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भारत के राष्ट्रपति | President of India GK MCQs

12 Sep 2025 | Ful Verma | 158 views

भारत के राष्ट्रपति – 50 महत्वपूर्ण वस्तुनिष्ठ प्रश्नोत्तर | President of India GK MCQs

भारत के राष्ट्रपति President of India GK

भारत के राष्ट्रपति – प्रस्तावना

भारत एक संघीय गणराज्य है जहाँ देश का सर्वोच्च संवैधानिक पद राष्ट्रपति होता है। 26 जनवरी 1950 को जब भारत का संविधान लागू हुआ, उसी दिन डॉ. राजेन्द्र प्रसाद स्वतंत्र भारत के पहले राष्ट्रपति बने। राष्ट्रपति को भारतीय संविधान में "Union Executive" (संघीय कार्यपालिका) का प्रमुख माना गया है।

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 52 से 78 तक राष्ट्रपति की शक्तियों और कार्यों का वर्णन है। अनुच्छेद 52 कहता है – “भारत का एक राष्ट्रपति होगा।”

राष्ट्रपति न केवल राष्ट्र का संवैधानिक प्रमुख है बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की पहचान और गरिमा का प्रतिनिधित्व भी करता है।

राष्ट्रपति का संवैधानिक महत्व

  1. राष्ट्रपति भारतीय संघ का औपचारिक प्रमुख (Ceremonial Head of the State) है।
  2. राष्ट्रपति भारत के सर्वोच्च सेनापति (Supreme Commander of the Armed Forces) होते हैं।
  3. राष्ट्रपति की अनुमति के बिना कोई भी कानून लागू नहीं हो सकता
  4. राष्ट्रपति संसद का सत्र बुलाने और भंग करने का अधिकार रखते हैं।
  5. आपातकाल की घोषणा केवल राष्ट्रपति द्वारा की जा सकती है।

इस प्रकार, राष्ट्रपति भारतीय लोकतंत्र की एक अपरिहार्य संस्था है जो देश की एकता, अखंडता और संप्रभुता का प्रतीक है।

भारत के राष्ट्रपति – शक्तियाँ व कार्य

भारत का राष्ट्रपति केवल संवैधानिक प्रमुख ही नहीं बल्कि कई प्रकार की महत्वपूर्ण शक्तियों का धारक भी है। यद्यपि वास्तविक कार्यपालिका शक्ति प्रधानमंत्री व मंत्रिपरिषद में निहित है, लेकिन राष्ट्रपति उन सभी शक्तियों का संवैधानिक माध्यम (Constitutional Head) है।

संविधान में राष्ट्रपति की शक्तियों का उल्लेख मुख्यतः अनुच्छेद 52 से 78, 123, 352–360 तथा अन्य संबंधित अनुच्छेदों में किया गया है। इन्हें हम अलग-अलग श्रेणियों में समझ सकते हैं।

1. कार्यपालिका संबंधी शक्तियाँ (Executive Powers)

  1. राष्ट्रपति भारत संघ का संवैधानिक प्रमुख है।
  2. केंद्र सरकार की सभी कार्यपालिका शक्तियाँ राष्ट्रपति के नाम से प्रयोग की जाती हैं।
  3. राष्ट्रपति प्रधानमंत्री की नियुक्ति करता है और प्रधानमंत्री की सलाह पर अन्य मंत्रियों को भी नियुक्त करता है।
  4. राष्ट्रपति राज्यपालों, उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों, नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG), चुनाव आयुक्तों, वित्त आयोग के अध्यक्ष आदि की नियुक्ति करता है।
  5. राष्ट्रपति संसद के दोनों सदनों को बुलाता, स्थगित करता और लोकसभा को भंग कर सकता है।
  6. राष्ट्रपति विदेशी राजदूतों और उच्चायुक्तों को स्वीकार करता है तथा अंतरराष्ट्रीय समझौतों पर भारत का प्रतिनिधित्व करता है।

👉 कार्यपालिका शक्तियों के अंतर्गत राष्ट्रपति वास्तव में देश का औपचारिक मुखिया होता है।

2. विधायी शक्तियाँ (Legislative Powers)

  1. राष्ट्रपति भारत की संसद का अभिन्न अंग है।
  2. संसद के दोनों सदनों का सत्र राष्ट्रपति की अनुमति से ही बुलाया जाता है।
  3. राष्ट्रपति लोकसभा को भंग करने का अधिकार रखता है।
  4. संसद का कोई भी विधेयक राष्ट्रपति की स्वीकृति के बिना कानून नहीं बन सकता।
  5. राष्ट्रपति लोकसभा में दो एंग्लो-इंडियन सदस्यों को नामित कर सकता है (हालाँकि 104वें संविधान संशोधन 2019 के बाद यह प्रावधान समाप्त हो चुका है)।
  6. राज्यसभा में राष्ट्रपति 12 सदस्यों को नामित करता है, जो साहित्य, विज्ञान, कला और समाज सेवा के क्षेत्र में विशेष ज्ञान या अनुभव रखते हों।
  7. राष्ट्रपति संसद को हर वर्ष अपने अभिभाषण में सरकार की नीतियों और योजनाओं से अवगत कराता है।
  8. अध्यादेश (Ordinance) जारी करने का अधिकार राष्ट्रपति के पास है (अनुच्छेद 123)।

