
लेख: फुलचंद | अपडेट: 2025 | स्रोत: राज्य रिपोर्टें, अक्षय ऊर्जा निगम तथा विभागीय प्रकाशन
सारांश: यह लेख राजस्थान में उपलब्ध ऊर्जा संसाधनों का व्यवस्थित और रंगीन वर्णन है — परम्परागत और गैर-परम्परागत दोनों। इसमें प्रमुख परियोजनाएँ, ऐतिहासिक घटनाएँ, हालिया आँकड़े, जिलावार जानकारी, तालिकाएँ और 50+ MCQ दिए गए हैं ताकि छात्र और ब्लॉगर दोनों इसे आसानी से उपयोग कर सकें।
ऊर्जा किसी भी राज्य की आर्थिक प्रगति का आधार है। राजस्थान, जो आकार और जलवायु दोनों दृष्टियों से विशिष्ट है, में ऊर्जा संसाधनों का विकास 1950 के दशक से प्रारम्भ हुआ। 1 जुलाई 1957 को राजस्थान राज्य विद्युत मंडल की स्थापना हुई। बाद में 19 जुलाई 2000 को राजस्थान विद्युत मंडल को विभाजित कर पाँच कंपनियों में बदल दिया गया — उत्पादन, प्रसारण और तीन वितरण निगम (जयपुर, अजमेर, जोधपुर)। 2 जनवरी 2000 को राजस्थान विद्युत नियामक आयोग का गठन हुआ।
एकीकरण के समय राजस्थान में स्थापित कुल विद्युत क्षमता मात्र 13.27 मेगावाट थी—जो तेजी से बढ़ी और 2016 में लगभग 17894 मेगावाट तक पहुँची। तब से नवीनीकरणीय ऊर्जा तथा सुपर-क्रिटिकल थर्मल प्रोजेक्ट्स के संयोजन ने राज्य को ऊर्जा मानचित्र पर मजबूत किया है।
राजस्थान के ऊर्जा संसाधन broadly दो भागों में बँटते हैं:
राजस्थान में पवन ऊर्जा उत्पादन में भारी क्षमता है। कुल नवीनीकरणीय उत्पादन में पवन ऊर्जा का योगदान एक बड़ा हिस्सा है। जैसलमेर, फलोदी (जोधपुर), सीकर और प्रतापगढ़ जैसे जिलों में विशाल विंड फार्म स्थित हैं — विशेषकर जैसलमेर को 'पंखों की नगरी' कहा जाता है।
राजस्थान में प्रमुख पवन परियोजनाएँ (उदाहरण):
बिठूड़ी विंड प्रोजेक्ट (फलोदी), हर्ष पर्वत (सीकर), देवगढ़ व धमोतर (प्रतापगढ़)पवन ऊर्जा की प्रमुख खूबियाँ: विशाल खुला मैदान, उच्च वायु-गति, और सीमित वनावरण जिसके कारण बड़े पैमाने पर स्थापित करना अपेक्षाकृत आसान है।
राजस्थान देश में सौर ऊर्जा के क्षेत्र में अग्रणी है। बाड़मेर–जैसलमेर–जोधपुर को अक्सर ‘सौर त्रिभुज’ कहा जाता है। जोधपुर जिला सौर ऊर्जा उत्पादन की दृष्टि से बहुत उपयुक्त है—कम बादल, उच्च सूर्य के समकोण और मरुस्थलीय भूभाग।
राजस्थान की प्रमुख सौर परियोजनाएँ:
धूड़सर सोलर प्रोजेक्ट — जैसलमेर (REDA द्वारा स्थापित)अगोरिया, मोकला, नांदिया, नान्दिया, खींवसर, धनिया—जैसी अन्य परियोजनाएँसोलर परियोजनाएँ जहां बड़े पैमाने पर बिजली उत्पादन के लिए उपयोगी हैं, वहीं रूढ़िवादी कृषि-उपयोगों के साथ भी सूखे इलाकों में ऊर्जा उपलब्ध कराती हैं।
बायोमास ऊर्जा में कृषि अवशेष (चावल की भूसी, गेहूँ-के डंठल, सरसों की खल), पशु अपशिष्ट और शहरी कचरा का उपयोग होता है। राजस्थान में लगभग 100 मेगावाट स्तर पर बायोमास उत्पादन कार्यरत है, और ग्रामीण क्षेत्रों में घरेलू बायोगैस संयंत्रों का उपयोग बढ़ रहा है।
प्रमुख संयंत्र: पदमपुरा (गंगानगर), खेड़ली (अलवर), देवली (टोंक), अजमेर बायोमास संयंत्र, बालोतरा (बाड़मेर), रामगंज (कोटा)।
राजस्थान में भूतापीय ऊर्जा की संभावनाएँ माउंट आबू और पुष्कर के आसपास चर्चा में रही हैं। हालांकि वाणिज्यिक स्तर पर बड़े पैमाने पर भूतापीय परियोजनाएं अभी तक शुरू नहीं हुई हैं, परंतु शोध तथा संवेदनशील भू-तापीय सर्वेक्षण जारी हैं।
