-महामात्र – जनता को नैतिक शिक्षा देने और समाज में शांति बनाए रखने के लिए नियुक्त।
अशोक और बौद्ध धर्म का प्रसार
- अशोक ने बौद्ध धर्म को भारत से बाहर भी फैलाया।
- उसने श्रीलंका, नेपाल, अफगानिस्तान, मध्य एशिया और यूनान तक बौद्ध धर्म का प्रचार कराया।
- उसके पुत्र महेंद्र और पुत्री संगमित्रा ने श्रीलंका में बौद्ध धर्म फैलाया।
अशोक के अभिलेख
- अशोक ने अपने आदेश शिलालेखों और स्तंभों पर खुदवाए।
- ये अभिलेख ब्राह्मी और खरोष्ठी लिपि में हैं।
- प्रमुख स्थान –
- दिल्ली-टोपरा स्तंभ
- लौरिया नंदनगढ़ (बिहार)
- सांची
- कौशाम्बी
- इनसे अशोक की नीतियों और धर्म का पता चलता है।
अशोक की मृत्यु
- अशोक की मृत्यु लगभग 232 ई.पू. में हुई।
- उसके बाद मौर्य साम्राज्य का धीरे-धीरे पतन शुरू हुआ।
अशोक का महत्व
- भारत का पहला शासक जिसने अहिंसा और करुणा को राज्य नीति बनाया।
- बौद्ध धर्म को एशिया में फैलाकर विश्व स्तर पर भारत की पहचान कराई।
- अशोक के शिलालेख भारतीय इतिहास के प्रामाणिक स्रोत हैं।
- उसे "देवानामप्रिय प्रियदर्शी" की उपाधि मिली।
अशोक का महत्व और विरासत
- अशोक विश्व इतिहास के महानतम शासकों में गिना जाता है।
- उसका शासन न्याय, करुणा और धर्म पर आधारित था।
- भारत का राष्ट्रीय प्रतीक – सारनाथ का सिंह स्तंभ (अशोक स्तंभ) है।
- "धर्मचक्र" को भारतीय ध्वज में स्थान मिला है।
- उसे "चक्रवर्ती सम्राट" कहा गया।
- बौद्ध धर्म के वैश्विक प्रसार का मुख्य श्रेय अशोक को जाता है।
🏰 मौर्य साम्राज्य (Maurya Empire) – भाग 3
अशोक के बाद का काल
- अशोक की मृत्यु (232 ई.पू.) के बाद मौर्य साम्राज्य धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगा।
- अशोक ने अपने जीवनकाल में बौद्ध धर्म और "धम्म नीति" पर जोर दिया, परंतु उसके उत्तराधिकारियों में वह क्षमता नहीं थी कि वे इतने विशाल साम्राज्य को संभाल सकें।
- साम्राज्य प्रांतीय शक्तियों में विभाजित होने लगा और धीरे-धीरे पतन की ओर बढ़ा।
1. दशरथ मौर्य (232 ई.पू.–224 ई.पू.)
परिचय
- दशरथ अशोक का पौत्र था।
- अशोक की मृत्यु के बाद उसने सत्ता संभाली।
कार्यकाल
- उसने लगभग 8 वर्ष शासन किया।
कार्य और उपलब्धियाँ
- दशरथ ने अशोक की नीति को आगे बढ़ाने की कोशिश की।
- उसने नालन्दा, गया और जौनपुर के पास कई गुफाओं में शिलालेख खुदवाए।
- बाराबर और नागार्जुनी पहाड़ियों की गुफाएँ इसी काल में खुदवाई गईं, जो आज भी संरक्षित हैं।
- वह आजीविक संप्रदाय का संरक्षक रहा।
महत्व
- अशोक के बाद मौर्य साम्राज्य में स्थिरता बनाए रखने वाला अंतिम शासक दशरथ ही था।
2. सम्प्रति (224 ई.पू.–215 ई.पू.)
परिचय
- सम्प्रति अशोक का पौत्र और बिन्दुसार का पुत्र था।
- वह जैन धर्म से अत्यधिक प्रभावित था।
कार्यकाल
- उसने लगभग 9 वर्ष शासन किया।
उपलब्धियाँ
- सम्प्रति को "जैन धर्म का अशोक" कहा जाता है।
- उसने जैन धर्म का प्रचार भारत और विदेशों तक कराया।
- उसके शासनकाल में साम्राज्य की सीमाएँ सिकुड़ने लगीं।
3. शालिशूक मौर्य (215 ई.पू.–202 ई.पू.)
परिचय
- सम्प्रति का उत्तराधिकारी शालिशूक था।
कार्यकाल
कार्य और स्थिति
- शालिशूक एक दुर्बल और अयोग्य शासक था।
- उसने प्रशासन पर ध्यान नहीं दिया।
- परिणामस्वरूप साम्राज्य में विद्रोह और अस्थिरता बढ़ी।
4. देववर्मन मौर्य (202 ई.पू.–195 ई.पू.)
परिचय
- शालिशूक के बाद उसका पुत्र देववर्मन शासक बना।
कार्यकाल
स्थिति
- देववर्मन एक कमजोर शासक था।
- उसके समय में साम्राज्य की एकता और अधिक टूट गई।
5. शातधान्वन मौर्य (195 ई.पू.–187 ई.पू.)
परिचय
- देववर्मन के बाद शातधान्वन गद्दी पर बैठा।
कार्यकाल
- उसने लगभग 8 वर्ष शासन किया।
कार्य और स्थिति
- शातधान्वन ने साम्राज्य की रक्षा की कोशिश की, लेकिन उसकी शक्ति कमज़ोर पड़ चुकी थी।
- धीरे-धीरे साम्राज्य केवल मगध तक सीमित रह गया।
6. बृहद्रथ मौर्य (187 ई.पू.–185 ई.पू.)
परिचय
- मौर्य साम्राज्य का अंतिम शासक बृहद्रथ था।
कार्यकाल
- उसने केवल 2 वर्ष शासन किया।
पतन
- बृहद्रथ एक कमजोर शासक था।
- उसके समय तक साम्राज्य पूरी तरह दुर्बल हो चुका था।
- मगध के सेनापति पुष्यमित्र शुंग ने उसे दरबार में ही मार डाला (185 ई.पू.)।
- इसके साथ ही मौर्य साम्राज्य का अंत हुआ और शुंग वंश की स्थापना हुई।
मौर्य साम्राज्य का पतन – कारण
- कमजोर उत्तराधिकारी – अशोक के बाद कोई भी शासक साम्राज्य को सुदृढ़ नहीं रख सका।
- विशाल साम्राज्य का प्रशासनिक बोझ – इतने बड़े साम्राज्य को संभालना कठिन था।
- आर्थिक गिरावट – लगातार युद्धों और अशोक की धम्म नीति ने आर्थिक संसाधनों पर दबाव डाला।
- प्रांतीय स्वतंत्रता – साम्राज्य के विभिन्न प्रांत स्वतंत्र होने लगे।
- सेनापति पुष्यमित्र शुंग की महत्वाकांक्षा – जिसने अंततः मौर्य शासक बृहद्रथ की हत्या कर दी।
🏰मौर्य साम्राज्य का पतन और अंत (232 ई.पू. – 185 ई.पू.)