👉 विधायी शक्तियों से यह स्पष्ट है कि राष्ट्रपति संसदीय लोकतंत्र की प्रक्रिया का अनिवार्य हिस्सा है।

3. न्यायिक शक्तियाँ (Judicial Powers)

  1. राष्ट्रपति सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति करता है।
  2. राष्ट्रपति को दया याचिका स्वीकार करने और दंड माफी देने का अधिकार है।
  3. अनुच्छेद 72 के अंतर्गत राष्ट्रपति –
  • दंड माफी (Pardon)
  • दंड परिवर्तन (Commutation)
  • दंड स्थगन (Suspension)
  • दंड लघुकरण (Remission)
  • दंड प्रतिस्थापन (Respite) कर सकता है।
  1. राष्ट्रपति किसी भी न्यायिक प्रश्न पर सुप्रीम कोर्ट से परामर्श ले सकता है (अनुच्छेद 143)।

👉 इन न्यायिक शक्तियों से राष्ट्रपति को “राष्ट्र का करुणामयी मुखिया” भी कहा जाता है।

4. आपातकालीन शक्तियाँ (Emergency Powers)

भारतीय संविधान में राष्ट्रपति को विशेष परिस्थितियों में तीन प्रकार की आपातकालीन शक्तियाँ दी गई हैं –

(A) राष्ट्रीय आपातकाल (National Emergency – अनुच्छेद 352)

  • यदि भारत की सुरक्षा पर बाहरी आक्रमण, युद्ध या आंतरिक विद्रोह का खतरा हो तो राष्ट्रपति राष्ट्रीय आपातकाल घोषित कर सकता है।
  • इस दौरान केंद्र की शक्ति राज्यों पर भी लागू हो जाती है।
  • मूल अधिकारों (Article 19) का निलंबन किया जा सकता है।

(B) राष्ट्रपति शासन (President’s Rule – अनुच्छेद 356)

  • यदि किसी राज्य में संवैधानिक तंत्र विफल हो जाए तो राष्ट्रपति उस राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू कर सकता है।
  • राज्य सरकार भंग हो जाती है और राज्यपाल राष्ट्रपति के अधीन कार्य करता है।

(C) वित्तीय आपातकाल (Financial Emergency – अनुच्छेद 360)

  • यदि भारत की वित्तीय स्थिरता पर संकट आ जाए तो राष्ट्रपति वित्तीय आपातकाल लागू कर सकता है।
  • इस स्थिति में कर्मचारियों के वेतन और न्यायालयों की स्वतंत्रता तक प्रभावित हो सकती है।

👉 आपातकालीन शक्तियाँ राष्ट्रपति को देश की सुरक्षा और अखंडता की रक्षा हेतु अत्यंत शक्तिशाली भूमिका प्रदान करती हैं।

5. सैन्य शक्तियाँ (Military Powers)

  1. राष्ट्रपति भारत के तीनों सेनाओं (थल, जल, वायु सेना) का सर्वोच्च सेनापति है।
  2. युद्ध की घोषणा करना और शांति समझौता करना केवल राष्ट्रपति के अधिकार में है।
  3. सेना में उच्च पदों की नियुक्ति राष्ट्रपति करता है।

6. कूटनीतिक शक्तियाँ (Diplomatic Powers)

  1. राष्ट्रपति अन्य देशों के साथ संधियाँ और समझौते करता है।
  2. राष्ट्रपति भारत की ओर से अंतरराष्ट्रीय मंचों पर प्रतिनिधित्व करता है।
  3. विदेशी देशों के राजदूतों व उच्चायुक्तों को स्वीकार करता है।

7. अन्य शक्तियाँ (Miscellaneous Powers)

  1. राष्ट्रपति योजना आयोग, वित्त आयोग और नीति आयोग जैसी संस्थाओं से जुड़े उच्च पदस्थ अधिकारियों की नियुक्ति करता है।
  2. राष्ट्रपति संसद को विशेष संदेश दे सकता है।
  3. राष्ट्रपति कुछ विधेयकों को विचार हेतु सर्वोच्च न्यायालय में भेज सकता है।
  4. राष्ट्रपति नागरिक सम्मान (जैसे भारत रत्न, पद्म पुरस्कार आदि) प्रदान करता है।

8. राष्ट्रपति की भूमिका – प्रतीकात्मक या वास्तविक?

