छत्तीसगढ़ की लोक नृत्य | Chhattisgarh Ke Lok Nritya
परिचय
छत्तीसगढ़ अपनी प्राचीन और समृद्ध संस्कृति, जनजातीय परंपराओं और रंग-बिरंगे लोक नृत्यों के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ का हर नृत्य केवल मनोरंजन का साधन नहीं बल्कि धार्मिक अनुष्ठान, सामाजिक मेल-मिलाप और सांस्कृतिक धरोहर का प्रतीक है।
छत्तीसगढ़ के लोकनृत्यों में मांदर, झांझ, मंजीरा, टिमकी, शहनाई, सिंह बाजा जैसे वाद्ययंत्र और मोरपंख, कौड़ी, गहने, पारंपरिक वस्त्र इन्हें और भी आकर्षक बनाते हैं।
छत्तीसगढ़ की प्रमुख लोक नृत्य (Major Folk Dances of Chhattisgarh)
1. कर्मा नृत्य (Karma Dance)
- कर्मा नृत्य छत्तीसगढ़ अंचल के आदिवासी समाज का लोकप्रिय लोकनृत्य है।
- कर्मा नृत्य भादो मास की एकादशी को ‘करम वृक्ष’ की पूजा के बाद इसे किया जाता है।
- कर्मा नृत्य में स्त्री-पुरुष दोनों इसमें भाग लेते हैं।
- कर्मा नृत्य के प्रमुख प्रकार हैं: झूमर, लंगड़ा, ठाढ़ा, खेमटा।
- कर्मा नृत्य के वाद्ययंत्र: मांदर, झांझ, मंजीरा, टिमकी, मोहरी।
- वेशभूषा: पगड़ी में मयूरपंख, रुपया-सुताइल, करधनी, चूरा आदि।
कर्मा नृत्य संस्कृति का प्रतीक
- यह नृत्य छत्तीसगढ़ की लोक-संस्कृति का पर्याय है।
- छत्तीसगढ़ के आदिवासी, ग़ैर-आदिवासी सभी का यह लोक मांगलिक नृत्य है।
- बैगा कर्मा, गोंड़ कर्मा और भुंइयाँ कर्मा आदिजातीय नृत्य माना जाता है।
- छत्तीसगढ़ के एक लोक नृत्य में ‘करमसेनी देवी’ का अवतार गोंड के घर में माना गया है, दूसरे गीत में घसिया के घर माना गया है।
- कर्मा नृत्य में स्त्री-पुरुष सभी भाग लेते हैं।
- छत्तीसगढ़ का हर गीत इसमें समाहित हो जाता है।
- यह वर्षा ऋतु को छोड़कर सभी ऋतुओं में नाचा जाता है।
- सरगुजा के सीतापुर के तहसील, रायगढ़ के जशपुर और धरमजयगढ़ के आदिवासी इस नृत्य को साल में सिर्फ़ चार दिन नाचते हैं।
- एकादशी कर्मा नृत्य नवाखाई के उपलक्ष्य में पुत्र की प्राप्ति, पुत्र के लिए मंगल कामना; अठई नामक कर्मा नृत्य क्वांर में भाई-बहन के प्रेम संबंध; दशई नामक कर्मा नृत्य और दीपावली के दिन कर्मा नृत्य युवक-युवतियों के प्रेम से सराबोर होता है।
कर्मा नृत्य के प्रकार
- यों तो कर्मा नृत्य की अनेक शैलियाँ हैं, लेकिन छत्तीसगढ़ में चार शैलियाँ प्रचलित हैं, जिसमें हैं।
- झूमर, खेमटा जो नृत्य झूम-झूम कर नाचा जाता है, उसे ‘झूमर’ कहते हैं।
- लंगड़ा, एक पैर झुकाकर गाया जाने वाल नृत्य ‘लंगड़ा’ है।
- ठाढ़ा, लहराते हुए करने वाले नृत्य को ‘लहकी’ और खड़े होकर किया जाने वाला नृत्य ‘ठाढ़ा’ कहलाता है।
- लहकी आगे-पीछे पैर रखकर, कमर लचकाकर किया जाने वाला नृत्य ‘खेमटा’ है।
कर्मा नृत्य के वस्त्र तथा वाद्ययंत्र
- कर्मा नृत्य में मांदर और झांझ-मंजीरा प्रमुख वाद्ययंत्र हैं। इसके अलावा टिमकी ढोल, मोहरी आदि का भी प्रयोग होता है।
- कर्मा नर्तक मयूर पंख का झाल पहनता है, पगड़ी में मयूर पंख के कांड़ी का झालदार कलगी खोंसता है।
- रुपया, सुताइल, बहुंटा ओर करधनी जैसे आभूषण पहनता है।
- कलई में चूरा, और बाँह में बहुटा पहने हुए युवक की कलाइयों और कोहनियों का झूल नृत्य की लय में बड़ा सुन्दर लगता है।
- इस नृत्य में संगीत योजनाबद्ध होती है। राग के अनुरूप ही इस नृत्य की शैलियाँ बदलती है।
- इसमें गीता के टेक, समूह गान के रूप में पदांत में गूँजते रहता है।
- पदों में ईश्वर की स्तुति से लेकर शृंगार परक गीत होते हैं।
- मांदर और झांझ की लय-ताल पर नर्तक लचक-लचक कर भाँवर लगाते, हिलते-डुलते, झुकते-उठते हुये वृत्ताकार नृत्य करते हैं।
2. सुआ नृत्य (Sua Dance)
सुआ नृत्य छत्तीसगढ़ का अत्यंत लोकप्रिय और पारंपरिक महिला प्रधान लोकनृत्य है। इसका नाम "सुआ" (तोता) पर आधारित है, क्योंकि यह नृत्य विशेष रूप से हरित तोते के प्रतीक और हरियाली से जुड़ा हुआ है। यह नृत्य दीपावली के बाद से कार्तिक माह तक गाँवों में बड़े उल्लास से किया जाता है।
