
OnlineFreeGK.in पर आपका स्वागत है। इस लेख में हम भारतीय संविधान के भाग 08 और विशेषकर संघ शासित प्रदेशों से संबंधित अनुच्छेद 239 से 242 तक की विस्तारपूर्वक चर्चा करेंगे। संघ शासित प्रदेशों की प्रशासनिक व्यवस्था, अधिकार, तथा इनके महत्व को समझना भारत के संघीय ढांचे को जानने के लिए बेहद आवश्यक है।
भारतीय संविधान के भाग 8 में संघ शासित प्रदेशों (Union Territories) से संबंधित प्रावधान हैं। ये क्षेत्र केंद्र सरकार के नियंत्रण में होते हैं और इनके प्रशासन के लिए विशेष व्यवस्थाएं संविधान में की गई हैं।
संघ शासित प्रदेश वे क्षेत्र होते हैं जिन्हें भारतीय संघ के तहत सीधे केंद्र सरकार द्वारा नियंत्रित किया जाता है, राज्य सरकार द्वारा नहीं। ये क्षेत्र जनसंख्या, भौगोलिक स्थिति या विशेष प्रशासनिक जरूरतों के कारण ऐसे बनाए गए हैं।
मुख्य बातें:
(1) संसद , विधि द्वारा [4][पांडिचेरी संघ राज्यक्षेत्र के लिए ,-
(क) उस संघ राज्यक्षेत्र के विधान-मंडल के रूप में कार्य करने के लिए निर्वाचित या भागतः
नामनिर्देशित और भागतः निर्वाचित निकाय का, या
(ख) मंत्रि-परिषद् का,
या दोनों का सॄजन कर सकेगी, जिनमें से प्रत्येक का गठन, शक्तियां और कॄत्य वे होंगे जो उस विधि में विनिर्दिष्ट किए जाएं ।
(2) खंड (1) में निर्दिष्ट विधि को, अनुच्छेद 368 के प्रयोजनों के लिए इस संविधान का संशोधन इस बात के होते हुए भी नहीं समझा जाएगा कि उसमें कोई ऐसा उपबंध अंतर्विष्ट है जो इस संविधान का संशोधन करता है या संशोधन करने का प्रभाव रखता है ।
(1) संविधान (उनहत्तरवां संशोधन) अधिनियम, 1991 के प्रारंभ से दिल्ली संघ राज्यक्षेत्र को दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी राज्यक्षेत्र (जिसे इस भाग में इसके पश्चात् राष्ट्रीय राजधानी राज्यक्षेत्र कहा गया है) कहा जाएगा और अनुच्छेद 239 के अधीन नियुक्त उसके प्रशासक का पदाभिधान उप-राज्यपाल होगा ।
(2)(क) राष्ट्रीय राजधानी राज्यक्षेत्र के लिए एक विधान सभा होगी और ऐसी विधान सभा में स्थान राष्ट्रीय राजधानी राज्यक्षेत्र में प्रादेशिक निर्वाचन-क्षेत्रों में से प्रत्यक्ष निर्वाचन द्वारा चुने हुए सदस्यों से भरे जाएंगे ।
(ख) विधान सभा में स्थानों की कुल संख्या, अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षित स्थानों की संख्या, राष्ट्रीय राजधानी राज्यक्षेत्र के प्रादेशिक निर्वाचन-क्षेत्रों में विभाजन (जिसके अंतर्गत ऐसे विभाजन का आधार है) तथा विधान सभा के कार्यकरण से संबंधित सभी अन्य विषयों का विनियमन, संसद द्वारा बनाई गई विधि द्वारा किया जाएगा ।
(ग) अनुच्छेद 324 से अनुच्छेद 327 और अनुच्छेद 329 के उपबंध राष्ट्रीय राजधानी राज्यक्षेत्र, राष्ट्रीय राजधानी राज्यक्षेत्र की विधान सभा और उसके सदस्यों के संबंध में वैसे ही लागू होंगे जैसे वे, किसी राज्य, किसी राज्य की विधान सभा और उसके सदस्यों के संबंध में लागू होते हैं तथा अनुच्छेद 326 और अनुच्छेद 329 में “समुचित विधानमंडल” के प्रति निर्देश के बारे में यह समझा जाएगा कि वह संसद के प्रति निर्देश है ।
