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छत्तीसगढ़ के बाँध और सिंचाई परियोजनाएँ | नदियाँ, जल संसाधन, परियोजना सूची

11 Sep 2025 | Ful Verma | 235 views

छत्तीसगढ़ के बाँध और सिंचाई परियोजनाएँ | नदियाँ, जल संसाधन, परियोजना सूची एवं 50 महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

🌊 छत्तीसगढ़ की बाँध परियोजना और एनीकेट

Chhattisgarh Dam Project

प्रस्तावना

छत्तीसगढ़ भारत का धान का कटोरा (Rice Bowl of India) कहलाता है। यहाँ की अधिकांश जनसंख्या कृषि पर निर्भर है और मुख्य फसल धान है, जिसके लिए पर्याप्त पानी की आवश्यकता होती है। प्रदेश का बड़ा भू-भाग वर्षा आधारित कृषि पर निर्भर है, लेकिन बरसात की असमानता और सूखा–बाढ़ की समस्या किसानों के लिए चुनौती रही है। ऐसे में बाँध परियोजनाओं और एनीकेट (Weirs) ने छत्तीसगढ़ की अर्थव्यवस्था और कृषि उत्पादन को सुरक्षित करने में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

राज्य गठन (2000) के बाद छत्तीसगढ़ ने जल संसाधन क्षेत्र में तेजी से विकास किया है। मार्च 2013 तक राज्य में 8 वृहद, 33 मध्यम और 2390 लघु परियोजनाएँ पूर्ण हो चुकी थीं। इसके अतिरिक्त 3 वृहद, 6 मध्यम और 430 लघु सिंचाई परियोजनाएँ निर्माणाधीन थीं।

👉 वर्ष 2000–01 में कुल सिंचाई क्षेत्र 13.40 लाख हेक्टेयर (23.15%) था, जो 2013 तक बढ़कर 18.78 लाख हेक्टेयर हो गया।

👉 आज प्रदेश की 60% सिंचाई नहरों के माध्यम से की जाती है।

👉 जल संसाधनों के सुनियोजित विकास हेतु राज्य सरकार ने जल संसाधन विकास नीति 2012 बनाई।

छत्तीसगढ़ में सिंचाई और बाँधों का ऐतिहासिक विकास

1901 – भारतीय सिंचाई आयोग की सिफारिश

ब्रिटिश शासन के दौरान 1901 में भारतीय सिंचाई आयोग ने इस क्षेत्र को बार–बार पड़ने वाले अकाल से बचाने के लिए विस्तृत प्रतिवेदन प्रस्तुत किया। आयोग की सिफारिश पर रायपुर वृत्त द्वारा 5 बड़े तालाबों का निर्माण कराया गया, जिनका उद्देश्य ग्रामीणों को पानी उपलब्ध कराना और सूखे से बचाव करना था।

1910 – तांदुला नहर का निर्माण प्रारंभ

छत्तीसगढ़ की पहली प्रमुख सिंचाई परियोजनाओं में से एक तांदुला नहर है, जिसका निर्माण 1910 में प्रारंभ हुआ और 1920 में पूरा हुआ। इससे बालोद और आसपास के क्षेत्रों में खेती को नया जीवन मिला।

1923 – मदमसिल्ली (मुरूमसिल्ली) जलाशय

1914 से 1923 के बीच निर्मित मदमसिल्ली बाँध (धमतरी) छत्तीसगढ़ का पहला सायफन बाँध है। इसे सिलयारी नदी (महानदी की सहायक) पर बनाया गया। यह उस समय की अद्वितीय इंजीनियरिंग उपलब्धि थी।

1924 – मनियारी परियोजना

मुंगेली जिले की मनियारी नदी पर निर्मित मनियारी बाँध का निर्माण 1924 में प्रारंभ हुआ और 1930 में पूरा हुआ। इसका मुख्य उद्देश्य सिंचाई और पेयजल आपूर्ति था।

1931 – खारंग टैंक

बिलासपुर जिले में खारंग बाँध 1931 में तैयार हुआ, जिसने आगे चलकर खूटाघाट परियोजना का आधार तैयार किया।

रिवर लिंकिंग परियोजना (River Linking Project)

छत्तीसगढ़ में जल संसाधनों के बेहतर उपयोग और अतिरिक्त सिंचाई क्षमता बढ़ाने के लिए नदियों को आपस में जोड़ने की योजना बनाई गई है। इस योजना के तहत प्रमुख परियोजनाएँ हैं –

  • अहिरन–खूंटाघाट लिंक परियोजना
  • हसदेव–केवई लिंक परियोजना

इनसे न केवल अतिरिक्त सिंचाई सुविधा उपलब्ध कराई जाएगी बल्कि सूखा प्रभावित क्षेत्रों को भी राहत मिलेगी।

महानदी बेसिन की प्रमुख परियोजनाएँ

1. गंगरेल बाँध (रविशंकर सागर जलाशय) – धमतरी

  • निर्माण वर्ष: 1979
  • नदी: महानदी
  • स्थान: धमतरी
  • विशेषताएँ:
  • छत्तीसगढ़ का सबसे लंबा बाँध।
  • 14 गेट।
  • पेयजल, सिंचाई और जलविद्युत उत्पादन का प्रमुख स्रोत।
  • धमतरी, रायपुर और दुर्ग–भिलाई के लिए जीवनरेखा।