REDA (राजस्थान ऊर्जा विकास अभिकरण) और RSPCL को मिलाकर मार्च 2002 में राजस्थान नवीनीकरणीय ऊर्जा विकास निगम बना, जिसे अगस्त 2002 में अक्षय ऊर्जा निगम कहा गया। यह राज्य का शीर्ष संस्थान है जो सौर एवं पवन परियोजनाओं का संचालन और प्रोत्साहन करता है।
राजस्थान की सबसे बड़ी ऊर्जा आपूर्ति अभी भी तापीय संयंत्रों से होती है। राज्य में अधिकांश तापीय संयंत्र लिग्नाइट कोयला पर आधारित हैं। तापीय प्रोजेक्ट्स तीन श्रेणियों में विभक्त हैं — सुपर-क्रिटिकल, सुपर-थर्मल तथा साधारण थर्मल प्रोजेक्ट्स।
प्रमुख सुपर-क्रिटिकल/सुपर थर्मल प्रोजेक्ट्स:
थर्मल ऊर्जा के फायदे: विश्वसनीय बेस‑लोड आपूर्ति। चुनौतियाँ: उत्सर्जन, जल उपयोग तथा कोयला परिवहन लागत।
राजस्थान में जल विद्युत से लगभग 10% के आसपास उत्पादन होता है (राज्य-विशिष्ट हिस्सेदारी)। बड़ी परियोजनाओं में जाखम और अनास जैसी स्वयं की परियोजनाएँ, एवं भागीदारी वाली परियोजनाएँ — भाखड़ा नांगल, व्यास, चम्बल परियोजना आदि शामिल हैं।
राजस्थान में रावतभाटा (चितौड़गढ़) पर स्थित रावतभाटा परमाणु विद्युत गृह प्रमुख है जिसमें कई इकाइयाँ संचालित हैं। बांसवाड़ा में भी एक परमाणु प्रोजेक्ट निर्माणाधीन है।
रावतभाटा अपडेट: रावतभाटा (Rajasthan Atomic Power Station - RAPS) की स्थापना 1965 में हुई थी। यह भारत के पुराने परमाणु केंद्रों में से एक है और यहाँ पर कई प्रशासित इकाइयाँ चल रही हैं।
श्रेणीपरियोजना/नामजिलानोट्सपवनअमर सागर विंडजैसलमेर1998 — पहला प्रोजेक्टसौरमथानिया सोलरजोधपुरविश्व बैंक/जर्मनी सहयोगबायोमासपदमपुरा बायोमासगंगानगरकृषि अवशेष पर आधारितथर्मलसूरतगढ़ सुपर क्रिटिकलगंगानगरराज्य का सबसे बड़ाजलजाखम परियोजनाप्रतापगढ़राज्य की स्वयं की परियोजनानाभिकीयरावतभाटाचित्तौड़गढ़भारतीय पुराना परमाणु केंद्र
नवीनतम आधिकारिक आँ
कड़ों के अनुसार (राज्य रिपोर्ट्स और अक्षय ऊर्जा निगम के प्रकाशनों के आधार पर) — राजस्थान की कुल स्थापित विद्युत क्षमता में नवीनीकरणीय का हिस्सा लगातार बढ़ रहा है। राज्य में पवन और सौर ऊर्जा का संयुक्त योगदान तेज़ी से बढ़ा है, जबकि तापीय संयंत्र अभी भी बेस‑लोड प्रदान करते हैं।
(नोट: यदि आप चाहें तो मैं यहाँ जिलावार नवीनतम मेगावाट आँकड़े व स्रोत-सह-उद्धरण जोड़ दूँगा — इसके लिए मैं आधिकारिक रिपोर्ट्स से ताज़ा डेटा खींचकर तालिका में दाल सकता हूँ।)
राजस्थान सरकार ने नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा देने के लिए कई पॉलिसी और प्रोत्साहन योजनाएँ लागू की हैं: भूमि के प्रमाणन में सहूलियत, ग्रिड‑कनेक्शन प्रक्रिया का सरलीकरण, और निजी निवेशकों के लिए टैरिफ‑समर्थन।
राजस्थान में ऊर्जा संसाधन विविध और समृद्ध हैं। पवन और सौर ने राज्य की ऊर्जा प्रोफ़ाइल में नया आयाम जोड़ दिया है जबकि परम्परागत तापीय और जल परियोजनाएँ अभी भी महत्त्वपूर्ण हैं। भविष्य में स्टोरेज, नेटवर्क अपग्रेड और ग्रीन‑हाइड्रोजन जैसी तकनीकों के साथ राजस्थान ऊर्जा‑खेत में एक अग्रणी भूमिका निभा सकता है।
यह पोस्ट छात्र, प्रतियोगी परीक्षार्थी और ब्लॉगर हेतु उपयोगी संदर्भ सामग्री के रूप में तैयार की गयी है।ता है।
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