📌 अवसर (Occasion)
- यह नृत्य दीपावली पर्व के तुरंत बाद आरंभ होता है और देव उठनी एकादशी तक चलता है।
- नृत्य मुख्यतः फसल कटाई और घर की समृद्धि के प्रतीक रूप में होता है।
- स्त्रियाँ इस नृत्य के माध्यम से प्रेम, लोकजीवन और प्रकृति का वर्णन करती हैं।
📌 वेशभूषा (Costume)
- महिलाएँ – हरे रंग की साड़ी या पारंपरिक परिधान पहनती हैं।
- आभूषणों में चूड़ियाँ, हार, पायजेब, नथनी और कांच की चूड़ियाँ धारण करती हैं।
- पुरुष इस नृत्य में भाग नहीं लेते, यह संपूर्ण महिला प्रधान नृत्य है।
📌 वाद्य यंत्र (Instruments)
- मुख्य रूप से तालियाँ (हाथ की ताल) का प्रयोग किया जाता है।
- कुछ स्थानों पर मंजीरा या डफली भी प्रयोग में आती है, परन्तु मूल रूप से यह ताल प्रधान नृत्य है।
📌 नृत्य शैली (Dance Style)
- महिलाएँ जमीन पर बैठकर या खड़े होकर एक गोल घेरे (वृत्ताकार) में नाचती हैं।
- बीच में मिट्टी का घड़ा रखा जाता है, जिस पर सुआ (तोते) का चित्र या तोता मिट्टी से बनाकर रखा जाता है।
- महिलाएँ ताली बजाते हुए गीत गाती हैं और धीमे-धीमे डोलती हुई नृत्य करती हैं।
- गीतों को सुआ गीत कहा जाता है, जिनमें प्रेम, व्यंग्य, समाज और रिश्तों का वर्णन मिलता है।
📌 विशेषताएँ (Key Features)
- यह नृत्य केवल महिलाओं द्वारा किया जाने वाला प्रमुख नृत्य है।
- नृत्य में सुआ (तोता) को शुभता और प्रेम का प्रतीक माना गया है।
- इसमें हाव-भाव और गीतों के माध्यम से समाज के व्यंग्य और हास्य भी व्यक्त किए जाते हैं।
- इसमें किसी बड़े वाद्ययंत्र का प्रयोग नहीं, केवल तालियाँ और स्वर ही मुख्य आधार हैं।
- यह नृत्य फसल, सुख-समृद्धि और ग्रामीण जीवन की खुशियों से जुड़ा है।
3. डंडा / सैला नृत्य (Danda / Saila Dance)
- पुरुषों का समूह नृत्य, जिसमें डंडों की ताल मुख्य आकर्षण है।
- मैदानी भाग में ‘डंडा नृत्य’ और पर्वतीय क्षेत्र में ‘सैला नृत्य’ कहा जाता है।
- इसमें 40-60 तक नर्तक भाग लेते हैं।
- वृत्ताकार नृत्य करते हुए डंडों की ताल पर विभिन्न आकृतियाँ बनाई जाती हैं।
- कार्तिक से फाल्गुन तक यह नृत्य प्रचलित रहता है।
डंडा / सैला नृत्य में वस्त्र विन्यास
- डंडा नृत्य करने वाले समूह में 46 से लेकर 50 या फिर 60 तक सम संख्या में नर्तक होते हैं।
- ये नर्तक घुटने से उपर तक धोती-कुर्ता और जेकेट पहनते हैं।
- इसके साथ ही ये लोग गोंदा की माला से लिपटी हुई पगड़ी भी सिर पर बाँधकर धारण करते हैं।
- इसमें मोर के पंख की कडियों का झूल होता है।
- इनमें से कई नर्तकों के द्वारा ‘रूपिया' सुताइल, बहुंटा, चूरा, और पाँव में घुंघरू आदि पहने जाते हैं।
- आँख में काजल, माथे पर तिलक और पान से रंगे हुए ओंठ होते हैं।
डंडा / सैला नृत्य पद्धति
- एक कुहकी देने वाला, जिससे नृत्य की गति और ताल बदलता है;
- एक मांदर बजाने वाला और दो-तीन झांझ-मंजीरा बजाने वाले भी होते हैं।
- बाकी बचे हुए नर्तक इनके चारों ओर वृत्ताकार रूप में नाचते हैं।
- नर्तकों के हाथ में एक या दो डंडे होते हैं। नृत्य के प्रथम चरण में ताल मिलाया जाता है।
- दूसरा चरण में कुहका देने पर नृत्य चालन और उसी के साथ गायन होता है।
- नर्तक एक दूसरे के डंडे पर डंडे से चोंट करते हैं।
- कभी उचकते हुए, कभी नीचे झुककर और अगल-बगल को क्रम से डंडा देते हुए, झूम-झूमकर फैलते-सिकुड़ते वृत्तों में त्रिकोण, चतु कोण और षटकोण की रचना करते हुए नृत्य किया जाता है।
- डंडे की समवेत ध्वनि से एक शोरगुल भरा दृश्य उपस्थित होता है।
- नृत्य के आरंभ में ठाकुर देव की वंदना फिर माँ सरस्वती, गणेश और राम-कृष्ण के उपर गीत गाए जाते हैं।
- ‘पहिली डंडा ठोकबो रे भाई, काकर लेबो नाम रे ज़ोर, गावे गउंटिया ठाकुर देवता, जेकर लेबो नाम रे ज़ोर। आगे सुमिरो गुरु आपन ला, दूजे सुमिरों राम ज़ोर, माता-पिता अब आपन सुमिरों गुरु के सुमिरों नाम रे ज़ोर।’