2. मदमसिल्ली जलाशय – धमतरी

  • नदी: सिल्लआरी (महानदी की सहायक)
  • निर्माण अवधि: 1914–1923
  • छत्तीसगढ़ का पहला सायफन बाँध
  • रायपुर से लगभग 95 किमी दूर।
  • तकनीकी दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण।

3. रुद्री पिक–अप वियर – धमतरी

  • निर्माण वर्ष: 1915 (ब्रिटिश शासन काल)
  • विशेषताएँ:
  • पत्थरों और चूने से निर्मित मजबूत संरचना।
  • धमतरी, रायपुर, बालोद और बलौदाबाजार की जीवनरेखा।
  • 116 किमी लंबी मुख्य नहर से 6.6 लाख एकड़ खेतों की सिंचाई।
  • पेयजल और निस्तारी सुविधा भी उपलब्ध कराता है।

4. दुधावा जलाशय – कांकेर

  • निर्माण अवधि: 1953–1963
  • नदी: महानदी
  • स्थान: दुधावा गाँव, कांकेर
  • ऊँचाई: 24.53 मीटर
  • लंबाई: 2906 मीटर
  • सिहावा पर्वत से 21 किमी और कांकेर से 30 किमी दूरी पर।

5. सोंढूर परियोजना – धमतरी

  • वर्ष: 1989
  • नदी: सोंढूर
  • स्थान: धमतरी जिला
  • उद्देश्य: सिंचाई + पेयजल

6. सिकासार परियोजना – गरियाबंद

  • वर्ष: 1995
  • नदी: पैरी
  • स्थान: सिकासार ग्राम, गरियाबंद
  • विशेषता: महानदी कॉम्प्लेक्स का हिस्सा (विश्व बैंक सहायता से स्थापित)

निष्कर्ष

Part–1 में हमने देखा कि किस प्रकार छत्तीसगढ़ में 1901 से 1995 तक सिंचाई परियोजनाओं का क्रमिक विकास हुआ। महानदी बेसिन ने प्रदेश की कृषि और जल प्रबंधन में सबसे बड़ा योगदान दिया है।

🌊 छत्तीसगढ़ की बाँध परियोजना और एनीकेट | Chhattisgarh Dam Project

1) हसदेव बांगो / मिनीमाता बहुउद्देशीय परियोजना (कोरबा)

हसदेव नदी पर निर्मित हसदेव बांगो बाँध छत्तीसगढ़ की सबसे प्रसिद्ध बहुउद्देशीय परियोजनाओं में से एक है। इसे बाद में मिनीमाता (हसदेव) बांगो परियोजना नाम दिया गया।

प्रमुख तथ्य:

  • स्थान: कोरबा जिला, कटघोरा से 70 किमी दूर
  • नदी: हसदेव
  • निर्माण स्वीकृति: योजना आयोग द्वारा 1961–62
  • गेटों की संख्या: 11 (10 परिचालन)
  • लंबाई: लगभग 555 मीटर
  • जलाशय क्षेत्र: 6730 वर्ग किमी
  • स्थापित क्षमता: 120 मेगावाट जलविद्युत संयंत्र (मचाडोली)

महत्व:

  • सिंचाई: आसपास के हज़ारों हेक्टेयर कृषि भूमि को पानी।
  • पेयजल: कोरबा टाउन, कटघोरा और आसपास की बस्तियाँ।
  • उद्योग:
  • BALCO (Bharat Aluminium Company)
  • SECL (South Eastern Coalfields Limited)
  • NTPC (National Thermal Power Corporation)
  • CSPGCL
  • इन सबकी पानी की ज़रूरत पूरी करता है।
  • पर्यटन: सुंदर पहाड़ियों के बीच स्थित यह बाँध एक लोकप्रिय पिकनिक स्पॉट है।

👉 यह बाँध न सिर्फ कृषि और पेयजल के लिए बल्कि औद्योगिक विकास का आधार भी है।

2) खूटाघाट / संजय गाँधी जलाशय (बिलासपुर)

बिलासपुर जिले का खूटाघाट बाँध छत्तीसगढ़ के सबसे सुंदर बाँधों में गिना जाता है। इसे संजय गाँधी जलाशय भी कहा जाता है।

प्रमुख तथ्य:

  • स्थान: बिलासपुर से 33 किमी, रतनपुर से 12 किमी दूर
  • नदी: खारंग नदी
  • निर्माण वर्ष: 1930 (ब्रिटिश काल में पानी की कमी के कारण)
  • नामकरण: बाद में संजय गाँधी के नाम पर

विशेषताएँ:

  • जल, जंगल और हरियाली से घिरा यह बाँध प्राकृतिक सौंदर्य के लिए प्रसिद्ध है।
  • सूर्योदय और बारिश के मौसम में जलप्रपात जैसा दृश्य।
  • बाँध के बीच एक मंदिर है, जो वर्ष में 6 महीने जलमग्न रहता है।
  • यहाँ एक सुंदर उद्यान और पहाड़ी की चोटी पर रेस्ट हाउस भी बनाया गया है।