यद्यपि भारत के राष्ट्रपति के पास बहुत-सी शक्तियाँ हैं, लेकिन अधिकांश शक्तियाँ प्रधानमंत्री व मंत्रिपरिषद की सलाह पर ही प्रयोग की जाती हैं

इसलिए राष्ट्रपति की भूमिका को अक्सर “रबर स्टाम्प” कहा जाता है।

लेकिन जब राजनीतिक अस्थिरता हो, गठबंधन की सरकार हो या आपातकाल की स्थिति हो, तब राष्ट्रपति की भूमिका अत्यधिक प्रभावशाली और निर्णायक हो जाती है।

✍️ निष्कर्ष

भारत के राष्ट्रपति की शक्तियाँ विविध और व्यापक हैं। वे न केवल देश के संवैधानिक प्रमुख हैं, बल्कि कार्यपालिका, विधायिका, न्यायपालिका और सैन्य क्षेत्र में भी उनका अधिकार मान्य है।

हालाँकि वास्तविक शक्ति मंत्रिपरिषद में होती है, फिर भी राष्ट्रपति भारतीय लोकतंत्र के संवैधानिक संतुलन और राष्ट्रीय एकता के सबसे बड़े प्रतीक हैं।

भारत के राष्ट्रपति – चुनाव, पात्रता और कार्यकाल

भारत का राष्ट्रपति केवल देश का संवैधानिक प्रमुख ही नहीं, बल्कि लोकतंत्र की एकता और अखंडता का प्रतीक है। इतने महत्वपूर्ण पद के लिए चुनाव की प्रक्रिया, आवश्यक पात्रताएँ और कार्यकाल भी विशेष रूप से संविधान में निर्धारित किए गए हैं।

संविधान के अनुच्छेद 54 से 62 तक राष्ट्रपति के चुनाव, पात्रता, कार्यकाल और उत्तराधिकारी संबंधी प्रावधान दिए गए हैं।

1. राष्ट्रपति का चुनाव (Election of the President)

(A) अप्रत्यक्ष चुनाव पद्धति

  • भारत के राष्ट्रपति का चुनाव सीधे जनता द्वारा नहीं किया जाता।
  • राष्ट्रपति का चुनाव नियत निर्वाचन मंडल (Electoral College) द्वारा किया जाता है।
  • निर्वाचन मंडल में शामिल होते हैं –
  1. संसद के दोनों सदनों (लोकसभा और राज्यसभा) के निर्वाचित सदस्य।
  2. राज्यों की विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्य।
  3. केंद्र शासित प्रदेशों की विधानसभाओं (दिल्ली और पुडुचेरी) के निर्वाचित सदस्य।

👉 नामित सदस्य (लोकसभा, राज्यसभा या विधानसभाओं के) राष्ट्रपति के चुनाव में भाग नहीं लेते।

(B) मूल्यांकन प्रणाली (Value of Votes)

राष्ट्रपति के चुनाव में सभी वोटों का मूल्य समान नहीं होता।

  • एक सांसद का वोट मूल्य : 708 (स्थायी रूप से तय)।
  • एक विधायक का वोट मूल्य संबंधित राज्य की जनसंख्या और विधायकों की संख्या के आधार पर तय होता है।

👉 सूत्र :

एक विधायक के वोट का मूल्य = राज्यकी जनसंख्या /विधानसभा के निर्वाचित सदस्यों की संख्या ×1000

(C) चुनाव की प्रक्रिया

  1. राष्ट्रपति के चुनाव में एकल हस्तांतरणीय मत प्रणाली (Single Transferable Vote) और प्रत्येक सदस्य के लिए आनुपातिक प्रतिनिधित्व (Proportional Representation) की व्यवस्था होती है।
  2. चुनाव गुप्त मतदान से संपन्न होता है।
  3. जीतने के लिए उम्मीदवार को 50% से अधिक मान्य मत + 1 वोट प्राप्त करना अनिवार्य होता है।

(D) चुनाव का संचालन

  • राष्ट्रपति चुनाव का संचालन भारत का चुनाव आयोग (Election Commission of India) करता है।
  • विवादों का अंतिम निपटारा सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India) करता है।

2. राष्ट्रपति बनने की पात्रता (Qualification for the President)

संविधान के अनुच्छेद 58 में राष्ट्रपति बनने के लिए पात्रता की शर्तें दी गई हैं –

  1. वह भारत का नागरिक होना चाहिए।
  2. उसकी आयु कम से कम 35 वर्ष होनी चाहिए।
  3. वह लोकसभा का सदस्य चुने जाने योग्य होना चाहिए।
  4. वह भारत सरकार या किसी राज्य सरकार के अधीन कोई लाभ का पद (Office of Profit) धारण नहीं कर सकता।

👉 नोट : राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार को कम से कम 50 प्रस्तावक (Proposers) और 50 अनुमोदक (Seconders) की आवश्यकता होती है।

3. राष्ट्रपति के कार्यकाल (Tenure of the President)

  1. राष्ट्रपति का कार्यकाल 5 वर्ष का होता है (अनुच्छेद 56)।
  2. यदि कार्यकाल समाप्त होने पर नया राष्ट्रपति निर्वाचित न हो, तो वर्तमान राष्ट्रपति तब तक पद पर बने रहते हैं जब तक नया राष्ट्रपति कार्यभार ग्रहण न कर ले।
  3. राष्ट्रपति दोबारा (Re-Election) भी चुने जा सकते हैं।
  • उदाहरण : डॉ. राजेन्द्र प्रसाद दो बार राष्ट्रपति बने थे।
  1. कार्यकाल समाप्त होने पर राष्ट्रपति अपने उत्तराधिकारी को पद की शपथ दिलाता है।