- डंडा नृत्य कार्तिक माह से फाल्गुन माह तक होता है।
- पौष पूर्णिमा यानी की छेरछेरा के दिन मैदानी भाग में इसका समापन होता है।
- सुप्रसिद्ध साहित्यकार पंडित मुकुटधर पाण्डेय ने इस नृत्य को छत्तीसगढ का रास कहकर सम्बोधित किया है।
4. पंथी नृत्य (Panthi Dance)
- सतनामी समाज का पारंपरिक नृत्य।
- गुरु घासीदास जयंती (माघ पूर्णिमा) पर आयोजित होता है।
- नर्तक सफेद धोती, कमरबंद और घुंघरू पहनते हैं।
- गीत-संगीत और नृत्य धीरे-धीरे तीव्र गति पकड़ता है।
- पंथी में मानव मीनारें और अद्भुत करतब दिखाए जाते हैं।
पंथी नृत्य के लिए वस्त्र तथा वाद्ययंत्र
- पंथी नृत्य मे सफ़ेद रंग की धोती, कमरबन्द तथा घुंघरू पहने नर्तक मृदंग एवं झांझ की लय पर आंगिक चेष्टाएँ करते हुए मंत्र-मुग्ध प्रतीत होते हैं।
- पंथी नृत्त्य का समापन तीव्र गति के साथ चरम पर होता है।
- इस नृत्य की तेजी, नर्तकों की तेजी से बदलती मुद्राएँ एवं देहगति दर्शकों को आश्चर्यचकित कर देती है। पंथी नर्तकों की वेशभूषा सादी होती है।
- सादा बनियान, घुटने तक साधारण धोती, गले में हार, सिर पर सादा फेटा और माथे पर सादा तिलक।
- अधिक वस्त्र या शृंगार इस नर्तकों की सुविधा की दृष्टि से अनुकूल भी नहीं है।
- वर्तमान समय के साथ इस नृत्य की वेशभूषा में भी कुछ परिवर्तन आया है।
- पंथी नृत्य मे अब रंगीन कमीज और जैकेट भी पहन लिये जाते हैं।
- पंथी नृत्य मे मांदर एवं झाँझ पंथी के प्रमुख वाद्ययंत्र होते हैं। अब बेंजो, ढोलक, तबला और केसियो का भी प्रयोग होने लगा है।
पंथी नृत्य करने का तरीका
- पंथी नृत्य मे मुख्य नर्तक पहले गीत की कड़ी उठाता है, जिसे अन्य नर्तक दोहराते हुए नाचना शुरू करते हैं।
- प्रारंभ में गीत, संगीत और नृत्य की गति धीमी होती है। जैसे-जैसे गीत आगे बढ़ता है और मृदंग की लय तेज होती जाती है, वैसे-वैसे पंथी नर्तकों की आंगिक चेष्टाएँ भी तेज होती जाती हैं।
- गीत के बोल और अंतरा के साथ ही नृत्य की मुद्राएँ बदलती जाती हैं, बीच-बीच में मानव मीनारों की रचना और हैरतअंगेज कारनामें भी दिखाए जाते हैं।
- इस दौरान भी गीत-संगीत व नृत्य का प्रवाह बना रहता है और पंथी का जादू सिर चढ़कर बोलने लगता है।
- प्रमुख नर्तक बीच-बीच में ‘अहा, अहा…’ शब्द का उच्चारण करते हुए नर्तकों का उत्साहवर्धन करता है।
- पंथी नृत्य मे गुरु घासीदास बाबा का जयकारा भी लगाया जाता है।
- पंथी नृत्य मे थोड़े-थोड़े अंतराल के बाद प्रमुख नर्तक सीटी भी बजाता है, जो नृत्य की मुद्राएँ बदलने का संकेत होता है।
5. ककसार नृत्य (Kaksar Dance)
ककसार नृत्य (Kaksar Dance) छत्तीसगढ़ के मुरिया, हल्बा, गोंड तथा अबुझमाड़िया जनजातियों का प्रमुख सामूहिक लोकनृत्य है। यह विशेष रूप से फसल पकने के बाद, शादी–विवाह, और त्यौहारों के अवसर पर किया जाता है। इसमें युवक–युवतियाँ पारंपरिक वेशभूषा और आभूषण धारण कर लयबद्ध ढंग से नाचते–गाते हैं।
ककसार नृत्य करने के प्रकार
ककसार नृत्य कई प्रकार से किया जाता है, जो अवसर और परिस्थितियों पर निर्भर करता है –
गोला नृत्य (Circle Dance)
- युवक–युवतियाँ गोलाकार पंक्ति में हाथ पकड़कर या कंधे से कंधा मिलाकर नृत्य करते हैं।
- इसमें कदमों की गति एक समान और लयबद्ध होती है।
रेखा नृत्य (Line Dance)
- एक सीधी पंक्ति बनाकर आगे–पीछे कदम बढ़ाते हुए नृत्य किया जाता है।
- इसका प्रयोग प्रायः विवाह या सामूहिक उत्सवों में होता है।
जुगल नृत्य (Pair Dance)
- युवक और युवतियाँ जोड़े बनाकर आमने–सामने नाचते हैं।
- इसमें नृत्य की मुद्राएँ और अंग–संचालन अधिक आकर्षक होते हैं।
गीत–प्रधान नृत्य
- इसमें पारंपरिक ककसार गीत गाते हुए लयबद्ध नृत्य किया जाता है।
- गीत प्रायः प्रेम, कृषि, सामाजिक जीवन और देवताओं की स्तुति से जुड़े होते हैं।