(3)(क) इस संविधान के उपबंधों के अधीन रहते हुए , विधान सभा को राज्य सूची की प्रविष्टि1, प्रविष्टि2 और प्रविष्टि18 से तथा उस सूची की प्रविष्टि64, प्रविष्टि65 और प्रविष्टि66 से, जहां तक उनका संबंध उक्त प्रविष्टि1, प्रविष्टि2 और प्रविष्टि18 से है, संबंधित विषयों से भिन्न राज्य सूची में या समवर्ती सूची में प्रगणित किसी भी विषय के संबंध में, जहां तक ऐसा कोई विषय संघ राज्यक्षेत्रों को लागू है, संपूर्ण राष्ट्रीय राजधानी राज्यक्षेत्र या उसके किसी भाग के लिए विधि बनाने की शक्ति होगी ।
(ख) उपखंड (क) की किसी बात से संघ राज्यक्षेत्र या उसके किसी भाग के लिए किसी भी विषय के संबंध में इस संविधान के अधीन विधि बनाने की संसद की शक्ति का अल्पीकरण नहीं होगा ।
(ग) यदि विधान सभा द्वारा किसी विषय के संबंध में बनाई गई विधि का कोई उपबंध संसद द्वारा उस विषय के संबंध में बनाई गई विधि के, चाहे वह विधान सभा द्वारा बनाई गई विधि से पहले या उसके बाद में पारित की गई हो, या किसी पूर्वतर विधि के,जो विधान सभा द्वारा बनाई गई विधि से भिन्न है, किसी उपबंध के विरुद्ध है तो, दोनों दशाओं में, यथास्थिति, संसद द्वारा बनाई गई विधि, या ऐसी पूर्वतर विधि अभिभावी होगी और विधान सभा द्वारा बनाई गई विधि उस विरोध की मात्रा तक शून्य होगी :
परंतु यदि विधान सभा द्वारा बनाई गई किसी ऐसी विधि को राष्ट्रपति के विचार के लिए आरक्षित रखा गया है और उस पर उसकी अनुमति मिल गई है तो ऐसी विधि राष्ट्रीय राजधानी राज्यक्षेत्र में अभिभावी होगी :
परंतु यह और कि इस उपखंड की कोई बात संसद को उसी विषय के संबंध में कोई विधि, जिसके अंतर्गत ऐसी विधि है जो विधान सभा द्वारा इस प्रकार बनाई गई विधि का परिवर्धन, संशोधन, परिवर्तन या निरसन करती है, किसी भी समय अधिनियमित करने से निवारित नहीं करेगी ।
(4) जिन बातों में किसी विधि द्वारा या उसके अधीन उप-राज्यपाल से यह अपेक्षित है कि वह अपने विवेकानुसार कार्य करे उन बातों को छोड़कर, उप-राज्यपाल की, उन विषयों के संबंध में, जिनकी बाबत विधान सभा को विधि बनाने की शक्ति है, अपने कॄत्यों का प्रयोग करने में सहायता और सलाह देने के लिए एक मंत्रि-परिषद् होगी जो विधान सभा की कुल सदस्य संख्या के दस प्रतिशत से अनधिक सदस्यों से मिलकर बनेगी,जिसका प्रधान, मुख्यमंत्री होगा परंतु उप-राज्यपाल और उसके मंत्रियों के बीच किसी विषय पर मतभेद की दशा में, उप-राज्यपाल उसे राष्ट्रपति को विनिश्चय के लिए निर्देशित करेगा और राष्ट्रपति द्वारा उस पर किए गए विनिश्चय के अनुसार कार्य करेगा तथा ऐसा विनिश्चय होने तक उप-राज्यपाल किसी ऐसे मामले में, जहां वह विषय , उसकी राय में, इतना आवश्यक है जिसके कारण तुरंत कार्रवाई करना उसके लिए आवश्यक है वहां, उस विषय में ऐसी कार्रवाई करने या ऐसा निदेश देने के लिए, जो वह आवश्यक समझे, सक्षम होगा ।
(5) मुख्यमंत्री की नियुक्ति राष्ट्रपति करेगा और अन्य मंत्रियों की नियुक्ति राष्ट्रपति , मुख्यमंत्री की सलाह पर करेगा तथा मंत्री, राष्ट्रपति के प्रसादपर्यन्त अपने पद धारण करेंगे ।
(6) मंत्रि-परिषद् विधान सभा के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी होगी ।
(7)(क)]संसद पूर्वगामी खंडों को प्रभावी करने के लिए, या उनमें अंतर्विष्ट उपबंधों की अनुपूर्ति के लिए और उनके आनुषंगिक या पारिणामिक सभी विषयों के लिए , विधि द्वारा, उपबंध कर सकेगी ;
(ख) उपखंड (क) में निर्दिष्ट विधि को, अनुच्छेद 368 के प्रयोजनों के लिए इस संविधान का संशोधन इस बात के होते हुए भी नहीं समझा जाएगा कि उसमें कोई ऐसा उपबंध अंतर्विष्ट है जो इस संविधान का संशोधन करता है या संशोधन करने का प्रभाव रखता है ।