4. राष्ट्रपति पद की शपथ (Oath of the President)

अनुच्छेद 60 के अनुसार, राष्ट्रपति को पद ग्रहण करने से पूर्व भारत के मुख्य न्यायाधीश (Chief Justice of India) द्वारा शपथ दिलाई जाती है।

शपथ का भावार्थ –

  • संविधान की रक्षा और संरक्षण करना।
  • भारत की संप्रभुता और अखंडता को बनाए रखना।
  • जनता की सेवा करना।

5. राष्ट्रपति का वेतन और सुविधाएँ (Salary & Privileges)

  1. राष्ट्रपति को वर्तमान में प्रतिमाह लगभग ₹5,00,000 वेतन मिलता है।
  2. राष्ट्रपति को अपने कार्यकाल के दौरान मुफ्त सरकारी आवास (राष्ट्रपति भवन), वाहन, सुरक्षा और अन्य भत्ते मिलते हैं।
  3. सेवानिवृत्ति के बाद आजीवन पेंशन और कुछ विशेष सुविधाएँ भी दी जाती हैं।

6. राष्ट्रपति पद की रिक्ति (Vacancy of the Office)

राष्ट्रपति का पद निम्न परिस्थितियों में रिक्त हो सकता है –

  1. कार्यकाल पूरा होने पर (5 वर्ष बाद)।
  2. मृत्यु हो जाने पर।
  3. त्यागपत्र देने पर (लोकसभा अध्यक्ष को लिखित में)।
  4. महाभियोग (Impeachment) के द्वारा पद से हटाए जाने पर।

👉 ऐसी स्थिति में उपराष्ट्रपति को अस्थायी रूप से राष्ट्रपति का कार्यभार सौंपा जाता है।

7. राष्ट्रपति का महाभियोग (Impeachment of the President)

भारत के संविधान में राष्ट्रपति को पद से हटाने की एकमात्र प्रक्रिया महाभियोग है (अनुच्छेद 61)।

प्रक्रिया :

  1. महाभियोग का प्रस्ताव संसद के किसी भी सदन में लाया जा सकता है।
  2. प्रस्ताव लाने से 14 दिन पूर्व सूचना देनी होती है।
  3. प्रस्ताव को सदन के कुल सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत से पारित होना चाहिए।
  4. इसके बाद प्रस्ताव दूसरे सदन में जाएगा और वहाँ भी दो-तिहाई बहुमत से पारित होना आवश्यक है।
  5. यदि दोनों सदनों में प्रस्ताव पास हो जाता है तो राष्ट्रपति पद से हटाया जा सकता है।

👉 अब तक भारत के किसी भी राष्ट्रपति पर महाभियोग नहीं लगाया गया है।

8. उपराष्ट्रपति की भूमिका (Vice-President’s Role)

  • यदि राष्ट्रपति का पद रिक्त हो जाए तो उपराष्ट्रपति अस्थायी रूप से राष्ट्रपति का कार्यभार संभालते हैं।
  • 6 महीने के भीतर नए राष्ट्रपति का चुनाव कराना अनिवार्य है।

✍️ निष्कर्ष

भारत के राष्ट्रपति का चुनाव अप्रत्यक्ष लेकिन लोकतांत्रिक प्रक्रिया द्वारा होता है।

राष्ट्रपति बनने के लिए कठोर पात्रता शर्तें रखी गई हैं, जिससे केवल योग्य और अनुभवी व्यक्ति ही इस पद पर आ सके।

5 वर्ष का कार्यकाल, पुनर्निर्वाचन की संभावना, शपथ, वेतन-सुविधाएँ और महाभियोग की प्रक्रिया यह सुनिश्चित करती हैं कि राष्ट्रपति का पद संविधान का संरक्षक और राष्ट्र की एकता का प्रतीक बना रहे।

भारत के राष्ट्रपति – अब तक के सभी राष्ट्रपतियों की सूची और योगदान

26 जनवरी 1950 को भारत गणराज्य बना और उसी दिन डॉ. राजेन्द्र प्रसाद स्वतंत्र भारत के पहले राष्ट्रपति बने।

अब तक (2025 तक) भारत में 15 निर्वाचित राष्ट्रपति और कई कार्यवाहक (Acting) राष्ट्रपति रह चुके हैं।

आइए, एक-एक करके इनके कार्यकाल और योगदान पर नज़र डालते हैं।

1. डॉ. राजेन्द्र प्रसाद (1950–1962)

  • भारत के पहले राष्ट्रपति।
  • एकमात्र राष्ट्रपति जिन्हें दो बार चुना गया।
  • स्वतंत्रता संग्राम के महान नेता और संविधान सभा के अध्यक्ष।
  • उनके कार्यकाल में भारत का संविधान लागू हुआ और लोकतंत्र की मजबूत नींव पड़ी।
  • 👉 योगदान : भारतीय लोकतंत्र की आधारशिला स्थापित करना।

डॉ. राजेन्द्र प्रसाद (1950–1962)


2. डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन (1962–1967)