त्यौहार विशेष नृत्य
- फसल कटाई (नवा खाई), पोला, दिवाली, और गोनचा उत्सव पर विशेष लय और मुद्राओं के साथ नृत्य किया जाता है।
ककसार नृत्य में प्रयुक्त वाद्य–यंत्र
ककसार नृत्य को जीवंत बनाने के लिए अनेक पारंपरिक वाद्य–यंत्रों का प्रयोग किया जाता है –
- मांदर (Mandar) – बड़ा दोमुखी नगाड़ानुमा वाद्य, मुख्य लय देता है।
- नगाड़ा (Nagara) – धातु का बड़ा वाद्य, गहरे स्वर उत्पन्न करता है।
- ढोल (Dhol) – दो तरफ से बजाया जाने वाला परंपरागत वाद्य।
- तिमकी / तासा (Timki/Tasa) – छोटा परंतु तीव्र स्वर वाला वाद्य, लय की गति बढ़ाता है।
- बांसुरी (Bansuri) – मधुर स्वर से नृत्य का वातावरण रमणीय बनाती है।
- मंजीरा / झांझ (Manjira / Jhanjh) – कांसे या पीतल से बना ताल वाद्य।
- घुंघरू (Ghungroo) – नर्तक–नर्तकियों के पैरों में बाँधा जाता है, लय का अभिन्न अंग है।
✅ निष्कर्ष :
- ककसार नृत्य छत्तीसगढ़ की जनजातीय जीवनशैली, सामाजिक एकता और उल्लास का प्रतीक है। इसके प्रकार – गोला, रेखा, जुगल और गीत–प्रधान नृत्य – जनजीवन के विभिन्न अवसरों पर किए जाते हैं। वहीं मांदर, ढोल, नगाड़ा, तिमकी और बांसुरी जैसे वाद्य इस नृत्य की आत्मा माने जाते हैं।
6. राउत नृत्य (Raut Nacha)
राउत नृत्य (Raut Nacha) छत्तीसगढ़ का अत्यंत प्रसिद्ध और लोकप्रिय लोकनृत्य है। इसे प्रायः यदुवंशी समुदाय (ग्वाला / राउत जाति) द्वारा किया जाता है। यह नृत्य विशेष रूप से दीपावली (गोवर्धन पूजा / गाई गोरस पर्व) के अवसर पर प्रस्तुत किया जाता है। राउत नृत्य को छत्तीसगढ़ का "यादवों का नृत्य" भी कहा जाता है।
राउत नृत्य का स्वरूप
- धार्मिक महत्व – यह नृत्य भगवान श्रीकृष्ण और गोवर्धन पर्वत की पूजा से जुड़ा हुआ है।
- समूह नृत्य – इसमें युवक–युवकियाँ सामूहिक रूप से भाग लेते हैं।
- वेशभूषा – राउत लोग पारंपरिक वेशभूषा में, रंगीन पगड़ी, झिलमिल कपड़े, मोरपंख और गहनों से सजकर नृत्य करते हैं।
- नृत्य शैली – इसमें दांडिया की तरह लकड़ी (सोटा / लठ्ठ) का प्रयोग कर तालबद्ध नृत्य किया जाता है।
- गीत – राउत नृत्य के दौरान विशेष राउत गीत / भजन गाए जाते हैं, जो कृष्ण–लीला, गोधन, वीरता और पौराणिक कथाओं से संबंधित होते हैं।
राउत नृत्य करने के प्रकार
- गोला (Circle Dance) – गोलाकार में हाथ पकड़कर या डंडों से ताल मिलाकर नृत्य।
- रेखा (Line Dance) – सीधी पंक्ति बनाकर आगे–पीछे ताल से लाठी बजाते हुए नृत्य।
- युद्धाभ्यास नृत्य – लाठी–डंडों से युद्ध कला जैसी मुद्राएँ दिखाना।
- भक्ति–प्रधान नृत्य – गीतों में कृष्ण–भक्ति और गोवर्धन पूजा का वर्णन होता है।
राउत नृत्य में प्रयुक्त वाद्य–यंत्र
राउत नृत्य को ऊर्जा देने के लिए कई पारंपरिक वाद्य–यंत्रों का प्रयोग किया जाता है –
- मृदंग (Mridang) – मुख्य ताल देने वाला वाद्य।
- मांदर (Mandar) – दोमुखी नगाड़ा, नृत्य की लय को सशक्त बनाता है।
- नगाड़ा (Nagara) – उत्साह और जोश उत्पन्न करता है।
- तिमकी / ढोलक (Timki/Dholak) – मध्यम स्वर वाला ताल वाद्य।
- बांसुरी (Bansuri) – भगवान श्रीकृष्ण की प्रतीक बांसुरी का मधुर स्वर वातावरण को भक्ति–मय बना देता है।
- मंजीरा / झांझ (Manjira / Jhanjh) – ताल साधने के लिए।
- घुंघरू (Ghungroo) – नर्तकों के पैरों की गति और लय का हिस्सा।
राउत नृत्य की विशेषताएँ
- सामूहिकता – इसमें गाँव–समाज के सभी लोग भाग लेते हैं।
- भक्ति व वीरता – गीतों और मुद्राओं में भक्ति तथा पराक्रम दोनों का संगम होता है।
- सामाजिक एकता – दीपावली पर यह नृत्य पूरे गाँव को जोड़ता है।
- लोकप्रियता – इसे छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक धरोहर माना जाता है।
✅ निष्कर्ष :