यदि राष्ट्रपति का, उप-राज्यपाल से प्रतिवेदन मिलने पर या अन्यथा, यह समाधान हो जाता है कि,--
(2) राष्ट्रपति के अनुदेशों के अनुसरण में इस अनुच्छेद के अधीन प्रख्यापित अध्यादेश संघ राज्यक्षेत्र के विधानमंडल का ऐसा अधिनियम समझा जाएगा जो अनुच्छेद 239क के खंड (1) में निर्दिष्ट विधि में, उस निमित्त अंतर्विष्ट उपबंधों का अनुपालन करने के पश्चात् सम्यक् रूप से अधिनियमित किया गया है, किंतु प्रत्येक ऐसा अध्यादेश--
अनुच्छेद 240 राष्ट्रपति को संघ शासित प्रदेशों में विशेष प्रशासनिक अधिकार प्रदान करता है। इसमें राष्ट्रपति को अधिकार दिया गया है कि वे संघ शासित प्रदेशों में कोई भी आवश्यक आदेश, निर्देश या नियम जारी कर सकते हैं।
(1) राष्ट्रपति --
संघ राज्यक्षेत्र की शांति, प्रगति औरसुशासन के लिए विनियम बना सकेगा :
अनुच्छेद 242 के अनुसार, केंद्र सरकार यह निर्धारित कर सकती है कि संघ शासित प्रदेश के लिए किस राज्य के उच्च न्यायालय का क्षेत्राधिकार होगा।
संघ शासित प्रदेशों का प्रशासन राज्य सरकारों से भिन्न होता है। क्योंकि यहां विधायिका नहीं होती या सीमित होती है, इसलिए प्रशासन केंद्र द्वारा नियंत्रित होता है।
संघ शासित प्रदेशविशेषताएँविधान सभादिल्लीराष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र, सीमित स्वायत्तता, विधानसभा मौजूदहांपुडुचेरीदक्षिण भारत में, सीमित विधानसभाहांलक्षद्वीपसमुद्री द्वीप समूह, केंद्र शासितनहींचंडीगढ़हरियाणा और पंजाब की संयुक्त राजधानीनहींदादर और नगर हवेली तथा दमण और दीवएकीकृत संघ शासित प्रदेश, सीमित प्रशासननहींजम्मू और कश्मीरविशेष प्रशासनिक व्यवस्था (हाल के संवैधानिक बदलावों के बाद)सीमित/स्थानीय
संघ शासित प्रदेशों के प्रशासन में भाग 8 की भूमिका संविधान के अनुसार केंद्रीय शासन और स्थानीय प्रशासन के बीच संतुलन बनाना है। यह भाग केंद्र को आवश्यक नियंत्रण और अधिकार देता है।
कुछ संघ शासित प्रदेशों में समय के साथ विधानसभा और स्थानीय स्वशासन की मांग बढ़ी है, जिससे केंद्र सरकार ने भी उन्हें सीमित स्वायत्तता दी है, जैसे दिल्ली और पुडुचेरी में।
भारतीय संविधान का भाग 8 संघ शासित प्रदेशों के प्रशासनिक ढांचे और केंद्र सरकार के अधिकारों को निर्धारित करता है। अनुच्छेद 239 से 242 तक के प्रावधान संघ शासित प्रदेशों के सुचारू प्रशासन, न्यायिक व्यवस्था और केंद्र-प्रदेश संबंधों को नियंत्रित करते हैं। यह भाग भारत की संघीयता की अनूठी विशेषता को दर्शाता है और केंद्र-राज्य संबंधों में संतुलन बनाए रखने में सहायक है।
संघ शासित प्रदेश वे क्षेत्र हैं जिन्हें सीधे केंद्र सरकार नियंत्रित करती है, जहां राज्य सरकार नहीं होती या सीमित होती है।
यह अनुच्छेद संघ शासित प्रदेशों के प्रशासन के लिए राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त अधिकारी की व्यवस्था करता है।
नहीं, केवल कुछ जैसे दिल्ली और पुडुचेरी में विधानसभा होती है, बाकी में नहीं।
यह राष्ट्रपति को संघ शासित प्रदेशों में विशेष प्रशासनिक आदेश जारी करने का अधिकार देता है।
अनुच्छेद 241 और 242 के तहत न्यायिक व्यवस्था और उच्च न्यायालय का क्षेत्राधिकार निर्धारित किया जाता है।: