
भारत के स्वतंत्रता संग्राम में छत्तीसगढ़ की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रही है। यहां के जनजातीय समाज, कृषक, मजदूर और स्वतंत्रता सेनानियों ने अंग्रेजों के खिलाफ कई आंदोलन चलाए। इनमें 1857 का विद्रोह, वीर नारायण सिंह का बलिदान, जंगल सत्याग्रह, धमार आंदोलन, कृषक विद्रोह, असहयोग आंदोलन और भारत छोड़ो आंदोलन शामिल हैं।
छत्तीसगढ़ का क्षेत्र ऐतिहासिक रूप से जंगलों और जनजातीय समाज का घर रहा है। ब्रिटिश राज के दौरान यहां के लोग सामंती जमींदारी और करों के खिलाफ हमेशा विरोध करते रहे। स्वतंत्रता संग्राम के हर चरण में छत्तीसगढ़ ने सक्रिय योगदान दिया।
1857 का विद्रोह भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के रूप में जाना जाता है। छत्तीसगढ़ में इसका प्रभाव देखा गया। वीर नारायण सिंह को छत्तीसगढ़ का प्रथम स्वतंत्रता सेनानी कहा जाता है। उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष करते हुए जनता को संगठित किया। दिसंबर 1857 में अंग्रेजों ने उन्हें फांसी दी।
छत्तीसगढ़ के जनजातीय समाज ने अंग्रेजों और सामंती सत्ता के खिलाफ कई विद्रोह किए।
बस्तर के हल्बा, मुरिया और अन्य आदिवासियों ने अंग्रेजों के वन कानूनों और करों के खिलाफ संघर्ष किया। यह विद्रोह 1910 में फूटा।
बिलासपुर जिले में झलियामारी आंदोलन हुआ। इसका कारण था – जबरन कर वसूली और शोषण। यह छत्तीसगढ़ का प्रमुख कृषक आंदोलन था।
गांधी जी के असहयोग आंदोलन के प्रभाव से जनता ने जंगल पर अपने हक जताए और अंग्रेजों के वन कानूनों का विरोध किया। यह आंदोलन 1922 और 1930 में हुआ।
1920 में गांधी जी द्वारा असहयोग आंदोलन शुरू हुआ। छत्तीसगढ़ में इसे पंडित सुन्दर लाल शर्मा, ठाकुर प्यारेलाल सिंह, ईश्वर सिंगदेव और नारायण राव मेघावाले जैसे नेताओं ने आगे बढ़ाया। रायपुर, बिलासपुर, दुर्ग और महासमुंद में जनसभाएं हुईं।
8 अगस्त 1942 को गांधी जी ने "अंग्रेजो भारत छोड़ो" का नारा दिया। छत्तीसगढ़ में यह आंदोलन तेजी से फैला। रायपुर, बिलासपुर और दुर्ग में रेल तोड़फोड़ और सरकारी भवनों पर हमले हुए। हजारों स्वतंत्रता सेनानियों को जेल भेजा गया।
दुर्ग और भिलाई क्षेत्र में मजदूर आंदोलन हुए। धान आंदोलन / धमार आंदोलन – किसानों ने लगान माफी की मांग की। 1939–40 में कई जगहों पर 'नहीं देंगे कर' अभियान चला।
15 अगस्त 1947 को स्वतंत्रता मिली। छत्तीसगढ़ के बलिदानी सेनानियों को सम्मान मिला। स्वतंत्र भारत में यह क्षेत्र आदिवासी अधिकार, वनाधिकार और किसान आंदोलन का केंद्र बना रहा।

वीर नारायण सिंह सोनाखान के जमींदार थे। अंग्रेजों के अत्याचार और करों के विरोध में उन्होंने 1857 में स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय भाग लिया। उन्होंने रायपुर और आसपास के क्षेत्रों में जनता को संगठित किया। अंग्रेजों ने उन्हें पकड़कर दिसंबर 1857 में फांसी दी। उनके बलिदान ने छत्तीसगढ़ के क्रांतिकारी आंदोलन को प्रेरणा दी।
बस्तर के आदिवासी अपने जंगल और भूमि के अधिकारों के लिए अंग्रेजों के खिलाफ खड़े हुए। परलकोट विद्रोह में हल्बा, मुरिया और गोंड जनजातियों ने सामूहिक विद्रोह किया। अंग्रेजों ने हिंसक दमन किया लेकिन यह आंदोलन आदिवासियों के हक की लड़ाई का प्रतीक बना।
बिलासपुर जिले के किसानों ने जबरन कर वसूली और जमीन के शोषण के खिलाफ झलियामारी आंदोलन किया। इस आंदोलन में हजारों किसानों ने भाग लिया। आंदोलन का मुख्य उद्देश्य – किसानों को करमुक्त और न्यायपूर्ण जमीन अधिकार दिलाना था।
गांधी जी के असहयोग आंदोलन और वनाधिकार कानून के विरोध में छत्तीसगढ़ में जंगल सत्याग्रह हुआ। इसमें आदिवासी और किसान जंगलों पर अपने हक के लिए आगे आए। यह आंदोलन रायपुर, बिलासपुर और बस्तर में प्रमुख था।
1930–40 के दौरान किसानों ने लगान और करों के खिलाफ धमार आंदोलन किया। दुर्ग और भिलाई क्षेत्र में किसानों ने जमकर विरोध किया। यह आंदोलन स्वतंत्रता संग्राम में क्रांतिकारी स्वरूप वाला था।
भिलाई स्टील प्लांट और दुर्ग क्षेत्र के मजदूरों ने अपने अधिकारों के लिए आंदोलन किया। काम के समय, मजदूरी और सुरक्षा के लिए संघर्ष हुआ। मजदूर आंदोलन ने सामाजिक न्याय और मजदूर अधिकारों को मजबूत किया।
8 अगस्त 1942 को गांधी जी ने "अंग्रेजो भारत छोड़ो" का नारा दिया। रायपुर, बिलासपुर और दुर्ग में हजारों स्वतंत्रता सेनानियों ने आंदोलन में भाग लिया। रेलवे स्टेशन, सरकारी कार्यालय और डाकघरों पर आंदोलन हुआ। अंग्रेजों ने कठोर दमन किया, हजारों सेनानियों को जेल भेजा गया।
वर्ष आंदोलन/घटना स्थान मुख्यनेता/भागीदार
1857 वीर नारायण सिंह का विद्रोह सोनाखान, रायपुर वीर नारायण सिंह
1910 परलकोट विद्रोह बस्तर हल्बा, मुरिया जनजाति
1913-14 झलियामारी आंदोलन बिलासपुर किसान समूह
1922,1930 जंगल सत्याग्रह रायपुर, बिलासपुर, बस्तर आदिवासी, किसान
1939-40 धान/धमार आंदोलन दुर्ग, भिलाई कृषक
1942 भारत छोड़ो आंदोलन रायपुर, बिलासपुर, दुर्ग सभी स्वतंत्रता सेनानी
छत्तीसगढ़ का क्रांतिकारी आंदोलन स्वतंत्रता संग्राम का अहम हिस्सा रहा। वीर नारायण सिंह से लेकर भारत छोड़ो आंदोलन तक, किसानों, मजदूरों और आदिवासियों ने अपने अधिकारों और स्वतंत्रता के लिए संघर्ष किया। इन आंदोलनोंने ना केवल छत्तीसगढ़ बल्कि पूरे भारत में स्वतंत्रता की ज्वाला को प्रज्वलित किया।