👉 यह बाँध न केवल सिंचाई सुविधा प्रदान करता है बल्कि पर्यटन स्थल भी है।

3) तांदुला परियोजना (बालोद)

छत्तीसगढ़ की ऐतिहासिक परियोजनाओं में से एक है तांदुला बाँध

प्रमुख तथ्य:

  • स्थान: बालोद जिला
  • नदी: तांदुला और सूखा नाला का संगम
  • निर्माण काल: 1910–1920
  • निर्माणकर्ता: ब्रिटिश अभियंता एडम स्मिथ
  • विशेषता: प्रदेश का पहला नदी परियोजना बाँध
  • महत्व: छत्तीसगढ़ का तीसरा सबसे बड़ा जलाशय

महत्व:

  • भिलाई स्टील प्लांट (BSP) को पानी की आपूर्ति।
  • आसपास के क्षेत्रों में धान की खेती के लिए सिंचाई का प्रमुख स्रोत।
  • बाँध की खूबसूरती इसे पर्यटन स्थल बनाती है।

तांदुला कॉम्प्लेक्स परियोजना

👉 गोंदली जलाशय (Gondli Dam)

  • तांदुला जलाशय की पानी की आवश्यकता पूरी करने हेतु 1957 में गोंदली जलाशय का निर्माण।
  • यह बालोद जिले में जुंझार/जुहार नाले पर बनाया गया।
  • 9 किमी लंबी नहर द्वारा तांदुला से जोड़ा गया।

👉 खरखरा जलाशय (Kharkhara Dam)

  • बालोद जिले में खरखरा नदी पर निर्मित।
  • निर्माण वर्ष: 1967
  • विशेषता: यह एक सायफन परियोजना है।
  • लंबाई: लगभग 1128 मीटर।
  • मुख्य उद्देश्य: कृषि सिंचाई।

4) मोंगरा बैराज (राजनांदगांव)

मोंगरा बैराज शिवनाथ नदी पर निर्मित एक महत्वपूर्ण परियोजना है।

प्रमुख तथ्य:

  • स्थान: राजनांदगांव जिला, अंबागढ़ चौकी से 10 किमी दूर
  • नदी: शिवनाथ
  • लंबाई: 1590 मीटर (182.05 मीटर पक्का हिस्सा)
  • ऊँचाई: 15.90 मीटर
  • जलभराव क्षेत्र: 712.24 वर्ग किमी
  • सक्रिय जलभराव क्षमता: 32.05 मिलियन घन मीटर
  • गेट संख्या: 10 (प्रत्येक 10.50 × 8.55 मीटर)

महत्व:

  • पेयजल आपूर्ति: राजनांदगांव, दुर्ग और भिलाई नगर निगम की जीवनरेखा।
  • सिंचाई: 49 गाँवों की कृषि भूमि को पानी।
  • वर्षा जल संचयन: महाराष्ट्र सीमा से आने वाली अधिक वर्षा के कारण यह कम बारिश में भी भर जाता है।
  • आधुनिक संरचना: गंगरेल बाँध जैसी तकनीक से गेट बनाए गए हैं।

👉 यह परियोजना जलापूर्ति और सिंचाई के साथ-साथ बाढ़ नियंत्रण में भी सहायक है।

5) खुड़िया / राजीव गाँधी जलाशय (मुंगेली)

यह बाँध अंग्रेजी शासनकाल में बनाया गया था और बाद में इसका नाम राजीव गाँधी जलाशय रखा गया।

प्रमुख तथ्य:

  • स्थान: लोरमी ब्लॉक, मुंगेली जिला (मुंगेली से 45 किमी)
  • नदी: मनियारी
  • निर्माण वर्ष: 1927–1930
  • नामकरण: पहले खुड़िया जलाशय, बाद में राजीव गाँधी जलाशय

विशेषताएँ:

  • तीन पहाड़ियों को जोड़कर जलाशय का निर्माण।
  • सुंदर प्राकृतिक वातावरण, चारों ओर वनाच्छादित क्षेत्र और पहाड़ी श्रृंखला।
  • बाँध से एक नहर निकलती है, जो पूरे लोरमी क्षेत्र की सिंचाई करती है।
  • रेस्ट हाउस और पर्यटन स्थल के रूप में भी लोकप्रिय।

👉 यह जलाशय कृषि सिंचाई और पर्यटन दोनों दृष्टि से महत्वपूर्ण है।

6) कुम्हारी बाँध (रायपुर)

प्रमुख तथ्य:

  • स्थान: रायपुर जिला
  • नदी/नाला: बंजारी नाला (महानदी की सहायक)
  • उद्देश्य: स्थानीय किसानों की सिंचाई आवश्यकताओं की पूर्ति

👉 यह बाँध आकार में छोटा होने के बावजूद रायपुर जिले के कृषि विकास में सहायक है।

7) किंकरी बाँध (सरंगगढ़)

प्रमुख तथ्य:

  • स्थान: सरंगगढ़ क्षेत्र
  • नाला: किंकरी नाला
  • निर्माण वर्ष: 1982
  • मुख्य उद्देश्य: आसपास की कृषि भूमि को सिंचाई सुविधा उपलब्ध कराना