1. मौर्य साम्राज्य के पतन के प्रमुख कारण
(क) कमजोर उत्तराधिकारी
- अशोक के बाद कोई भी शासक सक्षम और शक्तिशाली नहीं था।
- दशरथ और उसके बाद के शासकों में नेतृत्व का अभाव था।
(ख) विशाल साम्राज्य का नियंत्रण कठिन
- मौर्य साम्राज्य बहुत विशाल था (काबुल से कर्नाटक और बंगाल से अफगानिस्तान तक)।
- अशोक के बाद इतनी बड़ी सत्ता को एकजुट रखना संभव नहीं रहा।
(ग) प्रशासनिक बोझ
- मौर्य प्रशासन केंद्रीकृत और जटिल था।
- अधिकारियों में भ्रष्टाचार और स्वार्थ बढ़ने लगे।
(घ) आर्थिक संकट
- अशोक के समय विशाल निर्माण कार्य, स्तूप, शिलालेख और सामाजिक योजनाओं पर भारी खर्च हुआ।
- युद्ध बंद होने से आय में कमी आई।
- करों का बोझ बढ़ने लगा, जिससे जनता असंतुष्ट हुई।
(ङ) सैनिक शक्ति का ह्रास
- कलिंग युद्ध के बाद अशोक ने हिंसा और युद्ध नीति त्याग दी।
- सेना की शक्ति और मनोबल कम हुआ।
- यूनानी, शक और यवन आक्रमणों का मुकाबला करना कठिन हो गया।
(च) धार्मिक और सांस्कृतिक कारण
- अशोक ने बौद्ध धर्म को बढ़ावा दिया, जिससे ब्राह्मण वर्ग असंतुष्ट हुआ।
- उत्तराधिकारी शासक जैन धर्म या अन्य पंथों में लग गए।
- धार्मिक असंतोष ने राजनीतिक एकता को कमजोर किया।
(छ) प्रांतीय गवर्नरों की स्वतंत्रता
- साम्राज्य के दूरस्थ प्रांत (जैसे उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र) स्वतंत्र होने लगे।
- विदेशी आक्रमणकारियों ने इसका लाभ उठाया।
(ज) पुष्यमित्र शुंग की महत्वाकांक्षा
- सेना में मौर्य शासकों का प्रभाव घट रहा था।
- सेनापति पुष्यमित्र शुंग ने अवसर पाकर बृहद्रथ की हत्या कर दी।
2. मौर्य साम्राज्य के पतन के परिणाम
- भारत की एकता खंडित हुई – उत्तरी भारत अनेक छोटे राज्यों में बँट गया।
- शुंग वंश का उदय – ब्राह्मण संस्कृति और वैदिक परंपरा को पुनर्जीवित किया गया।
- विदेशी आक्रमणों का मार्ग प्रशस्त – यवन (इंडो-ग्रीक), शक, कुषाण आदि ने उत्तर-पश्चिम भारत में प्रवेश किया।
- बौद्ध धर्म का क्षय – राजकीय संरक्षण कम होने से बौद्ध धर्म का प्रभाव घटा।
- भारतीय इतिहास का संक्रमण काल – मौर्यों के बाद भारत में पुनः राजनीतिक अस्थिरता और क्षेत्रीय राज्यों का उदय हुआ।
3. मौर्य साम्राज्य का ऐतिहासिक महत्व
- भारत का पहला सबसे बड़ा केंद्रीकृत साम्राज्य।
- प्रशासनिक संगठन, अर्थव्यवस्था और विदेश नीति का उदाहरण।
- अशोक के कारण बौद्ध धर्म विश्वधर्म बना।
- भारतीय एकता और संस्कृति की नींव रखी।
🏰 मौर्य साम्राज्य (Maurya Empire) – भाग 4
1. मौर्य प्रशासन
मौर्य साम्राज्य का प्रशासन प्राचीन भारत की सबसे संगठित और व्यवस्थित प्रणाली मानी जाती है। इसका सबसे विस्तृत विवरण कौटिल्य के अर्थशास्त्र, मेगस्थनीज की इंडिका, और अशोक के शिलालेखों से प्राप्त होता है।
(क) राजा और केंद्रीय सत्ता
- मौर्य साम्राज्य में राजा सर्वोच्च सत्ता था।
- उसे "धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष" की रक्षा करने वाला माना जाता था।
- राजा का कर्तव्य था – प्रजा की सुरक्षा, न्याय देना, कर वसूली और साम्राज्य का विस्तार।
(ख) परिषद और मंत्री
- राजा को सलाह देने के लिए एक मंत्रिपरिषद थी।
- इसमें अर्थ, न्याय, रक्षा और धर्म के विशेषज्ञ शामिल थे।
- कौटिल्य (चाणक्य) चन्द्रगुप्त के काल में प्रधानमंत्री थे।
(ग) प्रशासनिक विभाजन
- साम्राज्य को प्रांतों में बाँटा गया था।
- प्रमुख प्रांत –
- पाटलिपुत्र (मगध)
- उज्जैन
- तक्षशिला
- सुवर्णगिरि
- कश्मीर
- प्रत्येक प्रांत में कुमार या राजकुमार गवर्नर होता था।
(घ) नगर प्रशासन
- नगरों का प्रशासन भी अत्यंत संगठित था।
- मेगस्थनीज के अनुसार, पाटलिपुत्र नगर परिषद में 30 सदस्य होते थे।
- उन्हें 6 समितियों में बाँटा गया था –
- उद्योग और कारीगर
- विदेशियों की देखभाल
- जन्म और मृत्यु का रिकॉर्ड
- व्यापार और वाणिज्य
- उत्पादों की जाँच
- सैनिक और नौका व्यवस्था
(ङ) सेना
- मौर्य साम्राज्य की सेना अत्यंत विशाल थी।
- मेगस्थनीज के अनुसार –
- 6,00,000 पैदल सैनिक
- 30,000 घुड़सवार
- 9,000 हाथी
- 8,000 रथ
- सेना के लिए एक "सेना परिषद" होती थी जिसमें 6 समितियाँ थीं।
2. न्याय व्यवस्था
- राजा सर्वोच्च न्यायाधीश था।
- आपराधिक और दीवानी दोनों प्रकार के कानून चलते थे।
- चोरी, हत्या और विद्रोह के लिए कठोर दंड दिए जाते थे।
- अशोक ने अपने काल में दंड व्यवस्था को कुछ हद तक नरम किया और "धम्म नीति" पर बल दिया।
3. मौर्यकालीन समाज
(क) वर्ण व्यवस्था
- समाज वर्ण आधारित था – ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र।
- मेगस्थनीज ने भारतीय समाज को "सात वर्गों" में बाँटा है –
- दार्शनिक और विद्वान
- कृषक
- पशुपालक
- कारीगर
- सैनिक
- प्रशासनिक कर्मचारी
- दरबारी
(ख) स्त्रियों की स्थिति
- स्त्रियों को शिक्षा का अवसर मिलता था।
- वे धार्मिक और सामाजिक कार्यों में भाग लेती थीं।
- हालांकि उनका प्रमुख कार्य गृहस्थ जीवन ही माना जाता था।
(ग) विवाह और परिवार
- पितृसत्तात्मक परिवार प्रचलित था।
- बहुपत्नी प्रथा भी उच्च वर्ग में पाई जाती थी।
4. अर्थव्यवस्था
मौर्य काल की अर्थव्यवस्था कृषि, उद्योग और व्यापार पर आधारित थी।
(क) कृषि
- भूमि राज्य की संपत्ति मानी जाती थी।
- किसानों को भूमि उपयोग के बदले कर देना होता था।
- सिंचाई व्यवस्था पर जोर दिया गया।
(ख) कर व्यवस्था
- राज्य का मुख्य आय स्रोत कर था।
- प्रमुख कर –
- भूमि कर (भोग)
- व्यापार कर
- पशु कर
- जंगल उत्पाद कर
- कुल आय का लगभग 1/6 भाग कर के रूप में वसूला जाता था।
(ग) उद्योग
- धातुकर्म, बुनाई, मिट्टी के बर्तन, लकड़ी और पत्थर का काम विकसित था।
- शिल्पकारों के लिए अलग समितियाँ थीं।
(घ) व्यापार
- आंतरिक और बाहरी दोनों प्रकार का व्यापार विकसित था।
- प्रमुख व्यापारिक मार्ग – उत्तरापथ और दक्षिणापथ।
- विदेशी व्यापार – यूनान, मिस्र, मध्य एशिया और श्रीलंका से।
- सिक्कों का प्रचलन – पंचमार्क सिक्के।
5. संस्कृति, कला और स्थापत्य
(क) स्थापत्य कला
- पाटलिपुत्र की राजधानी में शानदार महल और भवन।
- यूनानी लेखक मेगस्थनीज ने इसकी तुलना पर्सेपोलिस और सूसा के महलों से की है।
(ख) गुफा वास्तुकला
- बाराबर और नागार्जुनी की गुफाएँ (बिहार) – आजीविक संप्रदाय के लिए।
- इन गुफाओं में पॉलिश की हुई चट्टानें मौर्यकालीन कला की उत्कृष्ट मिसाल हैं।
(ग) स्तूप
- अशोक ने अनेक स्तूप बनवाए –
- सांची स्तूप (मध्य प्रदेश)
- भरहुत स्तूप
- कौशाम्बी स्तूप
- स्तूप बौद्ध धर्म के प्रतीक बने।
(घ) शिलालेख और स्तंभ
- अशोक ने शिलालेख और स्तंभ बनवाए।
- प्रसिद्ध स्तंभ – सारनाथ का सिंह स्तंभ (भारत का राष्ट्रीय प्रतीक)।
- स्तंभ पर ब्राह्मी और खरोष्ठी लिपि का प्रयोग।
6. धर्म और शिक्षा
(क) धर्म
- मौर्य साम्राज्य में विभिन्न धर्मों का सह-अस्तित्व था।
- चन्द्रगुप्त – जैन धर्म से प्रभावित।
- बिन्दुसार – आजीविक संप्रदाय का अनुयायी।
- अशोक – बौद्ध धर्म का महान संरक्षक।
- जनता में वैदिक धर्म, आजीविक, जैन और बौद्ध सभी पंथ प्रचलित थे।
(ख) शिक्षा
- शिक्षा का प्रमुख केंद्र तक्षशिला और नालंदा (प्रारंभिक रूप) थे।
- विषय – वेद, आयुर्वेद, खगोलशास्त्र, गणित, राजनीति, अर्थशास्त्र।
- शिक्षा का उद्देश्य केवल ज्ञान नहीं, बल्कि प्रशासन और नीति सीखना भी था।
मौर्य साम्राज्य – भाग 5
1. मौर्य साम्राज्य की विदेश नीति
मौर्य साम्राज्य की विदेश नीति अत्यंत व्यावहारिक, दूरदर्शी और साम्राज्यवादी दृष्टिकोण पर आधारित थी।
- चन्द्रगुप्त मौर्य की विदेश नीति:
- यूनानी शासक सेल्युकस निकेटर से युद्ध और फिर संधि (305 ई.पू.) की।
- संधि के तहत सेल्युकस ने अफगानिस्तान व बलूचिस्तान के क्षेत्र चन्द्रगुप्त को दे दिए।
- बदले में चन्द्रगुप्त ने उसे 500 हाथी भेंट किए।
- मेगस्थनीज़ को राजदूत बनाकर पाटलिपुत्र भेजा गया।
- बिन्दुसार की विदेश नीति:
- बिन्दुसार ने यूनानी शासक एंटिओकस I से संपर्क बनाए रखा।
- बताया जाता है कि उसने एंटिओकस से अंजीर, अंगूर और वाइन की मांग की थी।
- अशोक की विदेश नीति:
- कलिंग युद्ध तक अशोक की नीति आक्रामक रही।
- युद्ध के बाद उसने धम्म आधारित विदेश नीति अपनाई।
- यूनानी राजाओं (एंटिओकस II, टॉलेमी II, एंटिगोनस, मागस, अलेक्ज़ांडर II) को धर्म प्रचारकों को भेजा।
- विदेश नीति का उद्देश्य सैन्य विस्तार नहीं बल्कि धर्म और संस्कृति का विस्तार बन गया।
2. अशोक के समय बौद्ध धर्म का अंतर्राष्ट्रीय प्रसार
अशोक के शासनकाल में बौद्ध धर्म का सर्वाधिक विस्तार हुआ।
- तीसरी बौद्ध संगीति (सम्मेलन) (पाटलिपुत्र, 250 ई.पू.) आयोजित हुई।
- इसमें त्रिपिटक का संकलन हुआ।
- मोग्गलिपुत्त तिस्स ने नेतृत्व किया।
- अशोक ने धर्म प्रचारकों को विदेशों में भेजा:
- श्रीलंका (पुत्र महेंद्र और पुत्री संघमित्रा)
- नेपाल, कश्मीर, गांधार, अफगानिस्तान
- मिस्र, सीरिया, ग्रीस और मध्य एशिया
- परिणामस्वरूप बौद्ध धर्म एक अंतर्राष्ट्रीय धर्म बन गया।
- श्रीलंका में आज भी अशोक के भेजे गए पौधे (बोधिवृक्ष की शाखा) पूजनीय हैं।
3. मौर्य कालीन साहित्य और विचारधारा
मौर्य युग साहित्यिक और दार्शनिक दृष्टि से महत्वपूर्ण था।
- अर्थशास्त्र – कौटिल्य (चाणक्य) का ग्रंथ, जिसमें राजनीति, प्रशासन, अर्थव्यवस्था और युद्धनीति का वर्णन है।
- अशोक के शिलालेख – ये प्राकृत भाषा और ब्राह्मी लिपि में हैं।
- जैन और बौद्ध ग्रंथ – त्रिपिटक, जैन आगम का संकलन इसी काल में प्रचलित हुआ।
- यूनानी लेखक मेगस्थनीज़ – उसने "इंडिका" ग्रंथ लिखा, जिसमें मौर्य कालीन समाज और प्रशासन का विवरण मिलता है।
- विचारधारा:
- मौर्य युग धर्म और राजनीति के सामंजस्य का काल था।
- अशोक ने धम्म को राजधर्म के रूप में प्रस्तुत किया।
- सहिष्णुता, करुणा और सर्वधर्म समभाव पर बल दिया गया।
4. साम्राज्य के दीर्घकालीन प्रभाव
मौर्य साम्राज्य ने भारतीय इतिहास में गहरी छाप छोड़ी।
- राजनीतिक प्रभाव:
- भारत में पहली बार केंद्राभिमुख शासन प्रणाली बनी।
- पाटलिपुत्र को राजनीतिक शक्ति का केंद्र बनाया।
- सांस्कृतिक प्रभाव:
- बौद्ध धर्म का प्रसार एशिया, यूरोप और अफ्रीका तक हुआ।
- कला और स्थापत्य (अशोक स्तंभ, शिलालेख, स्तूप) का विकास।
- सामाजिक प्रभाव:
- सामाजिक जीवन में करुणा और सहिष्णुता की भावना।
- पशु–पक्षियों और स्त्रियों के प्रति संवेदनशीलता।
- आर्थिक प्रभाव:
- कृषि, व्यापार और सिंचाई व्यवस्था को मजबूत किया।
- विदेशी व्यापार (यूनान, रोम, मिस्र) को बढ़ावा मिला।
- आध्यात्मिक प्रभाव:
- अहिंसा और धम्म को शासन का आधार बनाया।
- बौद्ध धर्म ने आगे चलकर चीन, जापान, तिब्बत और कोरिया तक पहुंचकर विश्व संस्कृति को प्रभावित किया।
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