- राउत नृत्य छत्तीसगढ़ के यदुवंशी राउत समुदाय का प्रतिनिधि नृत्य है, जो दीपावली के अवसर पर प्रस्तुत किया जाता है। इसमें गोला, रेखा, युद्धाभ्यास और भक्ति–प्रधान नृत्य की झलक देखने को मिलती है। मांदर, नगाड़ा, मृदंग और बांसुरी जैसे वाद्य–यंत्र इसकी आत्मा हैं।
7. डोमकच नृत्य (Domkach Dance)
डोमकच नृत्य (Domkach Dance) छत्तीसगढ़, झारखंड और बिहार क्षेत्र का लोकप्रिय विवाह नृत्य है। छत्तीसगढ़ में इसे मुख्यतः सारागुजा, सरगुजा, कोरिया, जशपुर और बस्तर अंचल की स्त्रियाँ करती हैं। इसे खासकर शादी-ब्याह, मंगल अवसर और पारिवारिक उत्सवों में किया जाता है।
डोमकच नृत्य का स्वरूप
- सामूहिक नृत्य – यह प्रायः महिलाओं का नृत्य है, जिसमें दुल्हन पक्ष और वर पक्ष की महिलाएँ भाग लेती हैं।
- गीत प्रधान नृत्य – इस नृत्य में महिलाएँ गीत गाते हुए गोल घेरे में या कतार बनाकर नृत्य करती हैं।
- हास्य–व्यंग्य और प्रेमगीत – डोमकच गीतों में व्यंग्य, हंसी–मज़ाक, दूल्हा–दुल्हन की छेड़छाड़, पारिवारिक रिश्तों की चुटकी और सामाजिक जीवन की झलक दिखाई देती है।
- वेशभूषा – महिलाएँ पारंपरिक साड़ी और आभूषण पहनकर नृत्य करती हैं।
- नृत्य शैली – इसमें सरल पदचालन, ताली बजाना और लयबद्ध गति प्रमुख है।
डोमकच नृत्य के प्रकार
- विवाह–डोमकच – शादी के अवसर पर किया जाने वाला नृत्य।
- मंगल–डोमकच – किसी भी शुभ अवसर जैसे – गृह प्रवेश, अन्नप्राशन, त्योहार पर।
- हास्य–व्यंग्य डोमकच – विशेष रूप से छेड़छाड़ और हास्य गीतों के साथ।
- भक्ति–प्रधान डोमकच – देवी–देवताओं की स्तुति करते हुए।
डोमकच नृत्य में प्रयुक्त वाद्य–यंत्र
डोमकच नृत्य अधिकतर गीत और ताली पर आधारित होता है, फिर भी कुछ स्थानों पर पारंपरिक वाद्य बजाए जाते हैं –
- मंजीरा (Manjira) – कांसे की छोटी झांझ।
- ढोलक (Dholak) – मुख्य ताल देने वाला वाद्य।
- नगाड़ा (Nagara) – बड़े आयोजनों में।
- मांदर (Mandar) – ताल और लय को सशक्त बनाने हेतु।
- घुंघरू (Ghungroo) – नर्तकियों के पैरों में।
डोमकच नृत्य की विशेषताएँ
- यह स्त्रियों का सामूहिक विवाह नृत्य है।
- इसमें हास्य, व्यंग्य, प्रेम और सामाजिक रिश्तों की झलक दिखाई देती है।
- नृत्य की शैली सरल, स्वाभाविक और गीतप्रधान होती है।
- यह छत्तीसगढ़ की पारिवारिक और सामाजिक संस्कृति का अभिन्न हिस्सा है।
✅ निष्कर्ष :
- डोमकच नृत्य छत्तीसगढ़ का लोकप्रिय मंगल एवं विवाह नृत्य है, जो विशेषकर महिलाओं द्वारा गीत गाते हुए किया जाता है। इसमें सरल लय, हास्य–व्यंग्य, और सामाजिक जीवन की सजीव अभिव्यक्ति देखने को मिलती है।
8. गैड़ी नृत्य (Gaedi Dance)
गैड़ी नृत्य (Gaedi Dance) छत्तीसगढ़ का अत्यंत लोकप्रिय और आकर्षक जनजातीय नृत्य है। यह मुख्यतः गौंड, बैगा और अन्य आदिवासी समुदायों द्वारा किया जाता है। “गैड़ी” का अर्थ होता है – बाँस की लंबी डंडी पर चलना (स्टिल्ट डांस)। इस नृत्य में कलाकार बाँस की लंबी गैड़ी (पैरों में बाँधी जाने वाली लकड़ी) पर चढ़कर करतब और नृत्य करते हैं।
गैड़ी नृत्य का स्वरूप
- अवसर – यह नृत्य दशहरा, फसल कटाई, मड़ई, त्योहारों और ग्राम्य मेलों के अवसर पर प्रस्तुत किया जाता है।
- विशेषता – कलाकार अपने पैरों में 6–8 फीट लंबी गैड़ी (बाँस की डंडी) बाँधकर नृत्य करते हैं।
- वेशभूषा – नर्तक पारंपरिक धोती, रंगीन गमछा, सिर पर पगड़ी तथा पैरों में घुंघरू पहनते हैं।
- नृत्य शैली – इसमें नर्तक ऊँचाई पर संतुलन बनाते हुए, गोल घेरा बनाकर, लयबद्ध गति से, कभी–कभी करतब दिखाते हुए नृत्य करते हैं।
- सामूहिकता – प्रायः कई युवक एक साथ गैड़ी पर चढ़कर समूह में नाचते हैं।
गैड़ी नृत्य के प्रकार
- त्योहार–गैड़ी नृत्य – दशहरा और मड़ई के समय।
- कृषि–गैड़ी नृत्य – फसल पकने या कटाई के अवसर पर।
- करतब–प्रधान गैड़ी नृत्य – मेलों में आकर्षण हेतु विभिन्न कलात्मक मुद्राओं के साथ।
- युद्धाभ्यास गैड़ी नृत्य – कभी–कभी इसमें लाठी और हथियारों के साथ युद्धकला की झलक भी दिखाई जाती है।
गैड़ी नृत्य में प्रयुक्त वाद्य–यंत्र
गैड़ी नृत्य को रोमांचक बनाने के लिए पारंपरिक वाद्य–यंत्रों का प्रयोग किया जाता है –
- मांदर (Mandar) – दोमुखी नगाड़ा, मुख्य लय देता है।
- नगाड़ा (Nagara) – बड़े अवसरों पर।
- ढोल (Dhol) – नृत्य को तेज गति देता है।
- तिमकी (Timki) – तीव्र स्वर उत्पन्न करता है।
- मंजीरा (Manjira) – ताली और लय साधने के लिए।
- घुंघरू (Ghungroo) – नर्तकों के पैरों की थिरकन का हिस्सा।
- बांसुरी (Bansuri) – मधुरता और उत्सव का वातावरण बनाने के लिए।
गैड़ी नृत्य की विशेषताएँ
- यह नृत्य साहस, रोमांच और कलात्मक कौशल का प्रतीक है।
- कलाकारों को संतुलन, लय और शक्ति की आवश्यकता होती है।
- इसमें त्योहार, कृषि और युद्धाभ्यास सभी पहलू झलकते हैं।
- यह छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक परंपरा और जनजातीय जीवन को दर्शाता है।
✅ निष्कर्ष :
- गैड़ी नृत्य छत्तीसगढ़ का अद्वितीय स्टिल्ट डांस (बाँस पर नृत्य) है, जिसमें कलाकार गैड़ी पर संतुलन बनाकर समूह में नाचते हैं। मांदर, ढोल, नगाड़ा और बांसुरी इसके प्रमुख वाद्य–यंत्र हैं। यह नृत्य छत्तीसगढ़ की साहसिकता, उत्सवधर्मिता और लोकजीवन का शानदार परिचय देता है।
9. सरहुल नृत्य (Sarhul Dance)
सरहुल नृत्य (Sarhul Dance) छत्तीसगढ़, झारखंड और उड़ीसा के आदिवासी समाज का प्रसिद्ध त्योहार–प्रधान लोकनृत्य है। यह नृत्य विशेष रूप से सरहुल पर्व पर किया जाता है, जो बसंत ऋतु (चैत्र–बैसाख माह) में आता है। सरहुल का अर्थ होता है – “साल वृक्ष की पूजा”। यह नृत्य प्रकृति, साल वृक्ष, सूर्य और देवी–देवताओं को समर्पित होता है।
सरहुल नृत्य का स्वरूप
- अवसर – सरहुल पर्व पर, जब साल वृक्ष में नये फूल आते हैं।
- धार्मिक महत्व – इसमें साल वृक्ष को धरती माता का प्रतीक मानकर उसकी पूजा की जाती है।
- सामूहिक नृत्य – युवक–युवतियाँ रंग–बिरंगे परिधान और आभूषण पहनकर समूह में नृत्य करते हैं।
- नृत्य शैली – नर्तक–नर्तकियाँ हाथों में हाथ डालकर गोल घेरे में नाचते हैं।
- गीत – इसमें गाए जाने वाले गीत प्रकृति, प्रेम, सामाजिक एकता और देवताओं की स्तुति पर आधारित होते हैं।
सरहुल नृत्य करने के प्रकार
- भक्ति–प्रधान नृत्य – साल वृक्ष और देवी–देवताओं की स्तुति हेतु।
- सामूहिक उत्सव नृत्य – गाँव में हर्ष–उल्लास और एकता व्यक्त करने हेतु।
- ऋतु–परिवर्तन नृत्य – बसंत ऋतु और नई फसल के स्वागत में।
- युवक–युवती नृत्य – युवक–युवतियों द्वारा आपसी मेलजोल और आनंद के लिए।
सरहुल नृत्य में प्रयुक्त वाद्य–यंत्र
सरहुल नृत्य को जीवंत और ऊर्जावान बनाने के लिए पारंपरिक वाद्य–यंत्र बजाए जाते हैं –
- मांदर (Mandar) – दोमुखी नगाड़ा, मुख्य लय देता है।
- ढोल (Dhol) – समूह की गति को नियंत्रित करता है।
- नगाड़ा (Nagara) – उत्सव का जोश बढ़ाता है।
- तुरी (Turi) – फूँककर बजाया जाने वाला पारंपरिक वाद्य।
- बांसुरी (Bansuri) – वातावरण को मधुर बनाती है।
- मंजीरा / झांझ (Manjira / Jhanjh) – ताल साधने हेतु।
- घुंघरू (Ghungroo) – नर्तकों के पैरों में, लय और संगीत से मेल कराता है।
सरहुल नृत्य की विशेषताएँ
- यह नृत्य प्रकृति–पूजा और ऋतु–परिवर्तन का प्रतीक है।
- इसमें साल वृक्ष, बसंत ऋतु और धरती माता का विशेष महत्व है।
- नृत्य और गीतों में भक्ति, प्रेम और सामाजिक एकता की झलक मिलती है।
- यह आदिवासी संस्कृति और पर्यावरण–प्रेम का अनूठा उदाहरण है।
✅ निष्कर्ष :
- सरहुल नृत्य छत्तीसगढ़ का प्रमुख प्रकृति–पूजा और उत्सव नृत्य है, जो साल वृक्ष के फूल आने पर किया जाता है। इसमें मांदर, ढोल, नगाड़ा, तुरी और बांसुरी जैसे वाद्य–यंत्र बजाए जाते हैं। यह नृत्य आदिवासी समाज की भक्ति, सामूहिकता और प्रकृति–प्रेम की सजीव अभिव्यक्ति है।
10. पंडवानी (Pandwani)
पंडवानी (Pandwani) छत्तीसगढ़ की सबसे प्रसिद्ध लोककला और लोकगाथा गायन शैली है। इसमें महाभारत की कथाओं, विशेषकर पांडवों के जीवन–चरित्र का वर्णन गीत और नाट्य रूप में किया जाता है। “पंडवानी” शब्द का अर्थ है – पांडवों की वाणी या गाथा। यह छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान और गौरव माना जाता है।
पंडवानी का स्वरूप
- विषय–वस्तु – पांडवों की कथा, द्रौपदी, भीम, अर्जुन, कर्ण और श्रीकृष्ण से संबंधित प्रसंग।
- गायन–शैली – इसमें गायक एकल रूप से महाभारत की कथा गाता है, और उसके साथ संगीतकार वाद्य बजाते हैं।
- नाटकीय प्रस्तुति – कथावाचन के दौरान हाव–भाव, संवाद, और अभिनय के द्वारा कथा को जीवंत किया जाता है।
- समूह सहयोग – मुख्य गायक को “मंडली” (दल) का सहयोग मिलता है, जिसमें वादक और सह–गायक शामिल होते हैं।
- स्थल – इसे गाँव–गाँव, मेला, त्यौहार, पूजा, तथा रातभर चलने वाले कार्यक्रमों में प्रस्तुत किया जाता है।
पंडवानी की शैलियाँ
पंडवानी की दो प्रमुख शैलियाँ मानी जाती हैं –
- कापालिक शैली
- इसमें गायक अत्यधिक नाटकीय अभिनय करता है।
- हाथ में ताम्बा, वेणा या रवान्हा (एक तार वाला वाद्य) लेकर युद्ध के दृश्य और प्रसंगों को अभिनय के साथ प्रस्तुत करता है।
- यह शैली जीवंत, नाटकीय और दर्शकों को रोमांचित करने वाली होती है।
- वेदा (वेदमति) शैली
- इसमें कथा का सरल और शांत भाव से गायन किया जाता है।
- अभिनय और नाटकीयता कम होती है।
- इसमें भक्ति और गंभीरता अधिक झलकती है।
पंडवानी में प्रयुक्त वाद्य–यंत्र
- तम्बूरा / रवान्हा (Tambura / Ravanhatta / Veena) – मुख्य गायक हाथ में लेकर बजाता है।
- हारमोनियम (Harmonium) – गीतों की संगति में।
- ढोलक (Dholak) – ताल देने के लिए।
- मांदर (Mandar) – लय को मजबूत करने के लिए।
- झांझ / मंजीरा (Jhanjh / Manjira) – ताल और संगति के लिए।
पंडवानी की विशेषताएँ
- यह कथा–संगीत और अभिनय का अनूठा संगम है।
- इसमें महाभारत की गाथाएँ लोकभाषा (छत्तीसगढ़ी बोली) में प्रस्तुत होती हैं।
- गायक की स्वर शक्ति, अभिनय और तात्कालिक रचना–शक्ति इसका मुख्य आकर्षण होती है।
- इसमें धार्मिक, वीरता, भक्ति और सामाजिक शिक्षा का समावेश होता है।
- इसे लोक शिक्षा और मनोरंजन का महत्वपूर्ण साधन माना जाता है।
पंडवानी के प्रमुख कलाकार
- तीजन बाई – पंडवानी की विश्वविख्यात कलाकार, जिन्हें पद्मश्री, पद्मभूषण, और पद्मविभूषण से सम्मानित किया गया।
- रीताबाई, रतन बाई, झाडूराम देवांगन, पूनाराम निषाद – अन्य प्रसिद्ध पंडवानी कलाकार।
✅ निष्कर्ष :
- पंडवानी छत्तीसगढ़ की अनोखी लोकगाथा गायन शैली है, जिसमें पांडवों की कथाओं का प्रस्तुतीकरण गीत, अभिनय और वाद्य संगीत के माध्यम से किया जाता है। कापालिक और वेदा – दोनों शैलियाँ इसकी पहचान हैं। पंडवानी ने छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक धरोहर को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति दिलाई है।
11. गौर नृत्य (Gaur Dance)
- समुदाय – मुख्यतः मुरिया और गोंड जनजाति द्वारा।
- अवसर – फसल कटाई, विवाह और सामूहिक उत्सव।
- विशेषता – इसमें नर्तक गौर (बैल/भैंसा) की तरह सिर पर सींगनुमा सजावट पहनकर युद्ध और शिकार की मुद्राएँ करते हैं।
- वाद्य–यंत्र – मांदर, नगाड़ा, तिमकी, बांसुरी, मंजीरा।
- महत्व – यह वीरता, शौर्य और पशु–पूजा का प्रतीक है।
12. बिलमा नृत्य (Bilma Dance)
- समुदाय – आदिवासी समाज, विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में।
- अवसर – त्योहारों और विवाह पर।
- विशेषता – इसमें नर्तक हाथों में बिलमा (झांझनुमा वाद्य) लेकर नृत्य करते हैं।
- वाद्य–यंत्र – बिलमा (धातु की थाली जैसी झांझ), ढोलक, मांदर।
- महत्व – यह धार्मिक अनुष्ठानों और मंगल अवसरों पर शुभ माना जाता है।
13. फाग नृत्य (Phag Dance)
- समुदाय – छत्तीसगढ़ के ग्रामीण अंचल में सभी जाति–समुदाय।
- अवसर – होली और फागुन माह में।
- विशेषता – पुरुष–महिलाएँ साथ मिलकर फाग गीत गाते हुए नृत्य करते हैं।
- वाद्य–यंत्र – ढोलक, मंजीरा, झांझ, हारमोनियम।
- महत्व – यह नृत्य प्रेम, रंग और उल्लास का प्रतीक है।
14. परघोनी नृत्य (Parghoni Dance)
- समुदाय – गोंड और अन्य जनजातीय समाज।
- अवसर – विवाह और सामूहिक उत्सव।
- विशेषता – इसमें महिलाएँ गोल घेरे में खड़ी होकर गीत गाती हैं और पुरुष वाद्य बजाते हैं।
- वाद्य–यंत्र – ढोलक, मंजीरा, नगाड़ा, मांदर।
- महत्व – यह नृत्य वैवाहिक जीवन, हास्य–व्यंग्य और सामाजिक एकता से जुड़ा है।
15. हुलकी नृत्य (Hulki Dance)
- समुदाय – गोंड और अन्य आदिवासी वर्ग।
- अवसर – त्योहार और मेलों में।
- विशेषता – इसमें नर्तक–नर्तकियाँ कमर से कमर मिलाकर, गोल घेरे में लयबद्ध नृत्य करते हैं।
- वाद्य–यंत्र – मांदर, तिमकी, नगाड़ा।
- महत्व – यह नृत्य सामूहिकता, प्रेम और उत्साह का प्रतीक है।
16. ढांढल नृत्य (Dhandhal Dance)
- समुदाय – बस्तर क्षेत्र के आदिवासी।
- अवसर – शिकार, युद्ध और त्योहारों पर।
- विशेषता – इसमें नर्तक ढाल और तलवार लेकर युद्ध–अभ्यास की शैली में नाचते हैं।
- वाद्य–यंत्र – मांदर, नगाड़ा, ढोल।
- महत्व – यह युद्धकला, शौर्य और वीरता का प्रतीक है।
17. गंवार नृत्य (Ganwar Dance)
- समुदाय – गोंड, मुरिया और अन्य जनजाति।
- अवसर – गंवार पर्व (जनजातीय उत्सव) पर।
- विशेषता – इसमें युवक–युवतियाँ रंगीन वेशभूषा में लयबद्ध होकर नृत्य करते हैं।
- वाद्य–यंत्र – मांदर, तिमकी, नगाड़ा, बांसुरी।
- महत्व – यह नृत्य कृषि, प्रेम और उत्सवधर्मिता का प्रतीक है।
18. दोरला नृत्य (Dorlā Dance)
- समुदाय – दोरला जनजाति (बस्तर क्षेत्र)।
- अवसर – दोरला समाज के त्यौहार और विवाह पर।
- विशेषता – इसमें नर्तक–नर्तकियाँ अपनी पारंपरिक वेशभूषा और आभूषणों में गीत–संगीत के साथ नाचते हैं।
- वाद्य–यंत्र – मांदर, ढोलक, नगाड़ा, बांसुरी।
- महत्व – यह नृत्य दोरला जनजाति की सांस्कृतिक पहचान है।
⭐ छत्तीसगढ़ के लोकनृत्यों की विशेषताएँ
- सामूहिकता – अधिकांश नृत्य समूह में किए जाते हैं, जहाँ महिलाएँ व पुरुष एक साथ नाचते हैं।
- प्रकृति–प्रधान – नृत्यों में वर्षा, फसल, बसंत ऋतु और जंगल–पहाड़ का चित्रण होता है।
- धार्मिकता व भक्ति – नृत्य देवी–देवताओं, ग्राम–देवताओं और पर्व–त्योहारों को समर्पित होते हैं।
- त्योहार–आधारित – होली, दीवाली, सरहुल, नवाखाई, पंडवानी पर्व आदि अवसरों पर नृत्य किए जाते हैं।
- सरलता और सहजता – नृत्य की मुद्राएँ कठिन न होकर सहज व आकर्षक होती हैं।
- सामाजिक एकता – इनसे समाज में भाईचारा, मेल–मिलाप और सहयोग की भावना प्रकट होती है।
- रंग–बिरंगे परिधान – महिलाएँ साड़ी और पुरुष धोती, अंगोछा आदि पहनकर नृत्य करते हैं।
- लोकगीतों पर आधारित – नृत्य के साथ लोकगीत गाए जाते हैं, जिनमें वीरगाथाएँ, प्रेम, भक्ति और हास्य झलकते हैं।
- वाद्य–यंत्रों का प्रयोग – मांदर, ढोल, नगाड़ा, तुरी, बांसुरी, मंजीरा, झांझ, घुंघरू आदि मुख्य वाद्य हैं।
- आनंद व उत्सव का प्रतीक – लोकनृत्य उत्सव, विवाह, फसल कटाई और शुभ अवसरों की खुशी को दर्शाते हैं।
- पारंपरिकता – इन नृत्यों की शैली पीढ़ी–दर–पीढ़ी चली आ रही है, जो आज भी जीवंत है।
- क्षेत्रीय विविधता – हर जनजाति और गाँव का अपना अलग नृत्य रूप और शैली देखने को मिलती है।
- संकेतात्मकता – नृत्य की मुद्राओं से प्रेम, युद्ध, खेती, पशुपालन और धार्मिक कथाओं को व्यक्त किया जाता है।
- मनोरंजन व शिक्षा – नृत्य केवल मनोरंजन का साधन ही नहीं, बल्कि सामाजिक व सांस्कृतिक शिक्षा का भी माध्यम है।
- महिलाओं की सक्रिय भागीदारी – अधिकांश नृत्यों में महिलाएँ प्रमुख भूमिका निभाती हैं। नृत्य, छत्तीसगढ़ संस्कृति, छत्तीसगढ़ जनजातीय नृत्य, Chhattisgarh Traditional Dance,