👉 यह बाँध स्थानीय स्तर पर जल संसाधन प्रबंधन का अच्छा उदाहरण है।

8) केलो / दिलीप सिंह जूदेव परियोजना (रायगढ़)

केलो बाँध को छत्तीसगढ़ की बड़ी परियोजनाओं में गिना जाता है।

प्रमुख तथ्य:

  • स्थान: लाखा, रायगढ़ जिला
  • नदी: केलो
  • प्रारंभ: जनवरी 2008
  • उद्देश्य: 22,000 हेक्टेयर कृषि भूमि की सिंचाई
  • नामकरण: स्व. दिलीप सिंह जूदेव के नाम पर

महत्व:

  • रायगढ़ और जशपुर जिले के लगभग 175 गाँवों में सिंचाई सुविधा।
  • कृषि उत्पादन में वृद्धि।
  • पेयजल और निस्तारी के लिए सहायक।
  • इसके नामकरण को लेकर काफी विवाद भी हुआ, लेकिन अब इसे दिलीप सिंह जूदेव परियोजना के नाम से जाना जाता है।

9) कोडार / वीर नारायण सिंह परियोजना (महासमुंद)

वीर नारायण सिंह परियोजना को पहले कोडार परियोजना के नाम से जाना जाता था। यह छत्तीसगढ़ की एक ऐतिहासिक और महत्वपूर्ण सिंचाई परियोजना है।

प्रमुख तथ्य:

  • स्थान: महासमुंद जिला
  • नदी: कोडार नदी (महानदी की सहायक)
  • नामकरण: छत्तीसगढ़ के महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी वीर नारायण सिंह के नाम पर
  • क्षेत्रीय लाभ: महासमुंद, बलौदाबाजार व रायपुर जिलों की कृषि भूमि

महत्व:

  • यह परियोजना लगभग 50,000 हेक्टेयर कृषि भूमि को सिंचाई सुविधा देती है।
  • धान उत्पादक क्षेत्र होने के कारण यहाँ किसानों की उपज पर सीधा असर पड़ा।
  • यह बाँध क्षेत्र में जल-प्रबंधन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ है।

👉 छत्तीसगढ़ के इतिहास और गौरव को यह बाँध “वीर नारायण सिंह” नाम से अमर करता है।

10) घुनघुट्टा परियोजना (सरगुजा)

घुनघुट्टा बाँध सरगुजा जिले की महत्वपूर्ण परियोजना है।

प्रमुख तथ्य:

  • स्थान: अंबिकापुर, सरगुजा जिला
  • नदी: घुनघुट्टा नदी
  • निर्माण वर्ष: 1981–1982
  • मुख्य उद्देश्य: सिंचाई और पेयजल आपूर्ति

महत्व:

  • अंबिकापुर शहर और आसपास के गाँवों को पेयजल की आपूर्ति।
  • लगभग 12,000 हेक्टेयर भूमि को सिंचाई सुविधा।
  • यह बाँध पर्यटन स्थल के रूप में भी प्रसिद्ध है, क्योंकि यहाँ नौकायन व पिकनिक की सुविधाएँ उपलब्ध हैं।

👉 यह परियोजना अंबिकापुर क्षेत्र की “जीवनरेखा” कही जाती है।

11) महान परियोजना (सरगुजा)

महान बाँध को सरगुजा के विकास का आधार माना जाता है।

प्रमुख तथ्य:

  • स्थान: लुंड्रा ब्लॉक, सरगुजा जिला
  • नदी: महान नदी
  • निर्माण वर्ष: 1983
  • उद्देश्य: कृषि भूमि को सिंचाई सुविधा

विशेषताएँ:

  • लगभग 15,000 हेक्टेयर भूमि सिंचित।
  • क्षेत्रीय धान उत्पादन में वृद्धि।
  • बाँध के आसपास के गाँव जलापूर्ति और मछली पालन से भी लाभान्वित।

👉 महान बाँध कृषि और मत्स्य पालन दोनों के लिए अत्यंत उपयोगी सिद्ध हुआ है।

12) भैंसाझार परियोजना (बिलासपुर)

प्रमुख तथ्य:

  • स्थान: बिलासपुर जिला
  • नदी/नाला: भैंसाझार नाला
  • निर्माण वर्ष: 1986
  • मुख्य उद्देश्य: लोरमी और आसपास की भूमि को सिंचाई सुविधा

महत्व:

  • धान व अन्य फसलों की उपज में वृद्धि।
  • ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती।
  • सिंचाई जल के अलावा निस्तारी और मत्स्य पालन की सुविधा भी।

👉 यह बाँध स्थानीय कृषि उत्पादन में बड़ा योगदान करता है।

13) बोधघाट परियोजना (बस्तर)

बोधघाट परियोजना छत्तीसगढ़ की प्रस्तावित बड़ी परियोजनाओं में से एक है।

प्रमुख तथ्य:

  • स्थान: दंतेवाड़ा जिला, बस्तर संभाग
  • नदी: इंद्रावती नदी
  • उद्देश्य: सिंचाई + जलविद्युत उत्पादन
  • निर्धारित क्षमता: लगभग 600 मेगावाट बिजली उत्पादन और 3 लाख हेक्टेयर भूमि की सिंचाई

महत्व और विवाद:

  • यह परियोजना बस्तर के आदिवासी क्षेत्रों के लिए विकास का मार्ग खोल सकती है।
  • इससे हजारों हेक्टेयर भूमि सिंचाई के दायरे में आएगी।
  • लेकिन, बड़ी संख्या में जंगल और आदिवासी गाँव डूबान क्षेत्र में आने के कारण यह विवादास्पद है।
  • पर्यावरणीय मंजूरी और पुनर्वास योजनाएँ इस परियोजना को लंबे समय से अटका रही हैं।

👉 यदि यह परियोजना सफलतापूर्वक लागू होती है तो बस्तर क्षेत्र की तस्वीर बदल सकती है।

14) खड्गवां परियोजना (कोरिया)

खड्गवां बाँध कोरिया जिले की एक प्रमुख परियोजना है।

प्रमुख तथ्य:

  • स्थान: खड्गवां ब्लॉक, कोरिया जिला
  • नदी: छोटी सहायक नदियाँ (महानदी बेसिन)
  • मुख्य उद्देश्य: कृषि भूमि की सिंचाई और पेयजल आपूर्ति

महत्व:

  • कोरिया जिले के सुदूरवर्ती गाँवों में सिंचाई सुविधा उपलब्ध कराई।
  • स्थानीय किसानों को धान, मक्का और दलहन फसलों के लिए पानी की पर्याप्त व्यवस्था।
  • ग्रामीण निस्तारी और पशुपालन में भी सहायक।

👉 यह परियोजना अपेक्षाकृत छोटी है, लेकिन स्थानीय कृषि विकास में बड़ी भूमिका निभाती है।

15) मांड परियोजना (जशपुर)

मांड बाँध जशपुर जिले की जीवनरेखा मानी जाती है।

प्रमुख तथ्य:

  • स्थान: जशपुर जिला
  • नदी: मांड नदी (महानदी की सहायक)
  • निर्माण वर्ष: 1980 के दशक
  • मुख्य उद्देश्य: कृषि भूमि की सिंचाई और पेयजल

विशेषताएँ:

  • सिंचाई का क्षेत्रफल लगभग 10,000 हेक्टेयर
  • आदिवासी अंचल में कृषि उत्पादन बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान।
  • बाँध के आसपास पर्यटन और पिकनिक स्थल के रूप में भी लोकप्रिय।

👉 मांड परियोजना जशपुर के किसानों को स्थायी जल-सुविधा प्रदान करने में अहम है।

16) इंद्रावती परियोजना (दंतेवाड़ा)

इंद्रावती बाँध छत्तीसगढ़ की सबसे महत्वाकांक्षी परियोजनाओं में से एक है।

प्रमुख तथ्य:

  • स्थान: दंतेवाड़ा जिला (बस्तर संभाग)
  • नदी: इंद्रावती नदी
  • निर्माण प्रारंभ: 1978
  • मुख्य उद्देश्य: सिंचाई + जलविद्युत उत्पादन
  • जलविद्युत उत्पादन क्षमता: लगभग 100 मेगावाट

महत्व:

  • लगभग 2.3 लाख हेक्टेयर भूमि को सिंचाई सुविधा।
  • बस्तर संभाग की कृषि और औद्योगिक गतिविधियों को गति।
  • इंद्रावती जलाशय से मत्स्य पालन और पर्यटन को भी बढ़ावा मिला।
  • दंतेवाड़ा और जगदलपुर क्षेत्र की पेयजल आवश्यकता पूरी करता है।

👉 यह परियोजना “छत्तीसगढ़ का हृदय बाँध” कही जाती है।

17) डोंगानाला बाँध (रायगढ़)

प्रमुख तथ्य:

  • स्थान: रायगढ़ जिला
  • नदी/नाला: डोंगानाला
  • निर्माण वर्ष: 1990 के दशक
  • मुख्य उद्देश्य: स्थानीय सिंचाई और निस्तारी सुविधा

महत्व:

  • छोटे किसानों को धान और सब्ज़ी उत्पादन के लिए पानी उपलब्ध।
  • ग्रामीण स्तर पर जल-संसाधन विकास का उत्कृष्ट उदाहरण।
  • आसपास के गाँवों में जल संग्रहण और भू-जल स्तर बनाए रखने में सहायक।

👉 यह बाँध छोटे पैमाने पर लेकिन अत्यंत प्रभावी परियोजना है।

18) अमरकंटक क्षेत्र की छोटी जल परियोजनाएँ

अमरकंटक क्षेत्र (अनुपपुर – छत्तीसगढ़ की सीमा से लगा) नर्मदा, सोन और जोंक नदियों का उद्गम स्थल है। यहाँ कई छोटी–छोटी जल परियोजनाएँ बनाई गई हैं।

प्रमुख तथ्य:

  • स्थान: अमरकंटक (छत्तीसगढ़–मध्यप्रदेश सीमा क्षेत्र)
  • नदियाँ: नर्मदा, सोन, जोंक
  • उद्देश्य: स्थानीय सिंचाई और पेयजल आपूर्ति

महत्व:

  • छोटी जल संरचनाएँ गाँव–गाँव में कृषि को सहयोग देती हैं।
  • इनसे स्थानीय जल संरक्षण और भू-जल स्तर बनाए रखने में मदद।
  • पर्यावरणीय दृष्टि से अमरकंटक क्षेत्र का महत्व और भी बढ़ जाता है।

👉 यहाँ की परियोजनाएँ भले ही छोटी हों, लेकिन स्थानीय विकास में बड़ी भूमिका निभाती हैं।

19) खरखरा बाँध (बालोद)

प्रमुख तथ्य:

  • स्थान: बालोद जिला
  • नदी: खरखरा नदी
  • निर्माण वर्ष: 1967
  • लंबाई: लगभग 1128 मीटर
  • प्रकार: पूर्णतः मिट्टी से निर्मित बाँध
  • परियोजना प्रकार: सायफन तकनीक से निर्मित

महत्व:

  • यह परियोजना तांदुला कॉम्प्लेक्स परियोजना का हिस्सा है।
  • आसपास के गाँवों में कृषि भूमि की सिंचाई।
  • किसानों को धान और ग्रीष्मकालीन फसलों के लिए पानी उपलब्ध।
  • स्थानीय स्तर पर मत्स्य पालन को भी बढ़ावा।

👉 खरखरा बाँध तकनीकी दृष्टि से छत्तीसगढ़ के अनोखे बाँधों में गिना जाता है।

20) सिकासेर बाँध (गरियाबंद)

प्रमुख तथ्य:

  • स्थान: गरियाबंद जिला (पूर्व रायपुर जिला का हिस्सा)
  • नदी: पैरी नदी
  • गाँव: सिकासेर
  • निर्माण वर्ष: 1995
  • वित्त पोषण: विश्व बैंक सहायता

महत्व:

  • पैरी नदी पर बना यह बाँध गरियाबंद क्षेत्र की कृषि भूमि की सिंचाई का मुख्य साधन है।
  • पेयजल आपूर्ति में भी महत्वपूर्ण योगदान।
  • गरियाबंद और महासमुंद जिलों के कई गाँवों में सिंचाई सुविधा उपलब्ध।
  • पर्यटन स्थल के रूप में भी लोकप्रिय — बाँध के चारों ओर प्राकृतिक हरियाली और शांत वातावरण।

👉 सिकासेर बाँध को “गरियाबंद की धड़कन” कहा जाता है।

21) खारंग परियोजना (जांजगीर–चांपा)

प्रमुख तथ्य:

  • स्थान: जांजगीर–चांपा जिला
  • नदी: खारंग नदी
  • निर्माण वर्ष: 1931
  • प्रकार: टैंक (जलाशय)

महत्व:

  • यह क्षेत्र के शुरुआती सिंचाई टैंकों में से एक है।
  • जांजगीर और आसपास के गाँवों की कृषि भूमि को पानी उपलब्ध।
  • ब्रिटिश कालीन तकनीक से निर्मित यह परियोजना आज भी उपयोगी।
  • धान उत्पादन वाले क्षेत्र में इसे जीवनरेखा माना जाता है।

👉 खारंग परियोजना ऐतिहासिक और कृषि दोनों दृष्टियों से महत्वपूर्ण है।

22) कोडार / वीर नारायण सिंह परियोजना (महासमुंद)

प्रमुख तथ्य:

  • स्थान: महासमुंद जिला
  • नदी: कोडार नदी
  • आधिकारिक नाम: वीर नारायण सिंह परियोजना
  • उद्देश्य: सिंचाई, पेयजल और औद्योगिक जल आपूर्ति

महत्व:

  • महासमुंद और रायपुर क्षेत्र की कृषि भूमि की सिंचाई हेतु प्रमुख स्रोत।
  • परियोजना का नाम छत्तीसगढ़ के प्रथम स्वतंत्रता सेनानी वीर नारायण सिंह के नाम पर रखा गया।
  • महासमुंद जिले की धान की खेती को स्थायी जल उपलब्ध कराती है।
  • पेयजल और मत्स्य पालन का बड़ा स्रोत।

👉 कोडार परियोजना महासमुंद जिले की “धान की कटोरी” को जीवन देने वाली मानी जाती है।

23) घुनघुट्टा परियोजना (सरगुजा)

प्रमुख तथ्य:

  • स्थान: सरगुजा जिला (अंबिकापुर के पास)
  • नदी: घुनघुट्टा नदी
  • निर्माण काल: 1980 के दशक
  • उद्देश्य: सिंचाई और पेयजल

विशेषताएँ:

  • घुनघुट्टा डैम अंबिकापुर शहर के पास एक प्रमुख पिकनिक और पर्यटन स्थल है।
  • यहाँ की झील जैसी संरचना सुंदर प्राकृतिक दृश्य प्रस्तुत करती है।
  • सरगुजा जिले के गाँवों और अंबिकापुर नगर को पानी उपलब्ध।
  • धान और गेहूँ की खेती को मुख्य लाभ।

👉 घुनघुट्टा बाँध को “अंबिकापुर की जीवनरेखा” कहा जाता है।

24) महान परियोजना (सरगुजा)

प्रमुख तथ्य:

  • स्थान: सरगुजा जिला
  • नदी: महान नदी (महानदी बेसिन की सहायक)
  • निर्माण उद्देश्य: सिंचाई और पेयजल