  • महान दार्शनिक, शिक्षक और विचारक।
  • उनके जन्मदिन (5 सितम्बर) को शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है।
  • उन्होंने भारतीय संस्कृति और शिक्षा को विश्व पटल पर पहचान दिलाई।
  • 👉 योगदान : शिक्षा और भारतीय दर्शन को बढ़ावा देना।

डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन (1962–1967)

3. डॉ. ज़ाकिर हुसैन (1967–1969)

  • पहले मुस्लिम राष्ट्रपति।
  • एक महान शिक्षा सुधारक और अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से जुड़े रहे।
  • 1969 में कार्यकाल के दौरान ही उनका निधन हुआ।
  • 👉 योगदान : शिक्षा और सामाजिक न्याय की दिशा में कार्य।

डॉ. ज़ाकिर हुसैन (1967–1969)

4. वराहगिरी वेंकटगिरि (V.V. Giri) (1969–1974)

  • पहले कार्यवाहक और बाद में निर्वाचित राष्ट्रपति।
  • स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और श्रमिक आंदोलनों से जुड़े।
  • उनके समय में इंदिरा गांधी की राजनीति चरम पर थी।
  • 👉 योगदान : श्रमिकों के अधिकारों के लिए संघर्ष।

वराहगिरी वेंकटगिरि (V.V. Giri) (1969–1974)

5. फखरुद्दीन अली अहमद (1974–1977)

  • पाँचवें राष्ट्रपति और दूसरे मुस्लिम राष्ट्रपति।
  • उनके कार्यकाल में आपातकाल (1975–77) लागू हुआ।
  • 👉 योगदान : संवैधानिक संकट के दौर में राष्ट्रपति की भूमिका।

फखरुद्दीन अली अहमद (1974–1977)

6. नीलम संजीव रेड्डी (1977–1982)

  • पहले ऐसे राष्ट्रपति जो निर्विरोध चुने गए
  • जनता पार्टी के समर्थन से राष्ट्रपति बने।
  • इमरजेंसी के बाद राजनीतिक अस्थिरता के दौर में कार्य किया।
  • 👉 योगदान : लोकतंत्र को पुनः पटरी पर लाने में सहयोग।

नीलम संजीव रेड्डी (1977–1982)

7. ज्ञानी ज़ैल सिंह (1982–1987)

  • पहले सिख राष्ट्रपति।
  • उनके कार्यकाल में ऑपरेशन ब्लू स्टार (1984) और इंदिरा गांधी की हत्या जैसी बड़ी घटनाएँ हुईं।
  • 👉 योगदान : कठिन परिस्थितियों में राष्ट्रपति पद की गरिमा बनाए रखना।

ज्ञानी ज़ैल सिंह (1982–1987)

8. आर. वेंकटरमण (1987–1992)

  • तमिलनाडु से पहले राष्ट्रपति।
  • उन्होंने पहले उपराष्ट्रपति और वित्त मंत्री के रूप में भी कार्य किया।
  • 👉 योगदान : आर्थिक सुधारों की शुरुआती नींव रखने में भूमिका।

आर. वेंकटरमण (1987–1992)

9. डॉ. शंकर दयाल शर्मा (1992–1997)

  • स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और विद्वान।
  • पूर्व में मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री और कई राज्यों के राज्यपाल रहे।
  • 👉 योगदान : संवैधानिक मूल्यों की रक्षा।

डॉ. शंकर दयाल शर्मा (1992–1997)

10. के.आर. नारायणन (1997–2002)

  • पहले दलित राष्ट्रपति।
  • “जनता के राष्ट्रपति” कहे जाते हैं।
  • उन्होंने राष्ट्रपति पद की गरिमा को आम नागरिकों तक पहुँचाया।
  • 👉 योगदान : सामाजिक समानता और समावेशी लोकतंत्र को बढ़ावा।

के.आर. नारायणन (1997–2002)

11. डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम (2002–2007)

  • “मिसाइल मैन ऑफ इंडिया”।
  • वैज्ञानिक, शिक्षक और देश के प्रिय राष्ट्रपति।
  • बच्चों और युवाओं के लिए आदर्श व्यक्तित्व।
  • 👉 योगदान : विज्ञान, प्रौद्योगिकी और शिक्षा में प्रेरणादायक नेतृत्व।

डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम (2002–2007)

12. प्रतिभा देवीसिंह पाटिल (2007–2012)

  • भारत की पहली महिला राष्ट्रपति।
  • महाराष्ट्र की राजनीति से जुड़ी रहीं।
  • 👉 योगदान : महिला सशक्तिकरण और सामाजिक विकास की दिशा में कार्य।

प्रतिभा देवीसिंह पाटिल (2007–2012)

13. प्रणब मुखर्जी (2012–2017)

  • कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और अनुभवी राजनीतिज्ञ।
  • वित्त मंत्री, विदेश मंत्री, रक्षा मंत्री के रूप में भी कार्य किया।
  • 👉 योगदान : संसदीय परंपराओं को मजबूत करना।

प्रणब मुखर्जी (2012–2017)

14. रामनाथ कोविंद (2017–2022)

  • भारत के दूसरे दलित राष्ट्रपति।
  • बिहार के राज्यपाल और राज्यसभा सदस्य रह चुके।
  • 👉 योगदान : सामाजिक न्याय और संविधान की मूल भावना की रक्षा।