महत्व:

  • सरगुजा क्षेत्र के किसानों के लिए धान की खेती हेतु जल आपूर्ति।
  • ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल और निस्तारी की सुविधा।
  • छोटे पैमाने पर मत्स्य पालन और जल संरक्षण को बढ़ावा।

👉 महान परियोजना सरगुजा के उत्तरी गाँवों की कृषि आवश्यकताओं की पूर्ति करती है।

25) बोधघाट परियोजना (बस्तर)

प्रमुख तथ्य:

  • स्थान: दंतेवाड़ा और सुकमा के बीच, बस्तर संभाग
  • नदी: इंद्रावती नदी
  • योजना: बहुद्देशीय — सिंचाई + जलविद्युत + पेयजल
  • निर्माण उद्देश्य: लगभग 3000 मेगावाट विद्युत उत्पादन क्षमता (प्रस्तावित)

विशेषताएँ:

  • यह परियोजना अभी तक पूरी तरह क्रियान्वित नहीं हुई है।
  • यदि यह पूरी हो जाती है तो छत्तीसगढ़ और मध्य भारत में जलविद्युत उत्पादन का प्रमुख केंद्र बन सकती है।
  • इंद्रावती घाटी के बड़े क्षेत्र को सिंचाई सुविधा उपलब्ध कराना।
  • स्थानीय आदिवासी क्षेत्रों में विवाद और पर्यावरणीय चुनौतियों के कारण परियोजना ठप रही।

👉 बोधघाट परियोजना “छत्तीसगढ़ का भविष्य बाँध” मानी जाती है, लेकिन पर्यावरणीय और सामाजिक मुद्दों के कारण अभी लंबित है।

26) कोसारटेडा परियोजना (बस्तर)

प्रमुख तथ्य:

  • स्थान: बस्तर जिला
  • नदी: इंद्रावती की सहायक नदी
  • निर्माण उद्देश्य: सिंचाई और पेयजल आपूर्ति

महत्व:

  • बस्तर क्षेत्र के ग्रामीण इलाकों को जल उपलब्ध कराने के लिए बनाई गई।
  • यह परियोजना स्थानीय किसानों के लिए धान, मक्का और दलहन फसलों हेतु सिंचाई का मुख्य स्रोत।
  • बस्तर में छोटे पैमाने पर औद्योगिक विकास और मत्स्य पालन को बढ़ावा।

👉 कोसारटेडा परियोजना बस्तर के आदिवासी किसानों के जीवन में जल-समृद्धि लाने वाली है।

27) छीरपानी परियोजना (कबीरधाम)

प्रमुख तथ्य:

  • स्थान: कबीरधाम जिला
  • नदी: छोटे-छोटे नालों का जल संग्रहण
  • निर्माण उद्देश्य: लघु सिंचाई

महत्व:

  • कबीरधाम क्षेत्र के आदिवासी किसानों के लिए खेतों तक पानी पहुँचाने का साधन।
  • लघु सिंचाई योजनाओं में शामिल यह परियोजना छोटे पैमाने की खेती को सहारा देती है।
  • बरसात का पानी रोककर भूजल स्तर को भी recharge करती है।

👉 छीरपानी परियोजना को "कबीरधाम के सूखा प्रभावित क्षेत्रों की राहत" कहा जाता है।

28) सुतियापाट परियोजना (कबीरधाम)

प्रमुख तथ्य:

  • स्थान: कबीरधाम जिला
  • नदी: सहायक नालों पर आधारित
  • निर्माण उद्देश्य: सिंचाई और निस्तारी

महत्व:

  • सुतियापाट डैम कबीरधाम जिले की धान की खेती में योगदान देता है।
  • यहाँ मत्स्य पालन और पेयजल आपूर्ति भी होती है।
  • ग्रामीण इलाकों के विकास में जलस्रोत के रूप में अहम भूमिका।

👉 यह परियोजना कबीरधाम जिले की “धान की कटोरी” को मजबूत बनाती है।

29) खेरकट्टा जलाशय (कांकेर)

प्रमुख तथ्य:

  • स्थान: कांकेर जिला
  • नदी: दुध नदी (इंद्रावती बेसिन)
  • निर्माण उद्देश्य: सिंचाई और पेयजल

महत्व:

  • कांकेर जिले की कृषि भूमि की सिंचाई का मुख्य साधन।
  • क्षेत्र के गाँवों को पेयजल उपलब्ध।
  • बाँध स्थल पर प्राकृतिक सौंदर्य और पर्यटन महत्व।
  • मत्स्य पालन को प्रोत्साहन।

👉 खेरकट्टा जलाशय को कांकेर का “जल जीवन” कहा जाता है।

30) कुँअरपुर परियोजना (सरगुजा)

प्रमुख तथ्य:

  • स्थान: सरगुजा जिला
  • नदी: छोटे नालों पर आधारित
  • निर्माण उद्देश्य: सिंचाई

महत्व:

  • कुँअरपुर बाँध सरगुजा जिले के गाँवों में खेतों तक पानी पहुँचाता है।
  • मुख्यतः खरीफ धान और रबी फसल के लिए जल उपलब्ध।
  • ग्रामीण पेयजल और मछली पालन में सहायक।

👉 कुँअरपुर परियोजना सरगुजा जिले की लघु सिंचाई योजनाओं में महत्वपूर्ण स्थान रखती है।

31) रानी अवंतीबाई लोधी परियोजना (राजनांदगाँव)

प्रमुख तथ्य:

  • स्थान: राजनांदगाँव जिला
  • नदी: शिवनाथ नदी की सहायक धाराएँ
  • नामकरण: वीरांगना रानी अवंतीबाई लोधी के सम्मान में
  • उद्देश्य: सिंचाई और ग्रामीण पेयजल

महत्व:

  • राजनांदगाँव और आसपास के किसानों की धान की खेती को जल आपूर्ति।
  • यहाँ से ग्रामीण पेयजल आपूर्ति की जाती है।
  • बाँध का नाम मध्यभारत की स्वतंत्रता संग्राम की वीरांगना रानी अवंतीबाई के नाम पर होने से ऐतिहासिक महत्व भी रखता है।

👉 यह परियोजना जल प्रबंधन और नारी सम्मान दोनों का प्रतीक है।

32) मनेंद्रगढ़ बाँध (कोरिया)

प्रमुख तथ्य:

  • स्थान: कोरिया जिला (मनेंद्रगढ़ क्षेत्र)
  • नदी: स्थानीय नालों और छोटी सहायक नदियों पर आधारित
  • उद्देश्य: सिंचाई और जल संग्रहण

महत्व:

  • कोरिया जिले के पहाड़ी और पठारी क्षेत्र में सिंचाई का प्रमुख स्रोत।
  • यहाँ धान, गेहूँ और मक्का जैसी फसलों की खेती को लाभ मिलता है।
  • बाँध का पानी ग्रामीण पेयजल और मत्स्य पालन के लिए भी उपयोग होता है।

👉 यह बाँध कोरिया जिले की कृषि व्यवस्था के लिए अहम है।

33) अन्य लघु बाँध और एनीकेट

छत्तीसगढ़ में केवल बड़े बाँध ही नहीं, बल्कि अनेक लघु बाँध और एनीकेट भी बनाए गए हैं, जैसे:

  • भैंसाझार (जांजगीर)
  • कन्हार परियोजना (सरगुजा)
  • फरसिया बाँध (महासमुंद)
  • तेंदूडीह बाँध (बिलासपुर)
  • नवा गांव एनीकेट (दुर्ग)

👉 ये सभी छोटी परियोजनाएँ मिलकर किसानों को स्थायी सिंचाई सुविधा और जल संरक्षण उपलब्ध कराती हैं।

34) बस्तर और सरगुजा क्षेत्र की शेष बाँध परियोजनाएँ

(क) बस्तर क्षेत्र

  • कुम्हारखेड़ा बाँध (जगदलपुर) – लघु सिंचाई हेतु।
  • मुनगा बाँध (कांकेर) – आदिवासी क्षेत्रों में कृषि सहायता।
  • परलकोट बाँध (कोंडागांव) – सिंचाई व पेयजल।

(ख) सरगुजा क्षेत्र

  • ललपुर परियोजना (सरगुजा) – खरीफ खेती के लिए जल आपूर्ति।
  • रामानुजगंज बाँध (बलरामपुर) – धान की खेती को समर्थन।
  • झगराखांड परियोजना (कोरिया) – सिंचाई और निस्तारी के लिए।

👉 ये सभी परियोजनाएँ स्थानीय स्तर पर किसानों की आवश्यकताओं की पूर्ति करती हैं और छत्तीसगढ़ की कृषि अर्थव्यवस्था को स्थिर करती हैं।

💧) बाँधों का पर्यटन महत्व

छत्तीसगढ़ के बाँध और जलाशय न केवल सिंचाई व बिजली उत्पादन में उपयोगी हैं, बल्कि पर्यटन की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण हैं।

  • गंगरेल बाँध (धमतरी) – “छत्तीसगढ़ का मिनी गोवा” कहा जाता है, यहाँ नौकायन और वॉटर स्पोर्ट्स होते हैं।
  • खुटाघाट बाँध (बिलासपुर–कोरबा सीमा) – प्राकृतिक सौंदर्य और पिकनिक स्पॉट।
  • घुनघुट्टा बाँध (सरगुजा) – सुंदर झील जैसी संरचना, पर्यटकों का आकर्षण।
  • सिकासेर बाँध (धमतरी) – पहाड़ी और हरियाली से घिरा हुआ स्थान।

👉 इन बाँधों ने छत्तीसगढ़ में इको–टूरिज्म और स्थानीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा दिया है।

💧) बाँधों का मत्स्य पालन में महत्व

  • सभी प्रमुख जलाशयों में मत्स्य पालन केंद्र स्थापित किए गए हैं।
  • छत्तीसगढ़ की मत्स्य नीति में गंगरेल, कोडार, खुटाघाट, मर्री–गुमनी, मुरूमसिली जैसे बाँधों से बड़ी मात्रा में मछली उत्पादन होता है।
  • ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में मछली पालन आजीविका का प्रमुख साधन है।

👉 सिंचाई के साथ–साथ मछली पालन से भी हजारों परिवारों को रोजगार मिलता है।