रामनाथ कोविंद (2017–2022)

15. द्रौपदी मुर्मू (2022–वर्तमान)

  • भारत की वर्तमान राष्ट्रपति।
  • पहली आदिवासी महिला राष्ट्रपति।
  • ओडिशा से आने वालीं, पूर्व में झारखंड की राज्यपाल रहीं।
  • 👉 योगदान : आदिवासी समाज और महिलाओं के प्रतिनिधित्व का प्रतीक।

द्रौपदी मुर्मू (2022–वर्तमान)

कार्यवाहक (Acting) राष्ट्रपति

कई बार राष्ट्रपति के निधन या अनुपस्थिति में उपराष्ट्रपति ने कार्यवाहक राष्ट्रपति का दायित्व निभाया –

  1. डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन (1960)।
  2. वी.वी. गिरी (1969)।
  3. मोहम्मद हिदायतुल्लाह (1969)।
  4. बी.डी. जत्ती (1977)।

✍️ निष्कर्ष

भारत के अब तक के राष्ट्रपतियों ने अलग-अलग कालखंड में अपनी भूमिका निभाई है।

किसी ने संविधान की नींव रखी, किसी ने लोकतंत्र को आपातकाल से बचाया, तो किसी ने विज्ञान और शिक्षा में नई प्रेरणा दी।

आज द्रौपदी मुर्मू का राष्ट्रपति पद तक पहुँचना भारतीय लोकतंत्र की विविधता और समावेशिता का सबसे बड़ा उदाहरण है।

📜 महत्वपूर्ण घटनाएँ और राष्ट्रपति की भूमिका

भारत के राष्ट्रपति सामान्य परिस्थितियों में औपचारिक राष्ट्र प्रमुख की भूमिका निभाते हैं, लेकिन असाधारण परिस्थितियों में उनका निर्णय इतिहास को दिशा देता है। कई बार राष्ट्रपति ने ऐसे महत्वपूर्ण फैसले लिए हैं जिनका भारतीय राजनीति और लोकतंत्र पर गहरा प्रभाव पड़ा।

1. आपातकाल (Emergency) में राष्ट्रपति की भूमिका

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 352, 356 और 360 में आपातकाल की व्यवस्था है।

(A) 1975 का आपातकाल

  • तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की सिफारिश पर राष्ट्रपति फ़ख़रुद्दीन अली अहमद ने 25 जून 1975 को आपातकाल की घोषणा कर दी।
  • इसे भारतीय लोकतंत्र का सबसे अंधकारमय काल कहा जाता है क्योंकि मौलिक अधिकार स्थगित कर दिए गए थे।
  • इस घटना ने यह प्रश्न खड़ा कर दिया कि क्या राष्ट्रपति को केवल प्रधानमंत्री की सलाह माननी चाहिए या संवैधानिक विवेक का प्रयोग करना चाहिए।

(B) राष्ट्रपति शासन (Article 356)

  • कई बार राज्यों में राजनीतिक अस्थिरता आने पर राष्ट्रपति शासन लागू हुआ।
  • सर्वोच्च न्यायालय ने एस.आर. बोम्मई केस (1994) में स्पष्ट किया कि राष्ट्रपति शासन लगाना न्यायिक समीक्षा के अधीन होगा।

2. गठबंधन युग (Coalition Era) और राष्ट्रपति

1990 के दशक में भारत में गठबंधन सरकारों का दौर शुरू हुआ। इस समय राष्ट्रपति की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो गई।

  • राष्ट्रपति आर. वेंकटरमण और शंकर दयाल शर्मा ने अस्थिर राजनीतिक हालात में सरकार बनाने के लिए नेताओं को आमंत्रित किया।
  • के.आर. नारायणन ने 1997–2002 के कार्यकाल में संवैधानिक परंपराओं को मजबूत किया।
  • 1998 में उन्होंने प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को सरकार बनाने का न्योता दिया, लेकिन बहुमत साबित करने के लिए सख्त शर्तें भी रखीं।
  • गठबंधन काल में राष्ट्रपति एक तरह से निर्णायक मध्यस्थ (Constitutional Arbiter) बन गए।

3. ऐतिहासिक निर्णय और राष्ट्रपति की सक्रियता

(A) डॉ. राजेन्द्र प्रसाद (1950–1962)

  • पहले राष्ट्रपति के रूप में उन्होंने संसद में संविधान की मर्यादा और परंपराओं को स्थापित किया।
  • हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने में उनके सुझाव उल्लेखनीय रहे।

(B) डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम (2002–2007)

  • "जनता के राष्ट्रपति" कहलाए।
  • उन्होंने कई विधेयकों पर प्रश्न उठाए और Office of Profit Bill को पुनर्विचार के लिए वापस भेजा।
  • जनता से सीधे संवाद की परंपरा शुरू की।

(C) प्रणब मुखर्जी (2012–2017)

  • अनुभवी राजनेता होने के नाते उन्होंने कार्यपालिका और विधायिका के बीच संतुलन बनाए रखा।
  • उनके समय में राष्ट्रपति भवन जनता के लिए और अधिक खुला तथा लोकतांत्रिक बना।

4. राष्ट्रपति और न्यायिक भूमिका

  • राष्ट्रपति न्यायपालिका के जजों की नियुक्ति में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
  • वे मृत्युदंड की सजा को क्षमा, स्थगित या बदल सकते हैं (अनुच्छेद 72)।
  • कई मामलों में राष्ट्रपति ने दया याचिका पर ऐतिहासिक निर्णय दिए हैं, जैसे अफजल गुरु, कसाब आदि।

5. हाल के वर्ष और राष्ट्रपति की सक्रियता

  • रामनाथ कोविंद (2017–2022) ने अनुच्छेद 370 को समाप्त करने वाले विधेयक और तीन तलाक कानून पर हस्ताक्षर किए।
  • द्रौपदी मुर्मू (2022–वर्तमान) पहली आदिवासी महिला राष्ट्रपति बनीं, जो सामाजिक न्याय और महिला सशक्तिकरण का प्रतीक हैं।

✍️ संक्षेप

भारतीय राष्ट्रपति भले ही औपचारिक प्रमुख हों, लेकिन इतिहास में कई बार उन्होंने अपने संवैधानिक विवेक और अधिकारों का प्रयोग कर देश की राजनीति और लोकतंत्र को नया मोड़ दिया है।

  • आपातकाल ने राष्ट्रपति की निर्बलता को उजागर किया,
  • तो गठबंधन युग ने उनकी सक्रिय भूमिका को मजबूत किया।

⚖️ राष्ट्रपति पद से जुड़ी आलोचनाएँ और सुधार के सुझाव

भारतीय राष्ट्रपति को संविधान में "राष्ट्र का औपचारिक प्रमुख" माना गया है। यद्यपि यह पद बहुत गरिमापूर्ण है, लेकिन समय–समय पर राष्ट्रपति की भूमिका को लेकर कई आलोचनाएँ और सुधार की माँगें उठी हैं।

1. राष्ट्रपति पद से जुड़ी मुख्य आलोचनाएँ

(A) औपचारिक भूमिका तक सीमित

  • राष्ट्रपति केवल प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद की सलाह पर कार्य करते हैं।
  • इस कारण उन्हें “रबर स्टाम्प” तक कहा गया है।

(B) स्वतंत्र निर्णय की कमी

  • आपातकाल (1975) के दौरान स्पष्ट हुआ कि राष्ट्रपति के पास स्वतंत्र रूप से निर्णय लेने का सीमित अधिकार है।
  • प्रधानमंत्री की सलाह ही अंतिम मानी जाती है।

(C) चुनाव प्रक्रिया पर सवाल

  • राष्ट्रपति का चुनाव आम जनता नहीं करती, बल्कि निर्वाचक मंडल (Electoral College) करता है।
  • इसलिए इसे अप्रत्यक्ष लोकतंत्र कहा जाता है।
  • कई बार चुनाव में राजनीतिक दलों की ताकत और गठजोड़ निर्णायक हो जाते हैं।

(D) सक्रियता का अभाव

  • अधिकांश राष्ट्रपति सक्रिय हस्तक्षेप नहीं करते।
  • केवल कुछ राष्ट्रपति (जैसे के.आर. नारायणन, अब्दुल कलाम) ही जनता से संवाद और नीतिगत प्रश्न उठाने में आगे रहे।

(E) दया याचिकाओं पर देरी

  • राष्ट्रपति के पास दया याचिकाओं का अंतिम अधिकार है, लेकिन कई मामलों में वर्षों तक निर्णय लंबित रहता है।

2. सुधार के सुझाव

(A) राष्ट्रपति को अधिक संवैधानिक विवेक दिया जाए

  • प्रधानमंत्री की सलाह पर चलने के बजाय राष्ट्रपति को संवैधानिक मुद्दों पर स्वतंत्र निर्णय का अधिकार होना चाहिए।
  • विशेषकर आपातकाल या राष्ट्रपति शासन की स्थिति में।

(B) चुनाव प्रक्रिया में बदलाव

  • राष्ट्रपति को जनता द्वारा सीधे चुनने का सुझाव कई बार दिया गया है।
  • इससे पद की वैधता और लोकतांत्रिक गरिमा बढ़ेगी।

(C) राष्ट्रपति की शक्तियों का पुनर्परिभाषण

  • संसद और न्यायपालिका के बीच संतुलन बनाए रखने के लिए राष्ट्रपति की भूमिका को और स्पष्ट किया जाए।
  • उन्हें संविधान के संरक्षक के रूप में अधिक अधिकार मिलें।

(D) दया याचिका पर समयसीमा

  • दया याचिका पर निर्णय के लिए निर्धारित समय सीमा तय की जानी चाहिए।

(E) जनसंपर्क और पारदर्शिता

  • राष्ट्रपति को जनता से सीधा संवाद बनाए रखना चाहिए।
  • निर्णयों और आदेशों में पारदर्शिता होनी चाहिए।

3. विद्वानों और आयोगों की राय

  • सर्कारिया आयोग (1988) ने सुझाव दिया था कि राष्ट्रपति को संविधान और संघीय ढांचे की रक्षा में अधिक सक्रिय होना चाहिए।
  • राष्ट्रीय आयोग समीक्षा (2002) ने कहा कि राष्ट्रपति को मंत्रिपरिषद की सलाह माननी चाहिए, लेकिन विवेकपूर्ण भूमिका निभाने की स्वतंत्रता भी होनी चाहिए।

✍️ संक्षेप

राष्ट्रपति पद भारतीय लोकतंत्र का सर्वोच्च संवैधानिक पद है, लेकिन इसकी शक्ति सीमित और औपचारिक रही है।

  • आलोचनाएँ मुख्यतः चुनाव प्रक्रिया, निर्णय लेने की स्वतंत्रता और जनता से दूरी को लेकर होती हैं।
  • सुधार के रूप में राष्ट्रपति को संविधान का सक्रिय संरक्षक बनाना, चुनाव प्रक्रिया को लोकतांत्रिक करना और निर्णयों में पारदर्शिता लाना आवश्यक है।

निष्कर्ष और भारत के राष्ट्रपति का भविष्य

1. निष्कर्ष

भारत का राष्ट्रपति संविधान और लोकतंत्र का संरक्षक है।

  • यह पद केवल औपचारिक नहीं बल्कि भारतीय एकता, अखंडता और संप्रभुता का प्रतीक है।
  • यद्यपि राष्ट्रपति की शक्तियाँ सीमित हैं, फिर भी महत्वपूर्ण परिस्थितियों में उनका विवेक और निर्णय देश की राजनीति को नई दिशा दे सकता है।
  • डॉ. राजेन्द्र प्रसाद से लेकर द्रौपदी मुर्मू तक, राष्ट्रपति पद ने भारत की विविधता, लोकतंत्र और प्रगतिशीलता को प्रतिबिंबित किया है।

2. राष्ट्रपति पद का महत्व

  1. राष्ट्रपति भारत की सैन्य शक्तियों के सर्वोच्च सेनापति हैं।
  2. राष्ट्रपति ही संसद को बुलाते, स्थगित करते और विधेयकों को अनुमोदन देते हैं।
  3. आपातकालीन परिस्थितियों में राष्ट्रपति की भूमिका निर्णायक हो जाती है।
  4. राष्ट्रपति भारत का अंतरराष्ट्रीय मंच पर सम्मानित प्रतिनिधि होते हैं।

3. चुनौतियाँ

  • राष्ट्रपति को अक्सर “रबर स्टाम्प” कहा जाता है क्योंकि वे मंत्रिपरिषद की सलाह पर ही कार्य करते हैं।
  • चुनाव प्रक्रिया आम जनता से सीधे जुड़ी नहीं है।
  • आपातकाल जैसी घटनाओं ने राष्ट्रपति की कमजोरियों को उजागर किया।

4. सुधार की दिशा

  • राष्ट्रपति को संवैधानिक विवेक का प्रयोग करने का अधिक अधिकार दिया जाना चाहिए।
  • चुनाव प्रक्रिया को अधिक लोकतांत्रिक बनाया जा सकता है।
  • दया याचिकाओं और आपातकालीन शक्तियों पर स्पष्ट दिशानिर्देश होने चाहिए।
  • राष्ट्रपति को जनसंवाद और पारदर्शिता बढ़ाने पर ध्यान देना चाहिए।

5. भविष्य की भूमिका

  • आने वाले समय में राष्ट्रपति की भूमिका केवल औपचारिक नहीं रहेगी, बल्कि वे लोकतांत्रिक मूल्यों के रक्षक बनेंगे।
  • डिजिटल युग में राष्ट्रपति जनता से सीधे संवाद कर सकते हैं।
  • सामाजिक न्याय, महिला सशक्तिकरण और वंचित समुदायों की आवाज़ को राष्ट्र स्तर पर सामने लाने में राष्ट्रपति का योगदान और बढ़ेगा।
  • राष्ट्रपति भारत के लोकतंत्र की स्थिरता और विश्वसनीयता के प्रतीक बने रहेंगे।

✍️ अंतिम संदेश

भारत का राष्ट्रपति पद हमें यह याद दिलाता है कि लोकतंत्र केवल सत्ता का हस्तांतरण नहीं बल्कि जनता के विश्वास और संविधान की मर्यादा की रक्षा है।

  • जब राष्ट्रपति अपने कर्तव्यों को निष्ठा और विवेक से निभाते हैं, तो भारतीय लोकतंत्र और अधिक मजबूत होता है।
  • राष्ट्रपति भवन से निकलने वाला हर आदेश केवल सरकार की इच्छा नहीं बल्कि पूरे भारतीय राष्ट्र की गरिमा का प्रतीक होना चाहिए।

🌟 निष्कर्षतः

भारत के राष्ट्रपति केवल राष्ट्र प्रमुख ही नहीं, बल्कि संविधान के प्रहरी और लोकतंत्र के जीवंत प्रतीक हैं। भविष्य में यह पद और भी अधिक जनभागीदारी, पारदर्शिता और संवैधानिक सक्रियता का माध्यम बनेगा।